अविश्वसनीय, अद्भुत और रोमाँचक: अंतरिक्ष

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सुंदरता का राज

In ग्रह, सौरमण्डल on जनवरी 31, 2007 at 12:20 अपराह्न

शनि की सुंदरता का राज क्या है ? निश्चय ही उसके सुंदर वलय !

१७०० मे जब गैलेलियो ने शनि को अपनी दूरबीन से देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गया। उसे शनि के दोनो ओर उभार दिखायी दिये। उसने अपने सहयोगी से कहा “ऐसा लगता है कि शनि के दो कान भी है !”

उपर दी गयी तस्वीर कासीनी उपग्रह से ली गयी तस्वीरो को जोड कर एक चलचित्र है। इस चित्र मे शनि के चन्द्रमा टाईटन की कक्षा के अंदर के चन्द्र्मा और वलय दिखायी दे रहे है। इस चित्र मे आप शनि के वलय बनाने वाले कणो का घनत्व और चमक देख सकते है। चित्र मे शनि के चन्द्रमा एनक्लीडस, मीमीस, जनुस, एपीअमेथेस, प्रामेथस और पैण्डोरा को भी देख सकते है। शनि के ये वलय शनि की परिक्रमा करते है लेकिन ये शनि को छुते नही है।

शनि के मुख्य रूप से सात वलय है। जो शनि से दूरी के अनुसार D,C,B,A,F,G,E के नाम से जाने जाते है।

शनि के मुख्य वलय

वलय A और वलय B के मध्य एक खाली जगह है जिसे कासीनी अंतराल कहते है। ये वलय चमत्कारीक रूप से पतले है, इनकी चौडाई १०० किमी से भी ज्यादा है लेकिन मोटाइ १०० मिटर के आसपास है। ये कुछ इस तरह है कि किसी फुटबाल के मैदान पर एक टीश्यु पेपर को फैला दिया जाये।

शनि के वलय

वलय A: यह वलय शनि की दो सबसे चमकदार वलयो मे से बाहरी वलय है। एक छोटा सा चन्द्रमा एटलस इस वलय के कुछ बाहर ही शनि की परिक्रमा करता है। इस वलय के बाहरी किनारे के पास एक छोटा अंतराल है जिसे एंके अंतराल कहते है। इस अंतराल मे भी शनि का एक छोटा सा चन्द्रमा पैन परिक्रमा करता है। इस अंतराल से बाहर एक अपेक्षाकृत छोटा अंतराल (कीलर अंतराल Keelar)और है जिसमे भी एक चन्द्रमा डैफनीस परिक्रमा करता है।

कासीनी अंतराल : शनि के मुख्य वलय A और B के मध्य का अंतराल। यह बडा अंतराल है। इस अंतराल मे चन्द्रमा मीमास परिक्रमा करता है।

वलय B : यह वलय A की तुलना मे ज्यादा घना है , इतना घना है कि ये एक अपारदर्शी वलय है। इसे बनाने वाले कण कीसी तरल पदार्थ की तरह शनी की परिक्रमा करते है। यह वलय अनेक छोटे छोटे वलय से बना एक बडा वलय प्रतित होता है। इसमे हब्बल और कासीनी उपग्रह ने स्पोक के जैसी संरचना भी देखी है।

वलय C: यह वलय B वलय से अंदर है। इसका घन्त्व कम है और लगभग पारदर्शी है।

वलय D : यह वलय D वलय से अंदर है, ये काफी धुंधला वलय है।

वलय F : यह वलय A वलय के बाहर है। इसे पायोनियर ११ ने देखा था।

वलय G और E : ये शनी के बाहरी और धुंधले वलय है।

दो सितारों का मिलन !

In आकाशगंगा, ब्रह्माण्ड on जनवरी 30, 2007 at 6:49 अपराह्न

ये क्या हो रहा है ? क्या किसी जलधारा मे दो भंवरो का मिलन है ?

ये मिलन ही है लेकिन जमीं पर नही आकाश मे, दो सितारों का नही दो आकाशगंगाओ का!

आज से खरबो वर्ष बाद सिर्फ इनमे से एक ही आकाशगंगा बचेगी। तब तक दोनो पेंचदार(Spiral) आकाशगंगाये NGC 2207 और IC 2163 धीरे धीरे एक दूसरे को खिंचते हुये, पदार्थ की लहरे , गैस की चादर और धूल की गलियां , तारे और बाहर फेंके जाने वाले तारो की धाराओ का निर्माण करेंगी। विज्ञानीयो का अनुमान है कि बडी आकाशगंगा NGC 2207 जो बायें दिखायी दे रही है छोटी आकाशगंगा IC 2163 को अपने मे समाहित कर लेगी।

यह घटना आज से ४०० लाख वर्ष पहले घटना शुरु हुयी थी, इसमे छोटी आकाशगंगा बडी आकाशगंगा के चारो ओर चक्कर लगाते हुये उसमे समाहीत होते जा रही है। इन आकाशगंगाओ के टकराव मे तारो का टकराव सामान्यतः नही होता क्योंकि आकाशगंगा मे तारो के बीच काफी खाली जगह होती है।

चुहो का महायुद्ध

दो महाकाय आकाशगंगाये एक दूसरे को खिंच रही है। इन्हे चुहा इसलिये कहा गया है क्योंकि इनकी लंबी पुंछ है। ये पेंचदार आकाशगंगाये शायद एक दूसरे के पास से गुजर चुकी है। शायद इन दोनो का भविष्य मे फिर से टकराव होगा और ये सीलसीला चलता रहेगा जब तक ये दोनो मिल कर एक आकाशगंगा नही बना लेती। इनकी लम्बी पुंछ का निर्माण दोनो आकाशगंगा के पास और दूर के हिस्सो के बीच सापेक्ष गुरुत्वाकर्षण बल के अंतर के कारण हुआ है।

दोनो आकाशगंगा के मध्य दूरी काफी ज्यादा होने से इनके बीच ब्रम्हांडिय टकराव की प्रक्रिया धीमी गति से हो रही है। यह लगभग पिछले लाखो वर्षो से जारी है। ये आकाश गंगाये NGC 4676 हमसे ३००० प्रकाशवर्ष दूरी पर है,

लाखों तारे आसमां मे

In आकाशगंगा, तारे, ब्रह्माण्ड on जनवरी 29, 2007 at 6:27 अपराह्न

सामान्यत: तारे अकेले ना होकर एक समुह(Cluster) मे रहते है। तारासमुह दो तरह के होते है खुले हुये और गोलाकार ।

खुले हुये तारासमुह
ये कभी कभी आकाशगंगीय तारा समुह भी कहलाते है क्योंकि ये तारासमुह तुलनात्मक दृष्टी से हमारे करीब तो है ही और वे हमारी आकाशगंगा मंदाकीनी मे हमारे प्रतल मे ही है। खुले तारासमुहो मे कुछ दर्जन तारो से लेकर कुछ सौ तारे हो सकते है। ये माना जाता है कि ये सभी तारे एक ही निहारिका से निर्मित है और समान सापेक्ष गति रखते है। इसी वजह से एक समुह के तारे विभीन्न दिशाओ मे गति करते हुये तारासमुह को छितराते जाते है। ये तारासमुह नष्ट भी हो सकते है लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब कोई महाकाय तारा तारासमुह के पास से गुजरे और अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से विभीन्न तारो की गति को प्रभावित कर दे।

कुछ तारा समुह मे कुछ तारे बाकी तारो की बजाय ज्यादा प्रकट होते है, ये उस तारे की चमक या स्थिती से भी हो सकता है। चित्र मे दिखाया गया तारासमुह “कृतिका नक्षत्र” है जिसे पश्चिम मे “सात बहने Seven Sisters” या Pleiades कहते है। यह तारा समुह प्रागऐतिहासिक समय(७०० -१००० BC) से ज्ञात है। इसे वैज्ञानिक शब्दावली मे M45 कहते है, यह लगभग ४४० प्रकाशवर्ष दूर है। इस तारासमुह के ७ तारे नंगी आंखो से दिखायी देते है लेकिन दूरबीन से इसके १४ तारे देखे जा सकते है। लेकिन ये इस तारासमुह के सबसे ज्यादा चमकिले तारे है, असलियत मे इस तारासमुह मे ५०० से ज्यादा तारे है।
एक नये खुले तारासमुह मे तारो के बीच मे अपने मातृ निहारिका का बचा हुआ पदार्थ होता है। जो धीरे धीरे तारो के विकीरण , गुरुत्व के कारण नष्ट हो जाता है। लेकिन कृतिका के मामले मे ऐसा नही है, इस तारा समुह के बीच मे जो पदार्थ दिखायी देता है वह किसी और निहारीका है।

कृतिका(M40/Pleiades/Seven Sisters) तारासमुह

गोलाकार तारासमुह(Globular Star Cluster)
ये तारासमुह खुले तारासमुह से काफी अलग होते है। हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी के केन्द्र मे इस तरह का एक भी तारासमुह नही है, सभी गोलाकार तारासमुह हमारी आकाशगंगा के बाहरी हिस्से मे ही है। मंदाकिनी मे १५० ज्ञात गोलाकार तारासमुह है। अन्य आकाशगंगाओ मे गोलाकार तारासमुह हो सकते है लेकिन जरूरी नही है। ऐण्ड्रोमीडा आकाशगंगा (M31) मे ऐसे हजारो तारासमुह है। जबकि वामन आकाशगंगा धनु(Sagittarius) मे एक भी गोलाकार तारासमुह नही है।

गोलाकार तारासमुह M80

नाम के अनुसार गोलाकार तारासमुह एक गेंद की तरह गोल होते है जबकि खुले तारासमुह मातृ निहारिका के आकार मे ही होते है। गोलाकार तारासमुह मे हजारो ,लाखो तारे हो सकते है।

गोलाकार तारासमुह ब्रम्हाण्ड निर्माण के समय बने सबसे पहले पिण्ड मे से एक है और ये आज अरबो वर्ष बाद भी है। हमारी आकाश गंगा के गोलाकार तारासमुह की आयु कम से कम ११.३ अरब वर्ष है। इससे हमे ब्रम्हांड की आयु ज्ञात करने मे भी सहायता मिलती है। ब्रम्हांड की आयु किसी तारे की आयु से कम नही हो सकती ।

अधिकतर गोलाकार तारासमुह तारो से बनी एक विशालकाय गेंद के आकार मे है, लेकिन इनके आकार मे अंतर है। यदि हमारा सुर्य कीसी गोलाकार तारासमुह का भाग होता तब रात कभी नही होती !

ब्रम्हाण्ड मे एक समुद्री बीच

In अंतरिक्ष, आकाशगंगा on जनवरी 28, 2007 at 1:14 पूर्वाह्न

 ब्रम्हाण्डीय बीच(beach) पर रेत के कणो के जैसे फैले हुये तारे! यह तस्वीर है एक स्पायरल के आकार की आकाशगंगा NGC 1313 की। तस्वीर हब्बल दूरबीन से ली गयी है। गैलेलीयो की दूरबीन से लेकर हब्बल दूरबीन तक का यह सफर कितना रोमांचक है ?

आज तकनिक इतनी उन्नत हो गयी है कि हब्बल १४० लाख प्रकाश वर्ष दूर इस आकाशगंगा के तारो के देख पा रहे है। इस आकाशगंगा से हमे तारा समुहो (Star Cluster) के नये चमकीले तारो के अध्यन से ब्रम्हाण्ड के भविष्य के बारे जानकारी प्राप्त होगी। यह आकाश गंगा (NGC 1313)तारो के निर्माण और तारा समुहो के निर्माण के बारे मे जो सुचना देती है उससे हमे अपनी आकाश गंगा मंदाकिनी के बारे ज्यादा जाने मे मदद होगी ।

न्युट्रान तारे और पल्सर

In अंतरिक्ष, तारे on जनवरी 27, 2007 at 1:24 पूर्वाह्न

न्युट्रान तारे ये मृत तारे का अत्यंत सघन रूप है, जो कि सिर्फ न्युट्रान से बने होते है। न्युट्रान तारो का एक उपवर्ग पल्सर भी है। इन्हे पल्सर इसलिये कहा जाता है क्योंकि ये विद्युत चुंबकिय विकीरण(Electro Magnetic radiation) की पल्स उत्सर्जीत करते रहते है।

न्युट्रान तारा
नाम के अनुसार ये तारे न्युट्रान से बने होते है। ये उन तारो के अवशेष होते है जिनका द्र्व्यमान १.४ से ९ सौर द्रव्यमान के बीच होता है। तारे के नोवा बनने के बाद उसका केन्द्रक सिकुड जाता है और उसकी बाहरी तहे अंतरिक्ष मे विस्फोट द्वारा उतसर्जीत होकर निहारीका (Nebula)बनाती है। गुरुत्वाकर्षण केन्द्रक को और सिकुडने और सघन होने पर मजबूर करता है। यह केन्द्रक कुछ सेकण्डो मे कुछ किमी(२५ किमी) के गोले मे बदल जाता है। ये इतना सघन होता है कि एक सूई की नोक के बराबर के पदार्थ का द्रव्यमान हजारो टन मे होगा।

न्युट्रान तारा

पृथ्वी के साधारण वातावरण मे यह घटना असंभव है। एक परमाणु मे काफी इलेक्ट्रान और नाभिक के बिच काफी सारी खाली जगह होती है जो कि चार मूलभूत बलो मे से एक विद्युत चुम्बकिय बल के कारण होती है। ये बल इलेक्ट्रान को नाभिक से दूर रखता है। जब यह विद्युत चुम्बकिय बल कार्यशील होता है, तारा सिकुडकर न्युट्रान तारे के आकार मे नही आ सकता। लेकिन तारे का द्र्व्यमान बहुत ज्यादा होने पर गुरुत्वाकर्षण(मूलभूत बलो मे से एक) विद्युत चुम्बकिय बल से ज्यादा प्रभावी हो जाता है। इन्ही कुछ क्षणो मे विद्युत चुम्बकिय बल टूट जाता है और गुरुत्वाकर्षण  के दबाव मे इलेक्ट्रान प्रोटान से मिलकर न्युट्रान बना देते है। और जो भी कुछ बचता है वह सिर्फ न्युट्रान तथा एक अत्यंत सघन न्युट्रान तारा जन्म लेता है।

सुपरनोवा के अवशेष और न्युट्रान तारा

न्युट्रान तारा की रचना काफी आसान होती है। इसकी तीन तहे होती है। एक ठोस केन्द्रक, एक तरल आवरण और एक पतली बाहरी परत। न्युट्रान तारो का  एक बहुत पतला कुछ सेंटीमीटर (१ इंच) का वातावरण भी होता है जो कि तारे के कार्य के लिये महत्वपूर्ण नही होता है। न्युट्रान तारे के भी दो अक्ष होते है। चुम्बकिय अक्ष और घुर्णन अक्ष। पृथ्वी की तरह ये दोनो अक्ष भी एक साथ नही होते है।

पल्सर

ये भी न्युट्रान तारे होते है लेकिन एक विशेषता के साथ। पल्सर अंतरिक्ष मे  दो अत्याधिक उर्जा वाली तरंगे उत्सर्जित करता है जो कि उसकी चुंबकिय अक्ष के पास सघन होती है। यह चुंबकिय बल पृथ्वी के चुंबकिय बल से १० खरब गूना ज्यादा शक्तिशाली होता है। ये तरंगे सामान्यतः किसी साथी तारे से प्राप्त किये पदार्थ की होती है, जिसमे कणो की गति को प्रकाश की गति के २०% तक त्वरीत कर दिया गया होता है।

एक कलाकार की कल्पना मे पल्सर

पल्सर निरिक्षणो के अनुसर काफी तेज घुर्णन करते है, अधिकतर एक सेकंड मे एक घुर्णन करते है। सबसे तेज पल्सर एक सेकंड मे ६४२ घुर्णन करता है और सबसे धीमा ४.३०८ सेकंड मे एक। यह तेजी कोणीक गति के संरक्षण(Law of conservation of angular momentum) के नियम के अतर्गत होती है। इस नियम के अनुसार यदि कोई  पिण्ड एक गति से घुर्णन कर रहा है और उस पिण्ड का आकार कम हो जाता है लेकिन द्रव्यमान अपरिवर्तित रहता है तब उसकी घुर्णन गति बढ जाती है। इसका उदाहरण स्केटर है, वे स्केटींग करते हुये घुर्णन करते समय घुर्णन गति बढाने के लिये अपने हाथ सिकोड कर शरीर के पास ले आते है जबकि घुर्णन गति कम करने के लिये हाथ सिधे कर लेते है।

पल्सर भी धीमे पडते जाते है और रूक जाते है क्योंकि ये अपनी उर्जा तरंग के रूप मे अंतरिक्ष मे भेजते है जिसे गुरुत्विय तरंग कहते है। यह गुरुत्विय तरंग सभी गतिज महाकाय पिंड से उत्सर्जित होती है और इसकी गति प्रकाशगति के तुल्य होती है। घुर्णन से रूकने के बाद की स्थिती मे पल्सर एक साधारण न्युट्रान तारा बन जाता है।

कुछ दूर्लभ मौको पर दो न्युट्रान तारे एक युग्म तारे के रूप मे बंध जाते है। उर्जा के ह्रास के कारण ये स्पायरल के जैसे एक दूसरे की परिक्रमा करते हुये पास आते जाते है। अंत मे दोनो मिल जाते है, इस स्थिती मे वे दोनो मिलकर एक श्याम विवर को जन्म देते है।

तारों का जीवन और मृत्यु

In तारे on जनवरी 26, 2007 at 1:17 पूर्वाह्न

सितारे का जिवनचक्र

सामान्यतः सितारे का जीवन चक्र दो तरह का होता है और लगभग सभी तारे इन दो जीवन चक्र मे से किसी एक का पालन करते है। इन दो जीवन चक्र मे चयन का पैमाना उस तारे का द्रव्यमान होता है। कोई भी तारा जिसका द्रव्यमान तीन सौर द्रव्यमान(१ सौर द्रव्यमान: सूर्य का द्रव्यमान) के तुल्य हो वह मुख्य अनुक्रम (निले तारे से लाल तारे) मे परिवर्तित होते हुये अपनी जिंदगी बिताता है। लगभग ९०% तारे इस प्रकार के होते है। यदि कोई तारा अपने जन्म के समय तीन सौर द्रव्यमान से ज्यादा द्रव्यमान का होता है तब वह मुख्य जीवन अनुक्रम मे काफी कम समय के लिये रहता है, उसका जीवन बहुत कम होता है। जितना ज्यादा द्रव्यमान उतनी ही छोटी जिंदगी और उससे ज्यादा विस्फोटक मृत्यु जो एक न्यूट्रॉन तारे या श्याम वीवर को जन्म देती है।

तारों का अपने जीवन काल मे उर्जा उत्पादन

अपनी जिंदगी के अधिकतर भाग मे मुख्य अनुक्रम के तारे हाइड्रोजन संलयन की प्रक्रिया के द्वारा उर्जा उत्पन्न करते है। इस प्रक्रिया मे दो हाइड्रोजन के परमाणु हिलीयम का एक परमाणु निर्मित करते है। उर्जा का निर्माण का कारण है कि हिलीयम के परमाणु का द्रव्यमान दो हाइड्रोजन के परमाणु के कुल द्रव्यमान से थोड़ा सा कम होता है। दोनो द्रव्यमानो मे यह अंतर उर्जा मे परिवर्तित हो जाता है। यह उर्जा आईन्सटाईन के प्रसिद्ध समीकरण E=mc2 जहाँ E= उर्जा, m=द्रव्यमान और c=प्रकाश गति। हमारा सूर्य इसी प्रक्रिया से उर्जा उत्पन्न कर रहा है। हाइड्रोजन बम भी इसी प्रक्रिया का प्रयोग करते है।

नीचे दी गयी तस्वीर मे दो प्रोटान (हाइड्रोजन का केण्द्रक) मिलकर एक ड्युटेरीयम (हाइड्रोजन का समस्थानिक) का निर्माण कर रहे है। इस प्रक्रिया मे एक पाजीट्रान और एक न्युट्रीनो भी मुक्त होते है। इस ड्युटेरीयम नाभीक पर जब एक प्रोटान से बमबारी की जाती है हिलीयम-३ का नाभिक निर्मित होता है साथ मे गामा किरण के रूप मे एक फोटान मुक्त होता है। इसके पश्चात एक हिलीयम ३ के नाभिक पर जब दूसरे हिलीयम-३ का नाभिक टकराता है स्थाई और सामान्य हिलीयम का निर्माण होता है और दो प्रोटान मुक्त होते है। इस सारी प्रक्रिया मे निर्मित पाजीट्रान किसी इलेक्ट्रान से टकरा कर उर्जा मे बदल जाता है और गामा किरण (फोटान) के रूप मे मुक्त होता है। हमारे सूर्य के केन्द्र से उर्जा इन्ही गामा किरणों के रूप मे वितरीत होती है।


तारो मे नाभिकिय संलयन की प्रक्रिया

हमारा सूर्य अभी इसी अवस्था मे है, नीचे दिये गये आंकड़े सूर्य से संबधित ह॥ सूर्य बाकी अन्य तारों के जैसा ही होने की वजह से ये सभी तारों के प्रतिनिधि आंकड़े माने जा सकते है और हम तारों के कार्य पद्धति के बारे मे समझ सकते है। हर सेकंड सूर्य ५००० लाख टन हाइड्रोजन को हिलीयम मे बदलता है। इस प्रक्रिया मे हर सेकंड ५० लाख टन द्रव्यमान उर्जा मे तब्दील होता है। यह उर्जा लगभग १०२७ वाट की उर्जा के बराबर है। पृथ्वी पर हम इस उर्जा का लगभग २/,०००,०००,००० (२ अरबवां) हिस्सा प्राप्त करते है या x १०१८ वाट उर्जा प्राप्त करते है। यह उर्जा १०० सामान्य बल्बो को ५० लाख वर्ष तक जलाये रखने के लिये काफी है। यह मानव इतिहास से भी ज्यादा समय है।

मुख्य अनुक्रम के तारे की मृत्यु

लगभग १० अरब वर्ष मे एक मुख्य अनुक्रम का तारा अपनी १०% हाइड्रोजन को हिलीयम मे परिवर्तित कर देता है। ऐसा लगता है कि तारा अपनी हाइड्रोजन संलयन की प्रक्रिया को अगले ९० अरब वर्ष तक जारी रख सकता है लेकिन ये सत्य नही है। ध्यान दें कि तारे के केन्द्र मे अत्यधिक दबाव होता है और इस दबाव से ही संलयन प्रक्रिया प्रारंभ होती है लेकिन एक निश्चित मात्रा मे। बड़ा हुआ दबाव मतलब बड़ा हुआ तापमान। केन्द्र के बाहर मे भी हाइड्रोजन होती है लेकिन इतना ज्यादा दबाव नही होता कि संलयन प्रारंभ हो सके।

अब हिलीयम से बना केन्द्र सिकुड़ना प्रारंभ करता है और बाहरी तह फैलते हुये ठंडी होना शुरू होती है, ये तह लाल रंग मे चमकती है। तारे का आकार बड जाता है। इस अवस्था मे वह अपने सारे ग्रहो को निगल भी सकता है। अब तारा लाल दानव(red gaint) कहलाता है। केन्द्र मे अब हिलीयम संलयन प्रारंभ होता है क्योंकि केन्द्रक संकुचित हो रहा है, जिससे दबाव बढ़ेगा और उससे तापमान भी। यह तापमान इतना ज्यादा हो जाता है कि हिलीयम संलयन प्रक्रिया से भारी तत्व बनना प्रारंभ होते है। इस समय हिलीयम कोर की सतह पर हाइड्रोजन संलयन भी होता है क्योंकि हिलीयम कोर की सतह पर हाइड्रोजन संलयन के लिये तापमान बन जाता है। लेकिन इस सतह के बाहर तापमान कम होने से संलयन नही हो पाता है। इस स्थिती मे तारा अगले १००,०००,००० वर्ष रह सकता है।


मीरा (Meera Red Gaint) लाल दानव

इतना समय बीत जाने के बाद लाल दानव का ज्यादातर पदार्थ कार्बन से बना होता है। यह कार्बन हिलीयम संलयन प्रक्रिया मे से बना है। अगला संलयन कार्बन से लोहे मे बदलने का होगा। लेकिन तारे के केन्द्र मे इतना दबाव नही बन पाता कि यह प्रक्रिया प्रारंभ हो सके। अब बाहर की ओर दिशा मे दबाव नही है, जिससे केन्द्र सिकुड जाता है और केन्द्र से बाहर की ओर झटके से तंरंगे (Shock wave)भेजना शुरू कर देता है। इसमे तारे की बाहरी तहे अंतरिक्ष मे फैल जाती है, इससे ग्रहीय निहारीका का निर्माण होता है। बचा हुआ केन्द्र सफेद बौना(वामन) तारा(white dwarf) कहलाता है। यह केन्द्र शुध्द कार्बन(कोयला) से बना होता है और इसमे इतनी उर्जा शेष होती है कि यह चमकीले सफेद रंग मे चमकता है। इसका द्रव्यमान भी कम होता है क्योंकि इसकी बाहरी तहे अंतरिक्ष मे फेंक दी गयी है। इस स्थिति मे यदि उस तारे के ग्रह भी दूर धकेल दिये जाते है, यदि वे लाल दानव के रूप मे तारे द्वारा निगले जाने से बच गये हो तो।


सफेद बौने(वामन) तारे

सफेद बौना तारा की नियती इस स्थिति मे लाखों अरबों वर्ष तक भटकने की होती है। धीरे धीरे वह ठंडा होते रहता है। अंत मे वह पृथ्वी के आकार (८००० किमी व्यास) मे पहुंच जाता है। इसका घन्त्व अत्यधिक अधिक होता है, एक माचिस की डिब्बी के बराबर पदार्थ एक हाथी से ज्यादा द्रव्यमान रखेगा ! इसका अधिकतम द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से १. (चन्द्रशेखर सीमा) गुना हो सकता है। ठंडा होने के बाद यह एक काले बौने(black dwarf) बनकर कोयले के ढेर के रूप मे अनंत काल तक अंतरिक्ष मे भटकते रहता है। इस कोयले के ढेर मे विशालकाय हीरे भी हो सकते है।

महाकाय तारे की मौत

सूर्य से काफी बड़े तारे की मौत सूर्य(मुख्य अनुक्रम के तारे) की अपेक्षा तीव्रता से होगी। इसकी वजह यह है कि जितना ज्यादा द्रव्यमान होगा उतनी तेजी से केन्द्रक संकुचित होगा, जिससे हाइड्रोजन संलयन की गति ज्यादा होगी।

लगभग १०० से १५० लाख वर्ष मे (मुख्य अनुक्रम तारे के लिये १० अरब वर्ष) एक महाकाय तारे की कोर कार्बन की कोर मे बदल जाती है और वह एक महाकाय लाल दानव(gignatic red gaint) मे परिवर्तित हो जाता है। मृग नक्षत्र मे कंधे की आकृती बनाने वाला तारा इसी अवस्था मे है। यह लाल रंग मे इसलिये है कि इसकी बाहरी तहे फैल गयी है और उसे गर्म करने के लिये ज्यादा उर्जा चाहिये लेकिन उर्जा का उत्पादन ढा नही है। इस वजह से वह ठंडा हो रहा है और चमक लाल हो गयी है। ध्यान दे निले रंग के तारे सबसे ज्यादा गर्म होते है और लाल रंग के सबसे कम।

इस स्थिति मे मुख्य अनुक्रम के तारे और महाकाय तारे मे अंतर यह होता है कि महाकाय तारे मे कार्बन को लोहे मे परिवर्तित करने के लायक दबाव होता है जो कि मुख्य अनुक्रम के तारे मे नही होता है। लेकिन यह संलयन उर्जा देने की बजाय उर्जा लेता है। जिससे उर्जा का ह्रास होता है, अब बाहर की ओर के दबाव और अंदर की तरफ के गुरुत्वाकर्षण का संतुलन खत्म हो जाता है। अंत मे गुरुत्वाकर्षण जीत जाता है, तारा केन्द्र एक भयानक विस्फोट के साथ सिकुड जाता है , यह विस्फोट सुपरनोवा कहलाता है। ४ जुलाई १०५४ मे एक सुपरनोवा विस्फोट २३ दिनो तक दोपहर मे भी दिखायी देते रहा था। इस सुपरनोवा के अवशेष कर्क निहारीका के रूप मे बचे हुये है।


कर्क निहारीका(सुपरनोवा विस्फोट के अवशेष)

इसके बाद इन तारों का जीवन दो रास्तों मे बंट जाता है। यदि तारे का द्र्व्यमान ९ सौर द्रव्यमान से कम लेकिन १.४ सौर द्रव्यमान से ज्यादा हो तो वह न्यूट्रॉन तारे मे बदल जाता है। वही इससे बड़े तारे श्याम वीवर (black hole)मे बदल जाते है जिसका गुरुत्वाकर्षण असीम होता है जिससे प्रकाश भी बच कर नही निकल सकता।

बौने (वामन) तारे की मौत

सूर्य एक मुख्य अनुक्रम का तारा है, लेकिन यह पिले बौने तारे की श्रेणी मे भी आता है। इस लेख मे सूर्य से छोटे तारों को बौना (वामन) तारा कहा गया है।

बौने तारो मे सिर्फ लाल बौने तारे ही सक्रिय होते है जिसमे हाइड्रोजन संलयन की प्रक्रिया चल रही होती है। बाकी बौने तारों के प्रकार , भूरे, सफेद और काले है जो मृत होते है। लाल बौने का आकार सूर्य के द्रव्यमान से १/३ से १/२ के बीच और चमक १/१०० से १/,०००,००० के बीच होती है। प्राक्सीमा सेंटारी , सूर्य के सबसे नजदिक का तारा एक लाल बौना है जिसका आकार सूर्य से १/५ है। यदि उसे सूर्य की जगह रखे तो वह पृथ्वी पर सूर्य की चमक १/१० भाग ही चमकेगा ,उतना ही जितना सूर्य प्लूटो पर चमकता है।


प्राक्सीमा (लाल वामन तारा– Red Dwarf) केन्द्र मे सबसे चमकिला लाल तारा

लाल बौने अपने छोटे आकार के कारण अपनी हाइड्रोजन धीमे संलयन करते है और कई सैकडो खरबो वर्ष तक जीवित रह सकते है।

जब ये तारे मृत होंगे ये सरलता से ग़ायब हो जायेंगे, इनके पास हिलीयम संलयन के लिये दबाव ही नही होगा। ये धीरे धीरे बुझते हुये अंतरिक्ष मे विलीन हो जायेंगे।

सितारो का जन्म

In तारे, ब्रह्माण्ड on जनवरी 25, 2007 at 1:06 पूर्वाह्न

निहारीका (Nebula)   एक ब्रम्हाण्डीय नर्सरी होती है जहाँ तारों का जन्म होता है। यह  एक धूल और गैसों का बादल होता है । सभी तारों का जन्म निहारिका से होता है सिर्फ कुछ दुर्लभ अवसरो को छोड़कर जिसमे दो न्यूट्रॉन तारे एक श्याम विवर बनाते है। वैसे भी न्यूट्रॉन तारे और श्याम विवर को मृत तारे माना जाता है।

निहारिका दो अलग अलग कारणों से बनती है। एक तो ब्रह्माण्ड की उतपत्ती से ही है। ब्रह्माण्ड के जन्म के बाद ब्रह्माण्ड मे परमाणुओं का निर्माण हुआ और इन परमाणुओं से धूल और गैस के बादलों का निर्माण हुआ। इसका मतलब यह है कि गैस और धूल जो इस तरह से बनी है उसका निर्माण तारे से नही हुआ है बल्कि यह ब्रह्माण्ड के निर्माण के साथ निर्मित मूल पदार्थ है।

निहारिका के निर्माण का दूसरा तरीका किसी विस्फोटीत तारे से बने सुपरनोवा से है। इस दौरान सुपरनोवा से जो पदार्थ उत्सर्जित होता है उससे भी निहारिका बनती है। इस दूसरे तरीके से बनी निहारिका का उदाहरण वेल(Veil) और कर्क (Crab) निहारिकाये है। ध्यान रखे कि निहारिकाओ का निर्माण इन दोनो तरीकों के मिश्रण से भी हो सकता है।

निहारिकाओ के प्रकार

उत्सर्जन निहारिका (Emission): इस तरह की निहारिकाये सबसे सुंदर और रंग बिरंगी होती है। ये नये बन रहे तारों से प्रकाशित होती है। विभिन्न तरह के रंग भिन्न तरह की गैसों और धूल की संरचना के कारण पैदा होते है। सामान्यतः एक बड़ी दूरबीन (8+ इंच) से उत्सर्जन निहारीका के लगभग सभी रंग देखे जा सकते है। तस्वीर मे सभी रंगो को देखने के लिये लम्बे-एक्स्पोजर से तस्वीर लेनी पढ़ती है।

चील निहारिका(M16) और झील निहारिका (Lagoon या M8) इस तरह की निहारिका के उदाहरण है। M16 मे तीन अलग अलग गैसों के स्तंभ देखे जा सकते है। यह तस्वीर हब्बल से ली गयी है और इसे साधारण दूरबीन से इतना स्पष्ट नही देखा जा सकता। इस स्तंभो के अंदर नये बने तारे है, जिनसे बहने वाली सौर वायु आसपास की गैस और धूल को दूर बहा रही है। इसमे सबसे बड़ा स्तंभ १० प्रकाश वर्ष उंचा और १ प्रकाश वर्ष चौड़ा है। इसकी खोज १७६४ मे हुयी थी और यह हमसे ७००० प्रकाश वर्ष दूर है।
चील निहारिका

चील निहारिका

निचले दी गयी M 8 की तस्वीर भी हब्बल दूरबीन से ली गयी है। यह ५२०० प्रकाश वर्ष दूर है। इसकी खोज १७४७ मे हुयी थी। इसका आकार १४०X६० प्रकाश वर्ष है।

M8 निहारिका

परावर्तन निहारिका (Reflection): यह वह निहारीकाये है जो तारों के प्रकाश को परावर्तित करती है, ये तारे या तो निहारिका के अंदर होते है या पास मे होते है। प्लेइडेस निहारिका इसका एक उदाहरण है। इसके तारों का निर्माण लगभग १००० लाख वर्ष पूर्व हुआ होगा। हमारे सूर्य का निर्माण ५०,००० लाख वर्ष पूर्व हुआ था। ये सितारे धीरे धीरे निहारिकाओ से बाहर आ रहे है।

NGC 1333 – परावर्तन निहारीका

श्याम निहारिका (Dark): ऐसे तो सभी निहारिकाये श्याम होती है क्योंकि ये प्रकाश उत्पन्न नही करती है। लेकिन विज्ञानी उन निहारिकाओ को श्याम कहते है जो अपने पीछे से आने वाले प्रकाश को एक दीवार की तरह रोक देती है। यही एक कारण है कि हम अपनी आकाशगंगा से बहुत दूर तक नही देख सकते है।

आकाशगंगा मे बहुत सारी श्याम निहारीकाये है, इसलिये विज्ञानियों को प्रकाश के अन्य माध्यमों का(x किरण, CMB) सहारा लेना होता है।
निचले चित्र मे प्रसिद्ध घोड़े के सर के जैसी निहारिका दिखायी दे रही है। यह निहारिका एक अन्य उत्सर्जन निहारिका IC434 के सामने स्थित है।

घोडे के सर जैसी निहारिका

ग्रहीय निहारिका (Planetary): इन निहारिकाओ का निर्माण उस वक्त होता है जब एक सामान्य तारा एक लाल दानव (red gaint)तारे मे बदल कर अपने बाहरी तहों को उत्सर्जित कर देता है। इस वजह से इनका आकार गोल होता है। चित्र मे बिल्ली की आंखो जैसी निहारिका(Cat’s Eye NGC 6543) दिखायी दे रही है। इस तस्वीर मे तारे के बचे हुये अवशेष भी दिखायी दे रहे है।

बिल्ली की आंखो वाली निहारिका

दूसरी तस्वीर नयनपटल निहारिका(Retina IC 4406) मे वृताकार चक्र उसके बाजु मे दिखायी दे रहा है। तारे का घूर्णन और चुम्बकिय क्षेत्र इसे वृताकार बना रहा है ना कि एक गोलाकार।
ग्रहीय यह शब्द निहारिकाओ के लिये सही नही है। यह शब्द उस समय से उपयोग मे आ रहा है जब युरेनस और नेप्च्यून की खोज जारी थी। उस समय हमारी आकाशगंगा के बाहर किसी और आकाशगंगा के अस्तित्व की भी जानकारी नही थी।

नयनपटल निहारिका

सुपरनोवा अवशेष: ये निहारिकाये सुपरनोवा विस्फोट के बाद बचे हुये अवशेष है। सुपरनोवा किसी विशाल तारे की मृत्यु के समय उनमें होने वाले भयानक विस्फोट की स्थिति को कहते है। कर्क (Crab) निहारीका इसका एक उदाहरण है।

कर्क निहारिका

सितारों के जन्म की प्रक्रिया

सितारों के जन्म के पहली स्थिति है , इंतजार और एक लम्बा इंतजार। धूल और गैस के बादल उस समय तक इंतजार करते है जब तक कोई दूसरा तारा या भारी पिंड इसमे कुछ हलचल ना पैदा कर दे! यह इंतजार हजारों लाखों वर्ष का हो सकता है।

जब कोई भारी पिंड निहारीका के पास से गुजरता है वह अपने गुरुत्वाकर्षण से इसमे लहरे और तरंगे उत्पन्न करता है। कुछ उसी तरह से जैसे किसी प्लास्टिक की बड़ी सी चादर पर कुछ कंचे बिखेर देने के बाद चादर मे एक किनारे पर से या बीच से एक भारी गेंद को लुढका दिया जाये। सारे कंचे भारी गेंद के पथ की ओर जमा होना शुरु हो जायेंगे। धीरे धीरे ये सारे कंचे चादर मे एक जगह जमा हो जाते है।

ठीक इसी तरह निहारिका मे धूल और गैस के कण एक जगह पर संघनित होना शुरु हो जाते है। पदार्थ का यह ढेर उस समय तक जमा होना जारी रहता है जब तक वह एक महाकाय आकार नही ले लेता।

इस स्थिति को पुर्वतारा( protostar) कहते है। जैसे जैसे यह पुर्वतारा बड़ा होता है गुरुत्वाकर्षण इसे छोटा और छोटा करने की कोशिश करता है, जिससे दबाव बढते जाता है, पुर्वतारा गर्म होने लगता है। जैसे साईकिल के ट्युब मे जैसे ज्यादा हवा भरी जाती है ट्युब गर्म होने लगता है।

जैसे ही अत्यधिक दबाव से तापमान १०,०००,००० केल्विन तक पहुंचता है नाभिकिय संलयन(Hydrogen Fusion) की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। अब पुर्वतारा एक तारे मे बदल जाता है। वह अपने प्रकाश से प्रकाशित होना शुरू कर देता है। सौर हवाये बचे हुये धूल और गैस को सुदूर अंतरिक्ष मे धकेल देती है।

भगवान की अंगुठी

In आकाशगंगा on जनवरी 24, 2007 at 11:31 पूर्वाह्न

M104 की साधारण प्रकाशीय (Optical) तस्वीर

सोम्ब्रेरो आकाशगंगा एक गोल टोपी या हैट के जैसे क्यो दिखायी देती है ?

इसके कारणो मे है इस आकाशगंगा के मध्य मे आसाधारण रूप से बडा और विस्तारीत तारो का उभार और श्याम धुल की रेखाये जो एक तश्तरीनुमा आकार मे इसके किनारे दिखायी देती है!

इस आकाशगंगा के मध्य मे उपस्थित उभार मे लाखो पुराने तारे है जो इस उभार की चमक को छितराते हैं। इस तस्वीर मे केन्द्रिय उभार को यदि ध्यान से देंखा जाये तो पता चलता है कि अधिकतर प्रकाशबिन्दू गेंद के आकार के तारासमुह(globular clusters) है। इस आकाशगंगा जिसे M104 भी कहते है कि बाहरी धुल से बने वलय मे अनेको नये और चमकदार तारे हैं।
इस आकाशगंगा का केन्द्र विद्युत चुम्बकिय वर्णक्रम (electromagnetic spectrum) के सभी रंग बिखेरता है जिससे यह अनुमान है कि वंहा पर एक महाकाय श्याम विवर हो सकता है।
यह आकाश गंगा हमसे २८० लाख वर्ष दूर है। इसकी चौडाई लगभग ५०,००० प्रकाश वर्ष है। यह कन्या आकाशगंगा समुह मे उपस्थित सबसे बडी आकाशगंगाओ मे से एक है।

M104 की अवरक्त (infrared) तस्वीर

इसे हम एक छोटी दूरबीन से कन्या तारासमुह के पास देख सकते है।

सुरज के बौने बेटे

In ग्रह, सौरमण्डल on जनवरी 23, 2007 at 4:53 पूर्वाह्न

१सेरस -सबसे बडा क्षुद्र ग्रह

क्षुद्र ग्रह पथरीले और धातुओ के ऐसे पिंड है जो सूर्य की परिक्रमा करते है लेकिन इतने लघु है कि इन्हे ग्रह नही कहा जा सकता। इन्हे लघु ग्रह या क्षुद्र ग्रह कहते है। इनका आकार १००० किमी व्यास के सेरस से १ से २ इंच के पत्थर के टुकडो तक है। सोलह क्षुद्रग्रहो का व्यास २४० किमी या उससे ज्यादा है। ये क्षुद्रग्रह पृथ्वी की कक्षा के अंदर से शनि की कक्षा से बाहर तक है। लेकिन अधिकतर क्षुद्रग्रह मंगल और गुरु के बिच मे एक पट्टे मे है। कुछ की कक्षा पृथ्वी की कक्षा को काटती है और कुछ ने भूतकाल मे पृथ्वी को टक्कर भी मारी है। एक उदाहरण महाराष्ट्र मे लोणार झील है।

क्षुद्र ग्रह का पट्टा(Asteroid Belt)

क्षुद्र ग्रह ये सौर मंडल बन जाने के बाद बचे हुये पदार्थ है। एक दूसरी कल्पना के अनुसार ये मंगल और गुरु के बिच मे किसी समय रहे प्राचीन ग्रह के अवशेष है जो किसी कारण से टूकडो टूकडो मे बंट गया। इस कल्पना का एक कारण यह भी है कि मंगल और गुरू के बिच का अंतराल सामान्य से ज्यादा है। दूसरा कारण यह है कि सूर्य के ग्रह अपनी दूरी के अनुसार द्रव्यमान मे बढ्ते हुये और गुरु के बाद घटते क्रम मे है। इस तरह से मंगल और गुरु के मध्य मे गुरु से छोटा लेकिन मंगल से बडा एक ग्रह होना चाहिये। लेकिन इस प्राचिन ग्रह की कल्पना सिर्फ एक कल्पना ही लगती है क्योंकि यदि सभी क्षुद्र ग्रहो को एक साथ मिला भी लिया जाये तब भी इनसे बना संयुक्त ग्रह १५०० किमी से कम व्यास का होगा जो कि हमारे चन्द्रमा के आधे से भी कम है।

क्षुद्रग्रहो के बारे मे हमारी जानकारी उल्कापात मे बचे हुये अबशेषो से है। जो क्षुद्रग्रह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से पृथ्वी के वातावरण मे आकर पृथ्वी से टकरा जाते है उन्हे उल्का (Meteoroids) कहा जाता है। अधिकतर उल्काये वातावरण मे ही जल जाती है लेकिन कुछ उल्काये पृथ्वी से टकरा भी जाती है।

इन उल्काओ का ९२.% भाग सीलीकेट का और ५. % भाग लोहे और निकेल का बना हुआ होता है। उल्का अवशेषो को पहचाना मुश्किल होता है क्योंकि ये सामान्य पत्थरो जैसे ही होते है। क्षुद्र ग्रह सौर मंडल के जन्म के समय से ही मौजुद है इसलिये विज्ञानी इनके अध्यन के लिये उत्सुक रहते है। अंतरिक्षयान जो इनके पट्टे के बिच से गये है उन्होने पाया है कि ये पट्टा सघन नही है, इन क्षुद्र ग्रहो के बिच मे काफी सारी खाली जगह है। अक्टूबर १९९१ मे गलेलियो यान क्षुद्रग्रह क्रंमांक ९५१ गैसपरा के पास से गुजरा था। अगस्त १९९३ मे गैलीलियो ने क्षुद्रग्रह क्रमांक २४३ इडा की नजदिक से तस्वीरे ली थी। ये दोनो ‘S’ वर्ग के क्षुद्र ग्रह है।

अब तक हजारो क्षुद्रग्रह देखे जा चुके है और उनका नामकरण और वर्गीकरण हो चुका है। इनमे प्रमुख है सेरस, टाउटेटीस, कैस्टेलिया, जीओग्राफोस और वेस्ता। सबसे बडा है १सेरस जो कि कुल क्षुद्र ग्रहो के संयुक्त द्रव्यमान का २५% है और ९३३ किमी व्यास का है। २पालास, ४ वेस्ता और १० हाय्जीया ये ४०० किमीऔर ५२५ किमीके व्यास के बिच है। बाकि सभी क्षुद्रग्रह ३४० किमी व्यास से कम के है।

धूमकेतू, चन्द्रमा और क्षुद्रग्रहो के वर्गीकरण मे विवाद है। कुछ ग्रहो के चन्द्रमाओ को क्षुद्रग्रह कहना बेहतर होगा जैसे मंगल के चन्द्रमा फोबोस और डीमोस, गुरू के बाहरी आठ चन्द्रमा शनि का बाहरी चन्द्रमा फोएबे वगैरह।

क्षुद्र ग्रहो का वर्गीकरण

. C वर्ग :इस श्रेणी मे ७५% ज्ञात क्षुद्र ग्रह आते है। ये काफी धुंधले होते है।(albedo .०३)। ये सूर्य के जैसे सरचना रखते है लेकिन हाय्ड्रोजन और हिलीयम नही होता है।

. S वर्ग : १७%, कुछ चमकदार(albedo .१० से०.२२), ये धातुओ लोहा और निकेल तथा मैगनेशियम सीलीकेट से बने होते है।

. M वर्ग :अधिकतर बचे हुये : चमकदार (albedo .१० से ०.१८) , निकेल और लोहे से बने।

इनका वर्गीकरण इनकी सौरमण्डल मे जगह के आधार पर भी किया गया है।

. मुख्य पट्टा : मंगल और गुरु के मध्य। सूर्य से AU दूरी पर। इनमे कुछ उपवर्ग भी है :- हंगेरीयास, फ़्लोरास,फोकीआ,कोरोनीस, एओस,थेमीस,सायबेलेस और हिल्डास। हिल्डास इनमे मुख्य है।

AU= पृथ्वी से सूर्य की दूरी।

. पृथ्वी के पास के क्षुद्र ग्रह (NEA)

.ऎटेन्स :सूर्य से १. AU से कम दूरी पर और ०.९८३ AU से ज्यादा दूरी पर।

. अपोलोस :सूर्य से . AU से ज्यादा दूरी पर लेकिन .०१७ AU से कम दूरी पर।

.अमार्स : सूर्य से .०१७ AU से ज्यादा दूरी पर लेकिन .AU से कम दूरी पर।

.ट्राजन : गुरु के गुरुत्व के पास।

सौर मण्डल के बाहरी हिस्सो मे भी कुछ क्षुद्र ग्रह है जिन्हे सेन्टारस कहते है। इनमे से एक २०६० शीरान है जो शनि और युरेनस के बिच सूर्य की परिक्रमा करता है। एक क्षुद्र ग्रह ५३३५ डेमोकलस है जिसकी कक्षा मंगल के पास से युरेनस तक है। ५१४५ फोलुस की कक्षा शनि से नेपच्युन के मध्य है। इस तरह के क्षुद्र ग्रह अस्थायी होते है। ये या तो ग्रहो से टकरा जाते है या उनके गुरुत्व मे फंसकर उनके चन्द्रमा बन जाते है।

क्षुद्रग्रहो को आंखो से नही देखा जा सकता लेकिन इन्हे बायनाकुलर या छोटी दूरबीन से देखा जा सकता है।

पाताल का देवता और मौत का नाविक

In ग्रह, सौरमण्डल on जनवरी 22, 2007 at 6:09 पूर्वाह्न

प्लुटो , शेरान ,निक्स और हायड्रा

प्लूटो यह सूर्य का नौंवा ग्रह हुआ करता था !

यह इतना छोटा है कि सौरमंडल के सात चन्द्रमा (हमारे चन्द्रमा सहित) इससे बड़े है। प्लूटो से बड़े अन्य चन्द्रमा है, गुरु के चन्द्रमा आयो, युरोपा, गीनीमेड और कैलीस्टो; शनि का चन्द्रमा टाइटन और नेप्च्यून का ट्राइटन। इस वजह से इसे ग्रह का दर्जा देना हमेशा विवादों के घेरे मे रहा।

इसे ग्रह का दर्जा मिला और ७५ वर्ष तक रहा लेकिन २४ अगस्त २००६ को अतंरराष्ट्रीय अंतरिक्ष विज्ञान सभा ने ग्रह की नयी परिभाषा दी जिसके अंतर्गत प्लूटो नही आता था। प्लूटो अब एक बौना ग्रह(dwarf planet) है।

ग्रह की नयी परिभाषा

सौरमंडल के किसी पिंड के ग्रह होने के लिए तीन मानक तय किए गए हैं-

1. यह सूर्य की परिक्रमा करता हो।

2. यह इतना बड़ा ज़रूर हो कि अपने गुरुत्व बल के कारण इसका आकार लगभग गोलाकार हो जाए।
3. इसमें इतना ज़ोर हो कि ये बाक़ी पिंडों से अलग अपनी स्वतंत्र कक्षा बना सके ।
इसमे तीसरी अपेक्षा पर प्लूटो खरा नहीं उतरता है, क्योंकि सूर्य की परिक्रमा के दौरान इसकी कक्षा नेप्चून की कक्षा से टकराती है।

रोमन मिथक कथाओं के अनुसार प्लूटो(ग्रीक मिथक मे हेडस)पाताल का देवता है। इस नाम के पीछे दो कारण है, एक तो यह कि सूर्य से काफी दूर होने की वजह से यह एक अंधेरा ग्रह(पाताल) है, दूसरा यह कि प्लूटो का नाम PL से शुरू होता है जो इसके अन्वेषक पर्सीयल लावेल के आद्याक्षर है।

प्लूटो की खोज की एक लम्बी कहानी है। कुछ गणनाओ के आधार पर युरेनस और नेप्च्यून की गति मे एक विचलन पाया जाता था। इस आधार पर एक ‘क्ष’ ग्रह(Planet X) कि भविष्यवाणी की गयी थी, जिसके कारण युरेनस और नेपच्युन की गति प्रभावित हो रही थी। अंतरिक्ष विज्ञानी लावेल इस ‘क्ष’ ग्रह की खोज मे  आकाश छान मारा और १९३० मे प्लूटो खोज निकाला। लेकिन प्लूटो इतना छोटा निकला कि यह नेप्च्यून और युरेनस की गति पर कोई प्रभाव नही डाल सकता है। ‘क्ष’ ग्रह की खोज जारी रही। बाद मे वायेजर २ से प्राप्त आकडो से जब नेप्च्यून और युरेनस की गति की गणना की गयी तब यह विचलन नही पाया गया। इस तरह ‘क्ष’ ग्रह की सारी संभावनाये समाप्त हो गयी।

नयी खोजों से अब हम जानते है कि प्लूटो के बाद भी सूर्य की परिक्रमा करने वाले अनेक पिंड है लेकिन उनमें कोई भी इतना बड़ा नही है जिसे ग्रह का दर्जा दिया जा सके। इसका एक उदाहरण हाल ही मेखोज निकाला गया बौना ग्रह जेना है।

प्लूटो सामान्यतः नेप्च्यून की कक्षा के बाहर सूर्य की परिक्रमा करता है लेकिन इसकी कक्षा नेप्च्यून की कक्षा के अंदर से होकर गुजरती है। जनवरी १९७९ से फरवरी १९९९ तक इसकी कक्षा नेप्च्यून की कक्षा के अंदर थी। यह अन्य ग्रहों के विपरीत दिशा मे सूर्य की परिक्रमा करता है। इसका घूर्णन अक्ष भी युरेनस की तरह इसके परिक्रमा प्रतल से लंबवत है, दूसरे शब्दों मे यह भी सूर्य की परिक्रमा लुढकते हुये करता है। इसकी कक्षा की एक और विशेषता यह है कि इसकी कक्षा अन्य ग्रहों की कक्षा के प्रतल से लगभग १५ अंश के कोण पर है।

इसकी और नेप्च्यून के चन्द्रमा ट्राइटन की असामान्य कक्षाओं के कारण इन दोनो मे किसी ऐतिहासिक रिश्ते का अनुमान है। एक समय यह भी अनुमान लगाया गया था कि प्लूटो नेप्च्यून का भटका हुआ चन्द्रमा है। एक अन्य अनुमान यह है कि ट्राइटन यह प्लूटो की तरह स्वतंत्र था लेकिन बाद मे नेप्च्यून के गुरुत्वाकर्षण की चपेट मे आ गया।

प्लूटो तक अभी तक कोई अंतरिक्ष यान नही गया है। एक यान “न्यू हारीझोंस” जिसे जनवरी २००६ मे छोड़ा गया है लगभग २०१५ तक प्लूटो तक पहुंचेगा।

प्लूटो पर तापमान -२३५ सेल्सीयस और -२१० सेलसीयस के मध्य रहता है। इसकी सरंचना अभी तक ज्ञात नही है। इसका घनत्व २ ग्राम/घन सेमी होने से अनुमान है कि इसका ७०% भाग सीलीका और ३०% भाग पानी की बर्फ से बना होनी चाहिये। सतह पर हाइड्रोजन, मिथेन, इथेन और कार्बन मोनोक्साईड की बर्फ का संभावना है।

प्लूटो के तीन उपग्रह भी है, शेरॉन, निक्स और हायड्रा. निक्स का व्यास लगभग ६० किमी और हायड्रा का व्यास लगभग २०० किमी अनुमानित है जबकि प्लूटो का व्यास २२७४ किमी अनुमानित है।

हब्बल दूरबीन से ली गयी तस्वीर(प्लुटो और शेरान)

शेरॉन यह ग्रीक मिथक कथाओं के अनुसार मृत आत्माओ को अचेरान नदी के पार कराने कर पाताल ले जाने वाला नाविक है।
एक अनुमान के अनुसार शेरॉन का निर्माण प्लूटो और किसी अन्य पिंड के मध्य  टक्कर के कारण हुआ है। बहुत कुछ हमारे चन्द्रमा के निर्माण की तरह।

शेरॉन को तकनीकी तरह से प्लूटो का चन्द्रमा कहना भी सही नही है। क्योंकि शेरॉन प्लूटो की परिक्रमा तो करता ही है लेकिन प्लूटो भी शेरॉन की परिक्रमा करता है। ये दोनो एक दूसरे की परिक्रमा करते हुये सूर्य की परिक्रमा करते है। एक तरह से युग्म ग्रह है !

प्लूटो को देखना काफी मुश्किल है,साधारण दूरबीन से भी।