अविश्वसनीय, अद्भुत और रोमाँचक: अंतरिक्ष

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तु मेरे सामने, मै तेरे सामने : एक या दो आकाशगंगा(एँ) ?

In आकाशगंगा on जुलाई 26, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

एक या दो ?

एक या दो?

यह चित्र एन जी सी 3314 का है। लेकिन यह है क्या ?

चित्र के अनुसार यह एक आकाशगंगा लग रही है। लेकिन यह एक नही दो आकाशगंगायें है और दोनो आकाशगंगाओं के मध्य 230 लाख प्रकाशवर्ष अंतर है।

यह एक संयोग है कि यह दोनो आकाशगंगायें पृथ्वी से देखे जाने पर एक ही रेखा मे है और एक आकाशगंगा के जैसे दिख रही हैं। सामने वाली आकाशगंगा एक स्पायरल आकार की आकाशगंगा है, इसके आकार को इसमे निर्मित हो रहे नये तारों से देखा जा सकता है। लेकिन पृष्ठभूमी की आकाशगंगा की चमक के कारण सामने वाली आकाशगंगा की धूमिल धूल के बादल ज्यादा प्रभावी दिख रहे है। सामने वाली आकाशगंगा की यह धूलभरी गलियाँ आश्चर्यजनक रूप से इसके पूरे आकर मे व्याप्त है।

पृष्ठभूमी वाली आकाशगंगा 1400 लाख प्रकाशवर्ष दूर है जबकि सामने वाली आकाशगंगा 1170 लाख प्रकाशवर्ष दूर है। पृष्ठभूमी वाली आकाशगंगा की चौड़ाई 70,000 प्रकाशवर्ष है जबकि सामने वाली आकाशगंगा की चौड़ाई का सही अनुमान(गणना) नही हो पायी है।

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अंतरिक्ष में अमरीका के प्रभुत्व का का अंत : अटलांटिस सकुशल वापिस

In अंतरिक्ष यान on जुलाई 22, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

अपने अंतिम अभियान एस टी एस 135 से अंटलांटीस अंतरिक्ष शटल की वापिसी

अपने अंतिम अभियान एस टी एस 135 से अंटलांटीस अंतरिक्ष शटल की वापिसी

अमरीकी अंतरिक्ष यान अटलांटिस अपनी अंतिम उड़ान एसटीएस 135 की समाप्ति पर 21 जुलाई 2011 को धरती पर फ्लोरिडा में कैनेडी स्पेस सेंटर में उतर गया है।

इसके साथ ही मानव के अंतरिक्ष अभियान में अमरीका के प्रभुत्व का एक दौर ख़त्म हो गया है क्योंकि इसके साथ ही अमरीकी अंतरिक्ष केंद्र नासा का तीस वर्षों का अंतरिक्ष कार्यक्रम ख़त्म हो गया है। इन तीस वर्षों में नासा ने अंतरिक्ष यानों अटलांटिस, चैलेंजर, कोलंबिया, डिस्कवरी और एंडेवर नाम के अंतरिक्ष यानों का एक बेड़ा तैयार किया।

ये दुनिया का पहला ऐसा अंतरिक्ष यानों का बेड़ा था जिसका बार बार उपयोग किया जा सकता था। ये अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष में जाने और आने के लिए, उपग्रहों की तैनाती के लिए और अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण और वहाँ बार बार जाने के लिए के लिए प्रयुक्त होते थे।

अटलांटिस अपने चार यात्रियों के साथ फ़्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर में 21 जुलाई 2011 गुरुवार को अमरीका में सूर्योदय से कुछ समय पहले उतरा।

यह अटलांटिस ने अंतरिक्ष स्टेशन की अपनी तेरहवीं यात्रा थी। अपने अंतिम उड़ान पर गए अटलांटिस ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में क़रीब चार टन की सामग्री पहुँचाई है, जिसमें बड़ी मात्रा में खाद्य सामग्री भी है। इसके बाद अटलांटिस को डिस्कवरी और एंडेवर की तरह सेवामुक्त कर दिया गया है, जबकि कोलंबिया और चैलेंजर दुर्घटना मे नष्ट हो चुके है। अटलांटिस को कैनेडी स्पेस सेंटर में दर्शकों के लिए रख दिया जाएगा।

ये यान वहाँ जिन आँकड़ों के साथ ख़डा होगा उसमें 33 उड़ानें, अंतरिक्ष में 307 दिन, पृथ्वी की 4,848 परिक्रमा और कुल 20 करोड़, 26 लाख 73 हज़ार 974 किलोमीटर की यात्रा शामिल होगी।

अटलांटिस के पहिए का विमानतल पर रुकना एक भावुक क्षण है। इसके साथ अमरीका का तीस वर्ष पुराना अंतरिक्ष अभियान ख़त्म हो रहा है तथा इन अंतरिक्ष यानों को संचालित करने के लिए रखे गए तीन हज़ार लोगों का भी काम कुछ ही दिनों के भीतर ख़त्म हो जाएगा। इसमें कम से कम दो वर्षों का समय लगेगा जब अंतरिक्ष कार्यक्रमों से जुड़ी सारी गतिविधियाँ ख़त्म की जाएँगी और बरसों में जुटाए गए अंतरिक्ष इंजीनियरिंग के आँकड़ों को संरक्षित किया जायेगा।

इसके साथ ही अमरीका के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक ऐसा शून्य पैदा हो जाएगा जो कम से कम तीन या चार वर्षों तक तो नहीं भरा जा सकेगा। अटलांटिस की वापसी के बाद अमरीका को अंतरिक्ष स्टेशन तक जाने के लिए रूस के सोयूज़ यानों पर निर्भर करना पड़ेगा। अमरीका रूस पर तब तक निर्भर रहेगा जब तक अमरीकी निजी कंपनियाँ नए अंतरिक्ष यानों का निर्माण नहीं कर लेतीं। यह एक संयोग है कि रूस ने अमरीकी अंतरिक्ष शटल के जैसे यान बुरान पर कार्य प्रारंभ किया था लेकिन सोवियत संघ के ढहने के बाद इसे रद्द कर दिया गया था और अपने सोयूज यानो को जारी रखा था। अमरीकी अंतरिक्ष शटलो के अध्याय के पश्चात आज दोनो अंतरिक्ष महाशक्ति सोयूज पर निर्भर है।

प्लूटो के नये चंद्रमा की खोज

In अंतरिक्ष, सौरमण्डल on जुलाई 21, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

प्लूटो का नया चंद्रमा पी 4

प्लूटो का नया चंद्रमा पी 4

खगोलशास्त्रियों ने हबल अंतरिक्ष दूरबीन की मदद से सौर मंडल के बौने ग्रह प्लूटो के एक और चंद्रमा की पहचान की है।

हबल दूरबीन ने पी4 को अपने नए वाइड फ़ील्ड कैमरा से पहली बार 28 जून 2011 को देखा था। जुलाई 2011 में उसके और पर्यवेक्षण होने के बाद उसके अस्तित्व की पुष्टि कर दी गई। ये प्लूटो का चक्कर लगाने वाला चौथा प्राकृतिक उपग्रह है। इससे पहले चेरन, निक्स और हाइड्रा की पहचान हो चुकी है। वैज्ञानिक इस नए चंद्रमा को फ़िलहाल पी4 कह रहे हैं जिसका व्यास 13 से 34 किलोमीटर का बताया जा रहा है। पी 4 के आकार की गणना उसकी चमक और उसके प्लूटो के जैसे बर्फीले होने के अनुमान के आधार पर की गयी है। समान आकर के दो पिंडो मे बर्फिला पिंड गहरे रंग के पिंड से ज्यादा चमकदार दिखता है। पी 4के आकार का यह अनुमान ही है लेकिन वास्तविकता के समीप है।अगर प्लूटो और उसके चंद्रमा चेरन के आकार की तुलना की जाए, तो दोनों में बड़ा अंतर नहीं है। प्लूटो का व्यास 2,300 किलोमीटर का है जबकि चेरन का 1,200 किलोमीटर का। (कुछ वैज्ञानिक चेरान को प्लूटो का चंद्रमा मानने की बजाये दोनो को युग्म ग्रह – Binary Planet मानते है।) लेकिन निक्स और हाइड्रा छोटे हैं। निक्स का व्यास 30 किलोमीटर और हाइड्रा का 115 किलोमीटर है।

पी4 निक्स और हाइड्रा की कक्षाओं के बीच में स्थित है। निक्स और हाइड्रा की पहचान हबल दूरबीन ने 2005 में की थी। जबकि चेरन की पहचान 1978 में अमरीकी नौसैनिक वेधशाला ने की थी।

न्यू होराइज़न के प्रमुख शोधकर्ता ऐलन स्टर्न ने इसे एक अभूतपूर्व खोज बताया है। कोलोराडो के साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट के एलन स्टर्न कहते हैं,

“अब हमें ये मालूम हो गया है कि प्लूटो का एक और चंद्रमा है तो हम अपनी उड़ान के दौरान उसे भी नज़दीक से देखेंगे”।

प्लूटो को 2006 में ग्रह से बौना ग्रह घोषित कर दिया गया था, लेकिन 2015 में ये एक बड़े अंतरिक्ष मिशन का लक्ष्य होगा। अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का न्यू होराइज़न नामक खोजी यान इस बर्फ़ीले बौने ग्रह के पास से गुज़रेगा और उसके चंद्रमाओं को भी देखेगा।

न्यू होराइज़न खोजी यान जुलाई 2015 में प्लूटो के पास से गुज़रेगा। उके सात उपकरण प्लूटो की सतह की विशेषताओं, उसकी बनावट और वायुमंडल का विस्तृत नक्शा तैयार करेंगे।ये यान प्लूटो से 10,000 किलोमीटर और चेरन से 27,000 किलोमीटर की दूरी तक जाएगा और उसके बाद आगे बढ़ जाएगा। अगर नासा के पास और धन हुआ तो ये यान क्यूपर पट्टी में यात्रा करता रहेगा जहां सौर मंडल के निर्माण के बाद के कई अवशेष मौजूद हैं।

पीएसएलवी सी 17: तीन महिला वैज्ञानिको के हाथ जीसैट 12 की कमान

In अंतरिक्ष यान on जुलाई 19, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

पी एस एल वी सी 17 का श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण

पी एस एल वी सी 17 का श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण

दिनांक 15 जुलाई 2011 भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने पीएसएलवी सी-17(Polar Satelite Launch Vehical-PSLV C17) के ज़रिए संचार उपग्रह जीसैट-12(GSAT-12) को अंतरिक्ष में स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है।

इसरो के श्रीहरिकोटा रेंज से उपग्रह को प्रक्षेपित किया गया और पूरी प्रक्रिया बिना किसी रुकावट के पूरी हुई।

जीसैट-12 में 12 सी-ट्रांसपांडर्स हैं जो टेलीमेडिसिन और टेलीफोन सेवाओं के लिए इस्तेमाल किए जा सकेंगे। जीसैट-12 संचार सेटेलाइट का वज़न 1410 किलोग्राम है।

संचार उपग्रह जीसैट-12 की सभी प्रणालियां सामान्य ढंग से काम कर रही है। उपग्रह का सौर पैनल पहले से ही तैनात है। उपग्रह जीसैट-12 को अगले कुछ दिनों में भू-स्थिर कक्षा में स्थापित किए जाने की उम्मीद है। इस उपग्रह के आठ साल तक सक्रिय रहने की संभावना है। १२ विस्तारित सी बैंड ट्रांसपोंडर के साथ यह उपग्रह शिक्षा, चिकित्सा और ग्रामीण संसाधन केन्द्रों की विभिन्न संचार सेवाओं के लिए इनसेट प्रणाली की क्षमता बढ़ाएगा।

श्रीहरिकोटा स्थित मिशन नियंत्रण केन्द्र में इसे छोड़े जाने के बाद वैज्ञानिक खुशी से झूम उठे। उपग्रह छोड़े जाने के करीब एक हजार दो सौ पच्चीस सैंकेड बाद जीसैट-12, प्रक्षेपण यान से अलग हो गया और पृथ्वी की कक्षा मे पहुंच गया। इसके कुछ मिनट बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन -इसरो के अध्यक्ष डॉक्टर राधाकृष्णन ने इसके सफलतापूर्वक छोड़े जाने की घोषणा की। उन्होंने बताया कि प्रक्षेपण यान ने उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर दिया है।

यह कहने में हमें बहुत प्रसन्नता हो रही है कि भारत का ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपणयान-पी एस एल वी सी-१७ मिशन सफल रहा है। प्रक्षेपणयान ने उपग्रह को बहुत ठीक तरीके से योजना के अनुसार सही स्थान पर पहुंचाया है।

जीसैट 12 उपग्रह प्रक्षेपण भारतीय अंतरिक्ष अभियान मे एक मील का पत्त्थर है, इस उपग्रह के कक्षा मे पहुंचने की जिम्मेदारी तीन महिला वैज्ञानिकों के हाथ मे है। इन वैज्ञानिको के नाम है प्रोजेक्ट डायरेक्टर टी के अनुराधा, अभियान डायरेक्टर प्रमोदा हेगड़े तथा आपरेशन डायरेक्टर के एस अनुराधा। उपग्रह के अपनी अंतिम कक्षा मे पहुंचने के लिए 4 से 6 सप्ताह लगेंगे,उसके बाद यह अभियान पूर्णतः सफल हो जायेगा।

आम तौर पर पीएसएलवी का इस्तेमाल रिमोट सेंसिंग उपग्रहों को लांच करने में किया जाता था जो क़रीब एक हज़ार किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थापित किया जाता है। ध्यान दें कि पीएसएलवी का अर्थ ही ध्रुविय उपग्रह प्रक्षेपण वाहन है। यह पहली बार है जब पीएसएलवी के ज़रिए किसी उपग्रह को जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑरबिट(भूस्थानिक कक्षा) में स्थापित किया जा रहा है। कहने का अर्थ ये है कि आम तौर पर जियोस्टेशनलरी ऑरबिट के लिए पहली बार इतने छोटे यान का उपयोग हो रहा है जिसके लिए मिशन में कई फेर बदल किए गए हैं।

पहले संचार उपग्रहों के लिए या तो जीएसएलवी का उपयोग होता था या फिर विदेशी राकेट की सेवाएँ ली जाती थीं। लेकिन जीएसएलवी-एफ़06 यान के ज़रिए पिछले साल किया गया उपग्रह प्रक्षेपण विफल हो गया था। इसरो के पास पर्याय कम थे, जीएसएलवी के भरोसेमंद होने तक इंतजार नही किया जा सकता था और विदेशी राकेट महंगे पड़ते है।

पीएसएलवी भारत का सबसे भरोसेमंद राकेट रहा है। भारत के चंद्रयान मिशन के लिए भी पीएसलवी का ही इस्तेमाल किया गया था। इस साल इसरो ने अप्रैल में पीएसएलवी सी-16 का श्रीहरिकोटा से सफ़ल प्रक्षेपण था। पीएसएलवी सी-16 अपने साथ रिसोर्ससैट-2, एक्ससैट और यूथसैट लेकर गया था।

इसरो के वैज्ञानिको को इस सफलता के लिए बधाई!

दक्षिणी वलय निहारिका(Southern Ring Nebula)

In तारे, निहारीका on जुलाई 12, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

एन जी सी 3132(बडे़ आकार मे देखने चित्र पर क्लीक करें)

एन जी सी 3132(बडे़ आकार मे देखने चित्र पर क्लीक करें)

यह एक ग्रहीय निहारिका है जो एक तारे की मृत्यु के पश्चात बनी है। इस निहारिका का नाम एन जी सी 3132 है। इसे दक्षिणी वलय निहारिका(Southern Ring Nebula) भी कहा जाता है। इसे निर्माण करने वाला श्वेत वामन तारा इस चित्र के मध्य मे दिखने वाला धुंधला तारा है। तेज चमक वाला तारा इस श्वेत वामन तारे का साथी तारा है।

इस निहारिका का निर्माण उस समय हुआ होगा ,जब सूर्य के आकार के तारे का ईंधन खत्म हो गया और गुरुत्वाकर्षण द्वारा उत्पन्न संपिड़न तथा केन्द्र की उष्मा के टकराव के फलस्वरूप इसमे एक विस्फोट हुआ होगा। तारे के शेष केन्द्रक से श्वेत वामन तारे का जन्म हुआ और शेष पदार्थ की परतो से यह खूबसूरत निहारिका।

इस चित्र के केन्द्र मे निला रंग यह दर्शा रहा है कि यह भाग अभी भी गर्म है और इसे धूंधले श्वेत वामन तारे से उष्मा मील रही है। इस निहारिका के असामान्य आकार और सममीती के पिछे के कारण अज्ञात हैं।

अटलांटिस अपनी अंतिम ऐतिहासिक उड़ान पर रवाना

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान on जुलाई 9, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

अटलांटिस ने केप केनेवरल अंतरिक्ष केंद्र से 33वीं बार उड़ान भरी

अमरीका का अंतरिक्ष यान अटलांटिस अपनी अंतिम यात्रा पर रवाना हो गया है।

ये पिछले 30 साल से जारी अमरीकी अंतरिक्ष यानों के अभियान में किसी यान की 135वीं और अंतिम उड़ान है।

अटलांटिस ने शुक्रवार 8 जुलाई 2011 स्थानीय समय के हिसाब से दिन के ठीक 11 बजकर 29 मिनट पर फ़्लोरिडा के केप केनेवरल स्थित केनेडी अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरी।

अटलांटिस से 12 दिन की यात्रा पर गए चार यात्री अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर साढ़े तीन टन वज़न के सामानों की आपूर्ति करेगा।

अटलांटिस की वापसी के साथ ही अमरीकी अंतरिक्ष यानों का अभियान पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और अटलांटिस को दो अन्य यानों – डिस्कवरी और एंडेवर – की तरह संग्रहालय में रख दिया जाएगा।

अमरीकी अंतरिक्ष यानों के अभियान की समाप्ति के बाद अंतरिक्ष यात्रा करनेवालों को रूसी अंतरिक्ष यानों पर निर्भर होना पड़ेगा।

साथ ही अमरीका अगली पीढ़ी के नए अंतरिक्ष यानों को विकसित करने की भी तैयारी कर रहा है।

अंतिम उड़ान

अटलांटिस की 33वीं और अंतिम उड़ान की उल्टी गिनती पूरी होने के कोई आधे मिनट पहले अचानक गिनती रोक दी गई। ऐसा यान के पथ में एक उपकरण के टुकड़े के हटा लिए जाने की पुष्टि करने के लिए किया गया। बाद में नियंत्रकों के संतुष्ट हो जाने के बाद उड़ान शुरू किए जाने की अनुमति दे दी गई।

अटलांटिस के उड़ान की तिथि पहले ही घोषित कर दी गई थी लेकिन इस पूरे सप्ताह ख़राब मौसम के कारण यान के समय पर उड़ान भर पाने को लेकर संदेह बना हुआ था।

अटलांटिस की अंतिम यात्रा का साक्षी बनने के लिए लाखों लोग अंतरिक्ष केंद्र के आस-पास जमा थे और उसके उड़ान भरते ही वहाँ जश्न का माहौल बन गया। हालाँकि अटलांटिस को उड़ते हुए बमुश्किल चंद सेकेंड ही देखा जा सका क्योंकि तेज़ गति से उड़ता अटलांटिस देखते-देखते बादलों को चीरकर नज़रों से ओझल हो गया।

अटलांटिस रविवार को निर्माणाधीन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर पहुँच जाएगा।

स्वतन्त्र विज्ञान के लिए यह एक बुरा समाचार है। स्वतन्त्र विज्ञान से मेरा तात्पर्य बिना की लाभ हानी की चिंता किये नयी खोजों, आविष्कारो के लिए कार्य करना। नासा एक सरकारी संस्थान है जो कि बिना किसी लाभ हानी की चिंता किये कार्य करता है लेकिन सरकारी संस्थानों की अन्य समस्याएँ जैसे लाल फीता शाही, अकुशल योजना प्रबंधन जैसी समस्याए यहाँ भी है। पिछले कुछ वर्षो से नासा राजनितिज्ञो में अलोकप्रिय होते जा रहा है , वह अपने बजट के अनुसार परिणाम नहीं दे पा रहा है । मंदी के इस दौर में नासा के बजट पर भी असर पड़ा है, उसकी कई महत्वाकांक्षी परियोजनाए रद्द की जा चुकी है। जिसमे प्रोजक्ट ओरीयान भी शामिल है । यह प्रोजेक्ट नयी पीढी के राकेट विकसीत करने का था जो अंतरिक्ष शटल का स्थान लेता ।

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहीये कि नासा जिस क्षेत्र में कार्य करता है, उस क्षेत्र में असफलता की संभावना ज्यादा होती है । इस क्षेत्र में 4 में से एक अभियान असफल होता है, नासा का कार्य प्रशंसनीय है। आशा है कि अमरीकी राजनेता राजनीती और सस्ती लोकप्रियता से दूर हट कर हथियारों के बजट में कमी करें और उसे नासा की और मोड़े। नासा ऐसे भी उन्हें अंतरिक्ष से जासूसी में मदद करता है।

अब इस क्षेत्र में अमरीका ने नीजी कम्पनीयों का दरवाजा खोल दिया है, इससे अंतरिक्ष पर्यटन सस्ता होगा। लेकिन नयी खोजो और आविष्कारो का रास्ता रूक जाएगा! निजी कंपनीयां अपनी योजनाएँ नयी खोज या आविष्कारो की जगह सिर्फ और सिर्फ अपने लाभ पर केंद्रित करेंगी! लाभ की इस होड़ मे मंगल पर मानव के अवतरण का सपना और कितने दशकों बाद पूरा होगा, कह पाना मुश्किल है। पता नही कि कोई और वायेजर अंतरिक्ष यात्रा के लिए जा पायेगा? वायेजर जैसे यानो से कोई तात्कालिक व्यावसायिक लाभ जो नही है!

नासा के वर्चस्व का अंत : अंतरिक्ष शटल अटलांटिस की अंतिम उड़ान

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान on जुलाई 6, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

अंटलांटीस अंतरिक्ष शटल अपने अंतिम उड़ान के लिए प्रक्षेपण स्थल की ओर जाता हुआ। पृष्ठभूमि मे दिख रही इमारत अंतरिक्ष शटल निर्माण केन्द्र है।

अंटलांटीस अंतरिक्ष शटल अपने अंतिम उड़ान के लिए प्रक्षेपण स्थल की ओर जाता हुआ। पृष्ठभूमि मे दिख रही इमारत अंतरिक्ष शटल निर्माण केन्द्र है।

अमरीकी अंतरिक्ष संगठन नासा के अंतरिक्ष यानों(स्पेस शटल) की अंतिम उड़ान के लिए अंतिम तैयारियाँ अपने चरम पर हैं और शुक्रवार 8 जुलाई 2011 को होने वाली इस उड़ान के चालक दल के सदस्य फ्लोरिडा पहुँच चुके हैं। ये उड़ान स्थानीय समय के अनुसार 11:26 (15:26 जीएमटी) बजे होगी जिसे देखने के लिए भारी भीड़ इकट्ठा हो रही है। अटलांटिस यान शुक्रवार को कैनेडी अंतरिक्ष केंद्र से छोड़ा जाएगा जिसके लिए तीन पुरुष और एक महिला अंतरिक्ष यात्री अंतिम तैयारियाँ कर रहे हैं।

इस अंतिम उड़ान में अटलांटिस यान पर साढ़े तीन टन भोज सामग्री भेजी जाएगी जो अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र में मौजूद वैज्ञानिकों को एक साल के लिए पर्याप्त होगी।

ये सामग्री भेजे जाने के बाद नासा को इस बात की ज़्यादा चिंता नहीं रहेगी कि निजी और व्यावसायिक कंपनियाँ अगर अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करने में कुछ मुश्किलें महसूस करती हैं तो अंतरिक्ष केंद्र में मौजूद अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

अटलांटिस में चार वैज्ञानिक सवार होंगे जिनमें कमांडर क्रिस फ़रग्यूसन, पायलट डॉ हरली और मिशन विशेषज्ञ सैंडी मैगनस और रेक्स वॉलहीम होंगे। ये वैज्ञानिक टैक्सस के ह्यूस्टन स्थित अपने प्रशिक्षण केंद्र से कैनेडी पहुँच चुके हैं।

आठ जुलाई 2011 को अंतरिक्ष के लिए 135वीं यान उड़ान होगी और अटलांटिस की ये 33वीं उड़ान होगी। इस उड़ान के बाद कुल 135 अंतरिक्ष मिशन पूरे हो जाएंगे जिनके लिए 355 लोगों ने 852 बार उड़ान भर ली होगी। पहला अंतरिक्ष यान 12 अप्रैल 1981 को उड़ा था। अंतरिक्ष कार्यक्रम के दौरान पृथ्वी की कक्षा का चक्कर लगाने वाले यानों ने कुल मिलाकर 864,401,200 किलोमीटर (537,114,016 मील) का सफ़र तय किया है जो तीन बार पृथ्वी से सूरज तक जाने और वापिस लौटने के बराबर है। अटलांटिस यान इस सफ़र में क़रीब 65 लाख किलोमीटर (40 लाख मील) और जोड़ देगा।

इस अंतिम दौर को शुरू करने वाला पहला स्पेस शटल यान डिस्कवरी था जिसने मार्च 2011 में अपनी अंतिम उड़ान भरी थी। उसके बाद एंडीवर को भी एक जून 2011 को अंतिम उड़ान के बाद संग्रहालय में रख दिया गया है।

इन उड़ानों के बाद सभी अंतरिक्ष यानों को संग्रहालय में पहुँचाया जा रहा है। अटलांटिस को अंतिम उड़ान के बाद कैनेडी अंतरिक्ष केंद्र के दर्शक परिसर में रखा जाएगा। नासा अब अपने अंतरिक्ष यानों(स्पेस शटल) को रिटायर कर रहा है ताकि निजी कंपनियाँ अब इस मैदान में अपनी सेवाएँ मुहैया करा सकें।

श्रोत: बीबीसी हिन्दी से साभार

अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र के साथ एन्डेवर

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान on जुलाई 5, 2011 at 6:21 पूर्वाह्न

अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र के साथ एन्डेवर(चित्र को पूर्ण रूप से देखने चित्र पर क्लीक करें)

अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र के साथ एन्डेवर(चित्र को पूर्ण रूप से देखने चित्र पर क्लीक करें)

अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र(International Space Station) के साथ अमरीकी स्पेश शटल एन्डेवर का चित्र। लेकिन यह चित्र लिया कैसे गया है ? अंतरिक्ष से ?

सामान्यतः अंतराष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र का चित्र स्पेश शटल से लिया जाता है। लेकिन इस चित्र मे अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र के साथ स्पेश शटल भी दिख रहा है। यह कैसे हुआ?

इसका उत्तर यह है कि जब एन्डेवर अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र से अपने अंतिम अभियान के तहत जुड़ा हुआ था उसी दिन एक रूसी अंतरिक्ष यान सोयुज टी एम ए 20 अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र से वापस पृथ्वी पर लौट रहा था। यह चित्र सोयुज यान से लिया गया है। सोयुज यान अगले दिन कजाकिस्तान मे उतर गया था। अमरीकी अंतरिक्ष शटल की अंतिम उड़ान जुलाई 2011 मे प्रस्तावित है उसके पश्चात अंतराष्ट्रीय केंद्र की यात्रा के लिए सोयुज यान का ही प्रयोग होगा।