अविश्वसनीय, अद्भुत और रोमाँचक: अंतरिक्ष

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सीगार आकाशगंगा(M82)

In आकाशगंगा, ब्रह्माण्ड on जनवरी 18, 2011 at 8:26 पूर्वाह्न

सीगार के आकार की एम ८२ आकाशगंगा

सीगार के आकार की एम ८२ आकाशगंगा

सीगार आकाशगंगा(M82) किससे प्रकाशमान हो रही है ? एम ८२ एक अनियमित आकार की आकाशगंगा है। हाल ही मे यह विशालकाय पेंचदार आकाशगंगा एम ८१ के पास से गुजरी है जिस कारण से इस आकाशगंगा मे काफी हलचल हुयी है। लेकिन यह हलचल भी लाल रंग मे चमकती हुयी बाहर की ओर विस्तृत होती हुयी गैस के कारण को समझाने मे असमर्थ है। हालिया प्रमाणो के अनुसार यह गैस कई सारे तारो द्वारा उत्सर्जित कणो की वायू से बन रही है और एक आकाशगंगीय आकार की महा-वायू बना रही है। इस चित्र के लाल रंग के हिस्से आयोनाइज्ड हायड़्रोजन गैस के कारण है, जो इस गैस के चमकते हुये तंतुओ को दिखा रहे है। यह लाल रंगे के तंतु १०,००० प्रकाशवर्ष चौड़े है। १२० लाख प्रकाशवर्ष दूर की यह सीगार के आकार की आकाशगंगा अवरक्त(Infrared) किरणो मे सबसे चमकदार आकाशगंगा है। इसे साधारण प्रकाश के रंगो मे छोटी दूरबीन से सप्तऋषि तारामंडल के पास देखा जा सकता है।

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हैन्नी का वूरवेर्प

In अंतरिक्ष, निहारीका, ब्रह्माण्ड on जनवरी 12, 2011 at 6:17 पूर्वाह्न

हब्बल दूरबीन से लीये गये इस चित्र को देखीये। पहली नजर मे देखने पर यही लगेगा की यह एक स्पाइरल के आकार आकाशगंगा है। लेकिन इस आकाशगंगा के निचे देखीये…..

हैन्नी का वूरवेर्प

हैन्नी का वूरवेर्प

ये अजीब सी हरी वस्तु क्या है ?

ये है हैन्नी का वूरवेर्प(Voorwerp)! चित्र पर क्लीक किजिये और इसे बड़े आकार मे देखीये…अब आप पुछेंगे कि ये वूरवेर्प क्या है ? यह डचभाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है “वस्तु“। वस्तु ? लेकिन अंतरिक्ष मे ये विशालकाय वस्तु क्या है ?

हैन्नी वान अर्केल ने इस वूरवेर्प को खोजा था और मजे की बात यह है कि हैन्नी खगोलविज्ञानी नही है। हैन्नी डच महारानी के गिटार-वादक ’ब्रायन मे’ का ब्लाग पढ रही थी जो कि एक खगोलविज्ञानी भी है। उस ब्लाग मे ब्रायन ने एक प्रोजेक्ट ’गैलेक्सी जू’ के बारे मे लिखा था, इस प्रोजेक्ट मे आप अपने कम्युटर पर आकाशगंगाओ को वर्गीकृत कर सकते है। हैन्नी ने इस प्रोजेक्ट को खोला और आकाशगंगाओ को देखना शुरू किया। किसी तरह उसने इस विचित्र सी हरी रंग की वस्तु को देखा। उसने खगोलविज्ञानीयो से इस वस्तु के बारे मे पुछा। अब खगोल विज्ञानीयो ने इस पर ध्यान दिया और हब्बल दूरबीन से इसका विचित्र चित्र लिया और यह चित्र आपके सामने है।

यह क्या है ? हरा रंग यह बताता है कि यह एक महाकाय गैस का बादल है, और हरा रंग इसे प्रदिप्तीत आक्सीजन से प्राप्त हो रहा है। लेकिन इस बादल के पास प्रकाश का कोई साधन नही है, यह प्रकाश उसे पास की आकाशगंगा से प्राप्त हो रहा होगा। यह गैस का हरे रंग का वूरवेर्प हमारी आकाशगंगा के बराबर विशालकाय है, पूरे १००,००० प्रकाशवर्ष चौड़ा !

यह माना जाता है कि इस आकाशगंगा के मध्य एक “महाकाय श्याम विवर (Super Massive Black Hole)” है जिसे IC २४९७ नाम दिया गया है। एक लंबे अंतराल से यह श्याम विवर पदार्थ को निगले जा रहा है। किसी श्याम विवर मे पदार्थ के निगलने से पहले घटना क्षितीज(Event Horizon) पर एक श्याम विवर के आसपास एक तश्तरी बन जाती है। यह तश्तरी श्यामविवर मे गीर रहे पदार्थ के घर्षण और गुरुत्वाकर्षण से गर्म होती है और विभिन्न बलो के क्रियाशील होने से यह दो विपरित दिशाओ मे उर्जा और पदार्थ की धारा(Jet) प्रवाहित करना प्रारंभ कर देती है।

इसी समय पर आकाशगंगा के बाहर हजारो प्रकाशवर्ष चौड़ा गैस का बादल शांत अवस्था मे रहा था। अचानक IC २४९७  के केन्द्र के श्याम विवर द्वारा उत्सर्जित उर्जा और पदार्थ की धारा इस बादल से टकरायी , इस धारा ने उसे प्रकाशित कर दिया और यह बादल किसी नियानलाईट(सच्चाई मे आक्सीजन लाईट) के जैसे प्रदिप्त हो उठा।

किसी समय, लगभग २००,००० वर्ष पहले IC २४९७  के केन्द्र के श्याम विवर मे पदार्थ का जाना रूक गया। शायद श्याम विवर के आसपास पदार्थ खत्म हो गया, जिससे इसकी तश्तरी से उर्जा और पदार्थ की धारा का उत्सर्जन रूक गया। लेकिन वूरवेर्प अभी तक प्रदिप्तित है क्योंकि गैस को अपनी चमक खोने मे लम्बा समय लगता है, लेकिन एक समय आने पर यह वूरवेर्प चमकना बंद कर देगा और हमारी निगाहों से ओझल हो जायेगा।

विज्ञानीयो के लिये यह एक असाधारण पिंड है। इसके जैसा पिंड इसके पहले देखा नही गया है इसलिये इसके बारे मे हर जानकारी नयी है।

अंतरिक्ष मे एक नाजूक वलय : एस एन आर ०५०९

In अंतरिक्ष, निहारीका on जनवरी 6, 2011 at 5:58 पूर्वाह्न

अंतरिक्ष में मेरे पसंदीदा पिंडो में है तारो के मरने समय सुपरनोवा विस्फोट के बाद बनी गैस कवच निहारीकाये ! साबुन के झाग के बुलबुले जैसी ये निहारिका SNR 0509 ! हब्बल दूरबीन द्वारा ली गयी इस वलयाकार निहारिका कितनी सुन्दर है ?

 

एस एन आर ०५०९: वलय निहारिका

एस एन आर ०५०९: वलय निहारिका

अंतरिक्ष में ऐसी कई और भी निहारिकाये है ! जैसे हेलिक्स निहारिका जो निचे दी गयी तस्वीर में है. हेल्किश निहारिका और  SNR 0509 में एक अंतर यह है कि हेलिक्स निहारिका का वलय मोटा है लेकिन SNR 0509  का वाले काफी पतला है| ऐसा क्यों ?

हेलिक्स निहारिका

हेलिक्स निहारिका

पहले यह समझना जरूरी है कि इस तरह के पिंड कैसे बनते है ? जब कम द्रव्यमान वाला सूर्य जैसे तारा मरता है वह परमाण्विक कणो एक खगोलिय वायू मे उड़ा देता है। यह सौर वायू जैसे होती है लेकिन काफी घनी होती है। इसकी भौतिकी जटिल है लेकिन सरल रूप मे कह सकते है कि तारे के बुढे़ होने पर इस तारे से निकलने वाली परमाण्विक कणो की वायू की गति बढते जाती है। तेज कण धीमे कणो से टकराते है और चमकने लगते है और इस तरह ग्रहीय निहारिका बनती है। चित्र मे दिखायी गयी हेलीक्स निहारिका के जैसे।

कुछ मामलो मे ग्रहीय निहारिका एक वलय जैसे दिखायी देती है जो कि “लिंब ब्राइटनींग(Limb Brightening)” के कारण है। यदि तारे की वायू स्थिर हो तो वह तारे के चारो ओर एक बड़ी गोलाकार निहारिका बनाती है। लेकिन तेज वायू इस गोले को खोखला करते हुये एक खोखले गोले का कवच जैसा बनाती है। जब गैस प्रदिप्त होती है यह अंतरिक्ष मे एक साबून के बुलबुले के जैसे दिखती है क्योंकि किनारो पर केन्द्र की तुलना मे ज्यादा गैस होती है। बाजू मे दिया चित्र देखें। कल्पना करे कि आप एकदम दायें है और बायें गैस के गोलाकार कवच  को देख रहे है। जब आप केन्द्र के आरपार देखते है तब आपको किनारो की तुलना मे कम गैस दिखायी देती है। क्योंकि गैस प्रदिप्त हो रही है; जितनी देर आप उसे देखेंगे वह और चमकिली दिखेगी।  इसलिये निहारिका एक वृताकार  आकार मे किनारो पर चमकती है और मध्य मे अंधेरी होती है, जो एक वलय के रूप मे दिखती है।

यह जानना जरूरी है कि गैस पारदर्शी होती है। यदि वह एक दिवार की तरह अपारदर्शी होती, तब निहारिका एक वलय की जगह एक तश्तरी की तरह दिखायी देती। प्रकाश किरणे गैस के आरपार चली जाती है। इससे कोई फर्क नही पड़ता कि गैस का परमाणू गोलाकार कवच के निकट भाग मे है या दूरस्थ भाग मे; यदि वह प्रकाश उत्सर्जित करता है, वह दिखायी देगा। इससे भी कोई फर्क नही पड़ता कि आप किस दिशा से देख रहे है क्योंकि वह गोलाकार कवच के रूप मे है, आप कही भी हो वह एक वलय के रूप मे ही दिखेगा !

इस तरह की निहारिकाओ के बाह्य किनारे एक दम साफ होते है लेकिन अंदरूनी किनारे धूंधले और मोटे होते है। SNR ०५०९ को देखें, उसके बाह्य किनारे कितने साफ है लेकिन अंदरूनी हिस्सा धूंधला है लेकिन ज्यादा नही। SNR ०५०९ अलग क्यों है ?
इसका उत्तर इसके नाम मे ही है। SNR का मतलब है SuperNovaRemanant। अर्थात सुपर नोवा के अवशेष। यह कोई शांत तरिके से मृत तारा नही है, यह एक विस्फोट मे मृत तारा है। जब यह होता है भौतिकि अलग होती है। सुपरनोवा विस्फोट मे विस्तृत होते पदार्थ की गति अत्याधिक होती है जोकि हजारो किमी प्रति सेकंड हो सकती है। छोटे तारो की मृत्यू मे यह सैकड़ो किमी/सेकंड हो सकती है। इसके अतिरिक्त तारो के मध्य मे काफी सारा पदार्थ तैरते रहता है जो सुपरनोवा विस्फोट से उत्सर्जित पदार्थ से और ज्यादा गति से टकराता है। इससे गैसे और ज्यादा शक्ति से संपिड़ित होती है और आघाततरंगे(Shock Wave) बनाती है। इससे और पतला वलय बनता है।

 

एस एन आर ०५०९ की X Ray तस्वीर

एस एन आर ०५०९ की X Ray तस्वीर

SNR ०५०९ का वलय २० प्रकाशवर्ष चौड़ा है और ५००० किमी/सेकंड की गति से विस्तृत हो रहा है। ग्रहीय निहारिका सामान्यतः १ से २ प्रकाशवर्ष चौड़ी होती है। किसी सुपरनोवा का विस्फोट ही किसी तारे की ऐसी हालत कर सकता है।
हमारा सूर्य इतना बड़ा नही है कि उसमे सुपरनोवा विस्फोट होगा। अपनी मृत्यू के समय वह ग्रहीय निहारिका का पथ चुनेगा। लेकिन यह भी माना जाता है कि सौर मंडल के निर्माता गैस के बादल को पास ही के किसी सुपरनोवा विस्फोट की आघात तरंगो ने सौर मंडल के निर्माण के लिये संपिडित किया था।

जब हम SNR ०५०९ जैसे पिंडो को देखते है हम अपना भूतकाल और भविष्य दोनो ही देखते है। तारो की मौत कितनी ही विस्फोटक क्यो ना हो कितनी सूंदर होती है !