अविश्वसनीय, अद्भुत और रोमाँचक: अंतरिक्ष

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दूनिया की सैर कर लो!

In अंतरिक्ष, पृथ्वी on सितम्बर 28, 2011 at 7:30 पूर्वाह्न


क्या आपने कभी पृथ्वी की अंतरिक्ष से परिक्रमा का सपना देखा है ? सुदूर आकाश से पृथ्वी के उपर से उड़ान !

अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के अंतरिक्षयात्री रोजाना ऐसा करते है। हमारी अपनी घूर्णन करती हुयी पृथ्वी की हर तीन घंटे मे एक परिक्रमा।

प्रस्तुत वीडियो अंतरिक्ष स्टेशन से पिछले माह अगस्त 2011 मे ली गयी तस्वीरों से बनाया गया है। इस वीडियो मे आप पृथ्वी की रात के समय के अर्ध प्रकाशित गोले को देख सकते है। प्रमुख नक्षत्र भी इस वीडीयो मे पहचाने जा सकते है। पृथ्वी के वातावरण की सीमा अनेक रंगों के वलय के रूप मे दिखायी दे रही है।

इस वीडियो मे आप अनेक अद्भुत गुजरते देख सकते है, जिसमे सफेद बादल, गहरा नीला सागर, बड़े शहरो के प्रकाशित शहर, छोटे नगर और तूफ़ानी बादलो मे चमकती बिजली भी शामील है।

यह वीडियो उत्तरी प्रशांत महासागर से प्रारंभ होकर पश्चिमी उत्तर अमरीका से होते पश्चिमी दक्षिण अमरीका से अंटार्कटिका पर समाप्त होता है, जहाँ पर हम सूर्योदय होते देख सकते है।

श्रोत: NASAसाभार: Infinity Imagined

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लुब्धक तारा अर्थात सिरिअस तारा

In तारे on सितम्बर 27, 2011 at 7:41 पूर्वाह्न

लुब्धक तारा(Sirius) और मृग नक्षत्र(Orion)

लुब्धक तारा(Sirius) और मृग नक्षत्र(Orion)

लुब्धक तारा और मृग नक्षत्र

लुब्धक तारा और मृग नक्षत्र

लुब्धक तारा(Sirius) रात्री आकाश मे सबसे ज्यादा चमकदार तारा है। यह सूर्य के सबसे समीप के तारों मे से एक है, इसकी दूरी 9 प्रकाशवर्ष है। सौर मंडल से दूरी मे इसका स्थान सांतवां है।

रात्री आकाश मे इसे खोजना आसान है। मृग नक्षत्र के मध्य(Orion Belt) के तारो की सीध मे इसे आसानी से देखा जा सकता है। यह सूर्य के तुलना मे एक दीप्तीमान तारा है तथा सूर्य से दोगुना भारी है।

लुब्धक तारा वास्तविकता मे युग्म तारा है, इसमे प्रमुख चमकदार तारा सिरिअस ए है, जबकि इसका दूसरा तारा सिरिअस बी एक श्वेत वामन(White Dwarf) तारा है। यह श्वेत वामन तारा सूर्य के तुल्य द्रव्यमान रखता है। यह दोनो तारे एक दूसरे की परिक्रमा 50 वर्षो मे करते है।

इस युग्म तारा प्रणाली मे श्वेत वामन तारे के होने का अर्थ यह है कि यह तारा युग्म हमेशा ऐसा नही रहा होगा। किसी समय भूतकाल मे श्वेत वामन तारा लाल महादानव(Red Gaint) के रूप मे रहा होगा। इसके प्रमाण है कि यह सिरिअस बी का लाल महादानव तारे से श्वेत वामन तारे मे रूपांतरण पिछले कुछ हजार वर्षो मे हुआ होगा। प्राचिन कथाओ के अनुसार सिरिअस भूतकाल मे लाल दिखायी देता था जो की सीरीयस बी की श्वेत वामन तारे के रूप मे होती हुयी मृत्यु की अंतिम लाल चमक थी।

इस तारे को ग्रीक मिथको के अनुसार सिरिअस(Sirius) कहा जाता है। इसे श्वान तारा(Dog Star) भी कहा जाता है। इस तारे ने मिश्र की सभ्यता मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इसके उदय होने का काल, निल नदी की बाढ़ के समय से मेल खाता है। निल नदी की बाढ़ पर मिश्र का कृषि चक्र निर्भर है।

एक फूल दो माली :दो सितारों की परिक्रमा करता ग्रह केप्लर 16b

In ग्रह, तारे on सितम्बर 21, 2011 at 7:41 पूर्वाह्न

अंतरिक्ष वेधशाला केप्लर ने एक तारा युग्म की परिक्रमा करते हुये एक ग्रह की खोज की है। इस नये खोजे गये ग्रह का नाम केप्लर16b रखा गया है।

ब्रह्माण्ड मे युग्म तारे या दो से अधिक तारा प्रणाली काफी सामान्य है। हमारा सूर्य एक अपवाद है क्योंकि अधिकतर तारे दो या दो से अधिक के तारा समूह मे है। लेकिन यह पहली बार है कि किसी युग्म तारा प्रणाली की परिक्रमा करता हुआ ग्रह पाया गया है। प्रस्तुत वीडीयो इस तारा युग्म और ग्रह को दर्शा रहा है। यह वीडीयो कल्पना पर आधारित है और यह किसी अंतरिक्ष यान के इस तारा युग्म की यात्रा पर दिखने वाले दृश्य को दर्शा रहा है।

यह ग्रह और दोनो युग्म तारे पृथ्वी के प्रतल मे ही है, इस कारण से मुख्य तारे के प्रकाश मे इस ग्रह द्वारा ग्रहण के द्वारा आने वाली कमी की गणना तकनीक से इस ग्रह की खोज हुयी है।

केप्लर 16b का आकार तथा द्रव्यमान शनि के तुल्य है। यह दोनो तारो की संयुक्त परिक्रमा 229 दिनो मे करता है।

इस ग्रह पर जीवन की संभावना नगण्य है क्योंकि इसका तापमान -100 अंश सेल्सीयस से -70  अंश सेल्सीयस तक रहता है।

वीडियो श्रोत :djxatlanta

वीडियो साभार : NASA/JPL

सोना कितना सोना है ?

In अंतरिक्ष, तारे on सितम्बर 20, 2011 at 7:27 पूर्वाह्न

न्यूट्रॉन तारों के टकराव से स्वर्ण निर्माण की संभावना है।

न्यूट्रॉन तारों के टकराव से स्वर्ण निर्माण की संभावना है।

स्वर्ण/सोना मानव मन को सदियों से ललचाता रहा है! लेकिन स्वर्ण की उत्पत्ती कैसे हुयी ? हम यहा पर स्वर्ण खदानो की चर्चा नही कर रहे है, चर्चा का विषय है कि इन खदानो मे स्वर्ण का निर्माण कैसे हुआ है?

हमारे सौर मंडल मे स्वर्ण की मात्रा शुरुवाती ब्रह्माण्ड मे निर्माण हो सकने लायक स्वर्ण की मात्रा के औसत से कहीं ज्यादा है। स्वर्ण निर्माण की यह प्रक्रिया सूर्य मे नियमित रूप से होने वाली हिलीयम निर्माण की प्रक्रिया के जैसे ही है। इस प्रक्रिया मे हायड्रोजन परमाणु के दो नाभिक हिलीयम का नाभिक बनाते है। हिलीयम निर्माण की इस प्रक्रिया से उत्पन्न ऊर्जा के कारण ही सूर्य प्रकाशमान है।

दो हिलीयम के नाभिको के संलयन से कार्बन बनता है, इसी क्रम मे मैग्नेशीयम, सल्फर और कैल्सीयम बनते है। विभिन्न तत्वो के संलयन के फलस्वरूप अन्य भारी तत्व बनते है। लेकिन लोहे के नाभिको के निर्माण की प्रक्रिया तक पंहुचते पहुंचते यह प्रक्रिया धीमी हो जाती है क्योंकि यह प्रक्रिया ऊर्जा उत्पन्न करने की बजाये ऊर्जा लेना शुरू कर देती है। स्वर्ण(परमाणु क्रमांक 79) लोहे(परमाणु क्रमांक 27) से बहुत ज्यादा भारी तत्व है। सूर्य जैसे तारो मे स्वर्ण निर्माण असंभव होता है!

स्वर्ण आया कहां से ?

एक संभावना सुपरनोवा विस्फोट की है। सुपरनोवा विस्फोट की प्रचंड ऊर्जा और दबाव मे लोहे से ज्यादा भारी तत्व बन सकते है। सूर्य दूसरी पिढी़ का तारा है। यह किसी तारे के सुपरनोवा विस्फोट के पश्चात बचे पदार्थ से बना है। लेकिन सुपरनोवा विस्फोट से भी इतनी मात्रा मे स्वर्ण नही बन सकता है जितना हमारे सौर मंडल मे है !

प्रश्न वहीं है स्वर्ण आया कहां से ?

वैज्ञानिको ने एक नया सिद्धांत प्रस्तुत किया है। न्युट्रान से भरे नाभिक वाले तत्व जैसे स्वर्ण दो न्युट्रान तारो के टकराव से आसानी से बन सकते है। इस तरह के न्युट्रान तारो के टकराव द्वारा लघु अवधी वाला गामा किरण विस्फोट(GRB) भी होता है। प्रस्तुत चित्र दो न्युट्रान तारों के टकराव को दर्शा रहा है। चित्र कल्पना आधारित है।

ये विस्फोट विनाशकारी होते है! क्या आपके पास इन महाकाय विस्फोटो की कोई निशानी है ?

ओमेगा सेन्टारी तारा परिवार : तारो का गोलाकार समूह(Globular Cluster)

In अंतरिक्ष, तारे on सितम्बर 13, 2011 at 9:23 पूर्वाह्न

ओमेगा तारा समूह

ओमेगा तारा समूह

अतरिक्ष मे रेत के एक बड़े गोले के जैसे आकृति वाला कौनसा पिंड है ?

यह एक तारो का गोलाकार समूह(Globular Cluster ) है, इसे ओमेगा सेन्टारी(Omega Centauri (ω Cen) or NGC 5139) के नाम से जाना जाता है। इसे नरतुरंग तारामंडल(Centaurus constellation) के पास देखा जा सकता है।

इस तारा समूह मे सूर्य के आकार और उम्र के 100 लाख तारे है। 2000 वर्ष पहले ग्रीक खगोलवैज्ञानिक टालेमी (Ptolemy)ने इस तारासमूह को एक ही चमकदार तारा समझा था लेकिन 1830 मे जान विलियम हर्शेल ने इसे एक तारा समूह के रूप मे पहचाना था।

पृथ्वी से 15000 प्रकाशवर्ष दूर पर स्थित यह तारा समूह मंदाकिनी आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमा करने वाले लगभग 200 तारा समूहो मे से एक है। इसकी चौड़ायी लगभग 150 प्रकाशवर्ष है। इसकी उम्र लगभग 12 अरब वर्ष है। इस तारासमूह मे तारो का घनत्व अत्याधिक है, इसमे तारो के मध्य औसत दूरी 0.1 प्रकाशवर्ष है। ध्यान दे कि पृथ्वी और उसके सबसे समीप के तारे अल्फा सेंटारी की दूरी 4 प्रकाशवर्ष है। इस तारा समूह मे इतनी दूरी पर 40 तारे आ जायेंगे।

यह तारा समूह नंगी आंखो से दिखायी देने वाले कुछ तारा समूहो मे से एक है। यह माना जाता है कि यह शायद किसी छोटी आकाशगंगा का बचा हुआ केन्द्रक है जिसे मंदाकिनी आकाशगंगा ने किसी समय निगल लिया होगा।

सप्तॠषि तारामंडल का सुपरनोवा अपनी चरम दीप्ती पर

In तारे, ब्रह्माण्ड on सितम्बर 8, 2011 at 7:42 पूर्वाह्न

सप्तऋषी तारामंडल का सुपरनोवा SN2011fe

सप्तऋषी तारामंडल का सुपरनोवा SN2011fe

कुछ सप्ताह पहले खगोलविज्ञानीयों ने M101 आकाशगंगा मे एक सुपरनोवा विस्फोट देखा था। यह एक वर्ग Ia का सुपरनोवा है, जो कि खगोलीय दूरीयों की गणना मे प्रयुक्त होते है। यह सुपरनोवा अपनी इस विशेषता के कारण महत्वपूर्ण होते है और इस तरह के सुपरनोवा को अपने इतने समीप 260 लाख प्रकाश वर्ष दूरी पर पाना दुर्लभ होता है। (खगोलीय पैमाने पर 260 लाख प्रकाश वर्ष छोटी दूरी है।)

प्रस्तुत चित्र आक्सफोर्ड विश्विद्यालय द्वारा कैलीफोर्निया स्थित अंतरिक्ष वेधशाला से लिया गया है।

इस सुपरनोवा की खोज पालोमर ट्रान्जीएन्ट फ़ैक्टरी(Palomar Transient Factory) के वैज्ञानिको ने की थी और अस्थायी नाम PTF 11kly दिया था। अब इसे स्थायी नाम SN2011fe दिया गया है। 2011 मे खोजा गया यह 136 वाँ सुपरनोवा है। (सुपरनोवा के नाम रोमन अक्षरो पर रखे जाते है, पहले 26 सुपरनोवा SN2011a-z थे, उसके पश्चात अगले 26 सुपरनोवा SN2011aa-az थे।)

यह चित्र 0.8 मीटर दूरबीन से लास कम्ब्रेस वेधशाला वैश्विक वेधशाला संजाल( the Las Cumbres Observatory Global Telescope Network) से लिया गया है। यह एक अपेक्षाकृत छोटी दूरबीन है अर्थात यह सुपरनोवा काफी चमकदार पिंड है।

यह सुपरनोवा अपनी चरम दीप्ती पर पहुंच रहा है और अब यह बायनाकुलर या छोटी दूरबीन से दिखायी देना चाहीये। यदि आप सप्तऋषि तारामंडल की ओर देंखे तो इसे खोज पाना कठीन नही होगा। सुपरनोवा सामान्यतः अपने चरम दीप्ती पर पहुंचने के लिए 1-2सप्ताह लेते है और उसके पश्चात धीमे धीमे धुंधले होते जाये है। यदि आप इसे आज-कल मे नही देख पाये तो परेशानी नही है लेकिन ज्यादा देर ना करें। ऐसे मौके दुर्लभ होते है।

अनंत समुद्र मे एक छोटे से द्विप पर असहाय से हम : पृथ्वी और चंद्रमा

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान, पृथ्वी on सितम्बर 6, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

जुनो द्वारा लिया गया पृथ्वी और चंद्रमा का चित्र

जुनो द्वारा लिया गया पृथ्वी और चंद्रमा का चित्र

सौर मंडल के सबसे बड़े गैस महाकाय ग्रह बृहस्पति की यात्रा पर निकले अंतरिक्ष यान जुनो(Juno)ने मुड़कर अपने घर पृथ्वी की ओर देखा और यह चित्र लिया। यह चित्र पृथ्वी और चंद्रमा का हैं। इस चित्र मे पृथ्वी का नीला रंग स्पष्ट है। जब यह चित्र लिया तब जुनो पृथ्वी से 60 लाख किमी दूरी पर था।

यह चित्र हमारी पृथ्वी की बाह्य अंतरिक्ष से दिखायी देनी वाली छवि दर्शाती है तथा यह छवि हमे इस अनंत, विशाल अंतरिक्ष मे हमारा किरदार तथा स्थान दिखाती है। हम अपना एक नगण्य लेकिन खूबसूरत चित्र देखते है।

यह चित्र हमे 1990 मे कार्ल सागन द्वारा वायेजर 1 द्वारा लिये गये पृथ्वी के चित्र को दिये गये नाम Pale Blue Dot(धूंधला नीला बिंदू) की याद दिलाता है।

यह चित्र मुझे पेण्डुलम बैंड के गीत प्रेल्यूड/स्लैम की भी याद दिलाता है :

Somewhere out there in the vast nothingness of space,
Somewhere far away in space and time,
Staring upward at the gleaming stars in the obsidian sky,
We’re marooned on a small island, in an endless sea
Confined to a tiny spit of sand, unable to escape,
But tonight, on this small planet, on earth
We’re going to rock civilization…
– Lyrics from “Prelude/Slam,” Pendulum

हिन्दी भावानुवाद

कहीं पर अंतरिक्ष के विराट अंतराल मे
कहीं दूर समय और अंतराल मे
शीशे के जैसे आकाश मे चमकते तारो को घूरते हुये
अनंत समुद्र मे एक छोटे से द्विप पर असहाय से हम
एक छोटे से रेत के कण से बंधे, मुक्त होने मे असमर्थ हम
लेकिन आज रात, इस छोटे से ग्रह पर, पृथ्वी पर
सभ्यता को हिलाकर रख देंगे हम …….

कार्ल सागन के अनुसार

“हम जो कुछ भी जानते है और जिससे प्यार करते हैं, इस छोटे से बिंदू पर अस्तित्व मे है। सब कुछ….”