अविश्वसनीय, अद्भुत और रोमाँचक: अंतरिक्ष

Archive for दिसम्बर, 2011|Monthly archive page

वर्ष 2011 के खूबसूरत चित्र

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान, अंतरिक्ष वाहन, आकाशगंगा, ग्रह, तारे, निहारीका on दिसम्बर 29, 2011 at 5:25 पूर्वाह्न

इस सप्ताह वर्ष 2011 की कुछ सबसे बेहतरीन , सबसे खूबसूरत अंतरिक्ष के चित्रो का एक संकलन।

This slideshow requires JavaScript.

Advertisements

पृथ्वी के आकार के ग्रह की खोज!

In अंतरिक्ष, ग्रह, पृथ्वी, ब्रह्माण्ड, सौरमण्डल on दिसम्बर 21, 2011 at 5:58 पूर्वाह्न

पृथ्वी और शुक्र की तुलना मे केप्लर 20e तथा केप्लर 20f

पृथ्वी और शुक्र की तुलना मे केप्लर 20e तथा केप्लर 20f

खगोलशास्त्रीयों ने दूसरी पृथ्वी की खोज मे एक मील का पत्त्थर पा लीया है, उन्होने एक तारे की परिक्रमा करते हुये दो ग्रहों की खोज की है। और ये दोनो ग्रह पृथ्वी के आकार के है!

इन ग्रहों को केप्लर 20e तथा केप्लर 20f नाम दिया गया है। चित्र मे आप देख सकते हैं कि वे हमारे मातृ ग्रह पृथ्वी के आकार के जैसे ही है। 20e का व्यास 11,100 किमी तथा 20f का व्यास 13,200 किमी है। तुलना के लिए पृथ्वी का व्यास 12,760 किमी है। ये दोनो ग्रह सौर मंडल के बाहर खोजे गये सबसे छोटे ग्रह है। इससे पहले पाया गया सबसे छोटा ग्रह केप्लर 10b था जोकि पृथ्वी से 40% ज्यादा बड़ा था।

लेकिन यह स्पष्ट कर दें कि ये दोनो ग्रह पृथ्वी के आकार के हैं लेकिन पृथ्वी के जैसे नही है। इनका मातृ तारा केप्लर 20 हमारे सूर्य के जैसा है, लेकिन थोड़ा छोटा और थोड़ा ठंडा है। यह तारा हमसे 950 प्रकाशवर्ष दूर है। लेकिन ये दोनो ग्रह केप्लर 20 की परिक्रमा पृथ्वी और सूर्य की तुलना मे समीप से करते है। इनकी कक्षा अपने मातृ तारे से 76 लाख किमी तथा 166 लाख किमी है। यह कक्षा अपने मातृ तारे के इतने समीप है कि इन ग्रहो की सतह का तापमान क्रमशः 760 डीग्री सेल्सीयस तथा 430 डीग्री सेल्सीयस तक पहुंच जाता है। इनमे से ठंडे ग्रह केप्लर 20f पर भी यह तापमान टीन या जस्ते को पिघला देने के लिये पर्याप्त है।

इन ग्रहों की यात्रा के लिये सूटकेश पैक करना अभी जल्दबाजी होगी, हालांकि राकेट से इन तक जाने के लिये अभी लाखों वर्ष लग जायेंगे। हम अभी इन ग्रहो का द्रव्यमान नही जानते है। लेकिन इन ग्रहो के आकार के कारण इनका द्रव्यमान पृथ्वी के तुल्य ही होगा।

यह प्रमाणित करता है कि केप्लर अंतरिक्ष वेधशाला अंतरिक्ष मे पृथ्वी के जैसे ग्रहो की खोज मे सक्षम है। यह अभियान सही दिशा मे प्रगतिशील है।

यह यह भी दर्शाता है कि हमारा सौर मंडल अपने आप मे अकेला नही है। हम ऐसे कई तारो को जानते है जिनके अपने ग्रह है लेकिन अब तक पाये गये सभी ग्रह महाकाय थे और उनकी खोज आसान थी। लेकिन केप्लर 20e तथा केप्लर 20f पृथ्वी के जैसे है और यह एक बड़ी खोज है।

केप्लर 20 मंडल मे तीन अतिरिक्त ग्रह भी है जोकि पृथ्वी से बड़े है, इनका नाम केप्लर 20b,c तथा d है, इनका व्यास क्रमशः 24,000,40,000 तथा 35,000 किमी है, जोकि नेपच्युन और युरेनस से कम है, इसके बावजूद ये विशालकाय ग्रह है। हम इनके द्रव्यमान को जानते है, इनका द्रव्यमान पृथ्वी से क्रमशः 8.7,16.1 तथा 20 गुणा ज्यादा है। आप इन्हे महापृथ्वी कह सकते है।

यह सभी ग्रह अपने तारे की परिक्रमा काफी समीप से करते है। इनमे से सबसे बाहरी ग्रह केप्लर 20f है लेकिन यह सारी प्रणाली तुलनात्मक रूप से बुध की कक्षा के अंदर ही है! यह प्रणाली हमारे सौर मंडल से अलग है। हमारे सौर मंडल मे कम द्रव्यमान वाले ग्रह अंदर है, तथा ज्यादा द्रव्यमान वाले ग्रह बाहर, लेकिन केप्लर 20 मे यह बारी-बारी से है, बड़ा ग्रह – छोटा ग्रह – बड़ा ग्रह – छोटा ग्रह…

हम यह सब कैसे जानते है ?

केप्लर वेधशाला अंतरिक्ष मे है, वह एक समय मे एक छोटे से हिस्से का निरीक्षण करती है। इसके दृश्य पटल मे 100,000 तारे है जिसमे केप्लर 20 भी है। जब किसी तारे की परिक्रमा करता कोई ग्रह अपने मातृ तारे के सामने से जाता है, उस तारे के प्रकाश मे थोड़ी कमी आती है, इसे संक्रमण(ग्रहण) कहते है। जितना बड़ा ग्रह होगा उतना ज्यादा प्रकाश रोकेगा। प्रकाश की इस कमी को केप्लर वेधशाला पकड़ लेती है और प्रकाश मे आयी कमी की मात्रा से उसका आकार ज्ञात हो जाता है, इसी तरह से हमने इन ग्रहो का आकार ज्ञात किया है।

केप्लर20 तारा प्रणाली

केप्लर20 तारा प्रणाली

जब यह ग्रह अपने तारे की परिक्रमा करते है तब वे अपने मातृ तारे को भी अपने गुरुत्व से विचलीत करते। इस विचलन को भी उस तारे के प्रकाश से मापा जा सकता है, यह विचलन उसके प्रकाश मे आने वाले डाप्लर प्रभाव से देखा जाता है। यह डाप्लर विचलन दर्शाता है कि उस तारे पर ग्रह का गुरुत्व कितना प्रभाव डाल रहा है और यह गुरुत्व उस ग्रह के द्रव्यमान पर निर्भर करता है। केप्लर 20 प्रणाली मे हम उसके विशाल ग्रहो द्वारा डाले गये गुरुत्विय प्रभाव को मापने मे सफल हो पाये है, जिससे हम केवल उसके विशाल ग्रहो का द्रव्यमान ही जानते है। लेकिन केप्लर 20e तथा 20f इतने छोटे है कि उनका गुरुत्विय प्रभाव हम मापने मे असमर्थ है।

एक और तथ्य स्पष्ट कर दें कि हम इन ग्रहो का अस्तित्व जानते है, इन ग्रहों का कोई चित्र हमारे पास नही है। प्रस्तुत चित्र कल्पना आधारित है। इन ग्रहो का अस्तित्व अप्रत्यक्ष प्रमाणो अर्थात उनके द्वारा उनके मातृ तारे पर पड़ने वाले प्रभाव से प्रमाणित है। यह विधियाँ विश्वशनिय है इसलिये हम कह सकते है कि इन ग्रहों का अस्तित्व निसंदेह है।

इन ग्रहो की खोज सही दिशा मे एक कदम है। हमारी दिशा है कि किसी तारे के गोल्डीलाक क्षेत्र मे जहां पर जल अपनी द्रव अवस्था मे रह सके पृथ्वी के आकार के चट्टानी ग्रह की खोज! आशा है कि निकट भविष्य मे ऐसा ग्रह खोज लेंगे। और यह दिन अब ज्यादा दूर नही है।

’मंदाकिनी’ आकाशगंगा केन्द्र के दैत्य को जागृत करने जा रहा है एक गैसीय बादल !

In आकाशगंगा on दिसम्बर 16, 2011 at 3:38 पूर्वाह्न

श्याम वीवर के समीप गैसीय बादल की कल्पना। सभी तारे एक अदृश्य श्याम वीवर की परिक्रमा कर रहे हैं।

श्याम वीवर के समीप गैसीय बादल की कल्पना। सभी तारे एक अदृश्य श्याम वीवर की परिक्रमा कर रहे हैं।

हमारी आकाशगंगा ’मंदाकिनी’ के केन्द्र मे स्थित महाकाय श्याम वीवर (Spermassive Black Hole) सामान्यतः एक सोते हुये दैत्य की तरह है। लेकिन यह दैत्य अपनी निद्रा से जागने जा रहा है। पृथ्वी से कई गुणा बड़ा एक गैसीय बादल इस श्याम वीवर की ओर 50 लाख मील/घंटे की गति से इसकी ओर बढ़ रहा है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि वे पहली बार एक बादल के बिखरने और ब्लैक होल में समाने का नज़ारा देख सकेंगे। उनका कहना है कि इस ब्लैक होल का आकार चार करोड़ किलोमीटर है और इसमें बादल को समाने में दो वर्ष से भी कम समय लगेगा। इन दोनो के टकराने से विकिरणो का एक महाविस्फोट होगा जो हमे श्याम वीवर को समझने के लिये जानकारी प्रदान करेगा।

युरोपीयन अंतरिक्ष सस्थांन(ESO) की दूरबीनो से इस गैसीय बादल को देखा गया है। अपने 20 वर्ष लंबे कार्यक्रम के अंतर्गत मैक्स प्लैंक इन्स्टीट्युट आफ एक्स्ट्राटेरेस्ट्रीयल फिजीक्स के खगोलशास्त्री युरोपीयन वेधशाला की दूरबीनो से हमारी आकाशगंगा के केन्द्र मे स्थित महाकाय श्याम वीवर की परिक्रमा करते तारो का निरीक्षण रहे है। उन्होने इस अध्ययन के दौरान इस बादल को श्याम वीवर की ओर बढ़ते देखा।

यह गैस का बादल श्याम वीवर के घटना क्षितीज(Event Horizon) से केवल 40 अरब किमी(36 प्रकाश घंटे) दूरी से गुजरेगा जोकि एक नजदीकी घटना है। इस दूरी पर वह श्याम वीवर के गुरुत्वाकर्षण की चपेट मे आ जायेगा। इस दूरी पर आने पर यह बादल समीप के अत्यंत उष्ण तारो से उत्सर्जित पराबैगनी विकिरण से चमकने लगेगा।

जैसे जैसे यह बादल महाभूखे दैत्य श्याम वीवर के समीप पहुंचेगा, बाह्य दबाव इस बादल को संपिड़ित करेगा। उसी समय सूर्य से 40 लाख गुणा भारी श्याम वीवर का महाशक्तिशाली गुरुत्विय आकर्षण इसकी गति को त्वरण देगा और यह बादल अपनी कक्षा से विचलीत होकर श्याम वीवर की ओर बड़ेगा।

इस बादल के सीरे अभी से ही टूटना शुरू हो गये है और कुछ ही वर्षो मे पूरी तरह टूट जायेंगे। बादल मे इस बिखराव के लक्षण वैज्ञानिको ने 2008 से 2011 के मध्य मे देखें है।

2008 से 2011 के मध्य गैसीय बादल की श्याम वीवर ओर बढ़ने के चित्र

2008 से 2011 के मध्य गैसीय बादल की श्याम वीवर ओर बढ़ने के चित्र

2013 तक इस गैसीय बादल का पदार्थ श्याम वीवर के समीप पहुंचने के साथ अत्यंत गर्म हो जायेगा और एक्स किरणो(X ray) का उत्सर्जन प्रारंभ कर देगा। वर्तमान मे श्याम वीवर के घटना क्षितिज के पास बहुत कम पदार्थ है , श्याम वीवर का यह नया शिकार इस भूखे दानव को अगले कुछ वर्षो तक भोजन प्रदान करेगा।

खगोलशास्त्रीयों के लिये अगले कुछ वर्ष काफी महत्वपूर्ण रहेंगे क्योंकि यह घटना श्याम वीवर से संबधित बहुत सी नयी जानकारी पर प्रकाश डालेगी।

केप्लर अंतरिक्ष वेधशाला: सूर्य सदृश तारे के जीवन योग्य क्षेत्र मे पृथ्वी सदृश ग्रह की खोज!

In अंतरिक्ष, ग्रह, तारे, पृथ्वी, सौरमण्डल on दिसम्बर 6, 2011 at 6:00 पूर्वाह्न

केप्लर 22 की परिक्रमा करता केप्लर 22b(कल्पना आधारित चित्र)

केप्लर 22 की परिक्रमा करता केप्लर 22b(कल्पना आधारित चित्र)

यह एक बड़ा समाचार है। अंतरिक्ष वेधशाला केप्लर ने सूर्य के जैसे तारे के जीवन योग्य क्षेत्र(गोल्डीलाक क्षेत्र) मे एक ग्रह की खोज की गयी है। और यह ग्रह पृथ्वी के जैसे भी हो सकता है।

इस तारे का नाम केप्लर 22 तथा ग्रह का नाम केप्लर 22बी रखा गया है। यह पृथ्वी से 600 प्रकाशवर्ष दूर स्थित है। केप्लर 22 तारे का द्रव्यमान सूर्य से कम है और इसका तापमान भी सूर्य की तुलना मे थोड़ा कम है। केप्लर 22बी अपने मातृ तारे केप्लर 22 की परिक्रमा 290 दिनो मे करता है।

हमारे सौर मंडल के बाहर ग्रह की खोज कैसे की जाती है, जानने के लिये यह लेख देखें।

290 दिनो मे अपने मातृ तारे की परिक्रमा इस ग्रह को विशेष बनाती है। इसका अर्थ यह है कि यह ग्रह अपने मातृ तारे की जीवन योग्य क्षेत्र की कक्षा मे परिक्रमा कर रहा है। इस ग्रह की अपने मातृ तारे से दूरी इतनी है कि वहाँ पर पानी द्रव अवस्था मे रह सकता है। पानी की अनुपस्थिति मे जीवन संभव हो सकता है लेकिन पृथ्वी पर उपस्थित जीवन के लिए पानी आवश्यक है। पृथ्वी पर जीवन के अनुभव के कारण ऐसे ग्रहों की खोज की जाती है जिन पर पानी द्रव अवस्था मे उपस्थित हो। किसी ग्रह पर पानी की द्रव अवस्था मे उपस्थिती के लिए आवश्यक होता है कि वह ग्रह अपने मातृ तारे से सही सही दूरी पर हो, जिसे गोल्डीलाक क्षेत्र कहते है। इस दूरी से कम होने पर पानी भाप बन कर उड़ जायेगा, इससे ज्यादा होने पर वह बर्फ के रूप मे जम जायेगा।

इस ग्रह की मातृ तारे से दूरी, पृथ्वी और सूर्य के मध्य की दूरी से कम है, क्योंकि इसका एक वर्ष 290 दिन का है। लेकिन इसका मातृ तारा सूर्य की तुलना मे ठंडा है, जो इस दूरी के कम होने की परिपूर्ती कर देता है। यह स्थिति इस ग्रह को पृथ्वी के जैसे जीवनसहायक स्थितियों के सबसे बेहतर उम्मीदवार बनाती है। लेकिन क्या यह ग्रह पृथ्वी के जैसा है ?

यह कहना अभी कठीन है!

केप्लर किसी ग्रह की उपस्थिति उस ग्रह के अपने मातृ तारे पर संक्रमण द्वारा पता करता है। जब कोई ग्रह अपने मातृ तारे के सामने से गुजरता है, वह उसके प्रकाश को अवरोधित करता है। जितना बड़ा ग्रह होगा, उतना ज्यादा प्रकाश अवरोधित करेगा। खगोलशास्त्रीयों ने इन आंकड़ो के द्वारा जानकारी प्राप्त की कि केप्लर 22बी पृथ्वी से 2.4 गुणा बड़ा है। हमारे पास समस्या यह है कि हम इतना ही जानते है! हम नही जानते कि यह ग्रह चट्टानी है या गैसीय! हम नही जानते कि इस ग्रह पर वातावरण है या नही ?

केप्लर 22 तथा केप्लर 22b प्रणाली की आंतरिक सौर मंडल से तुलना

केप्लर 22 तथा केप्लर 22b प्रणाली की आंतरिक सौर मंडल से तुलना

हम यह नही कह सकते कि इस ग्रह पर क्या परिस्थितियाँ हैं। उपर दिये गये चित्र से आप जान सकते हैं कि द्रव्यमान और वातावरण से बहुत अंतर आ जाता है। तकनीकी रूप से मंगल और शुक्र दोनो सूर्य के जीवन योग्य क्षेत्र मे हैं, लेकिन शुक्र का घना वातावरण उसे किसी भट्टी के जैसे गर्म कर देता है, वहीं मंगल का पतला वातावरण उसे अत्यंत शीतल कर देता है।(यदि इन दोनो ग्रहो की अदलाबदली हो जाये तो शायद सौर मंडल मे तीन ग्रहो पर जीवन होता !) केप्लर 22बी शायद स्वर्ग के जैसे हो सकता है या इसके विपरीत। यह उस ग्रह के गुरुत्वाकर्षण पर निर्भर करता है, और गुरुत्वाकर्षण उसके द्रव्यमान पर निर्भर है।

यह एक समस्या है कि हमे इस ग्रह का द्रव्यमान ज्ञात नही है। केप्लर की संक्रमण विधी से ग्रह का द्रव्यमान ज्ञात नही किया जा सकता; द्रव्यमान की गणना के लिये उस ग्रह के गुरुत्वाकर्षण द्वारा उसके मातृ तारे पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है, जोकि एक जटिल गणना है। केप्लर 22बी अपने मातृ तारे की परिक्रमा के लिए 290 दिन लेता है जो इस निरीक्षण को और कठिन बनाता है। ( कोई ग्रह अपने मातृ तारे के जितना समीप होगा वह अपने मातृ तारे पर उतना ज्यादा प्रभाव डालेगा तथा उसे अपने तारे की परिक्रमा कम समय लगेगा।) इस ग्रह की खोज मे समय लगने के पीछे एक कारण यह भी था कि इसके खोजे जाने के लिये उस ग्रह का अपने तारे पर संक्रमण(ग्रहण) आवश्यक था। इसका पहला संक्रमण केप्लर के प्रक्षेपण के कुछ दिनो पश्चात हुआ था लेकिन इस ग्रह को 290 दिनो बाद दोबारा संक्रमण आवश्यक था जो यह बताये कि प्रकाश मे आयी कमी वास्तविक थी, तथा अगले 290 दिनो पश्चात एक तीसरा संक्रमण जो 290 दिनो की परिक्रमा अवधी को प्रमाणित करे।

यदि यह मान कर चले की यह ग्रह संरचना मे पृथ्वी के जैसा है, चट्टान, धातु और पानी से बना हुआ। इस स्थिति मे इस ग्रह का गुरुत्व पृथ्वी से ज्यादा होगा। इस ग्रह के धरातल पर आपका भार पृथ्वी की तुलना मे 2.4 गुणा ज्यादा होगा, अर्थात वह ग्रह पृथ्वी के जैसी संरचना रखते हुये भी पृथ्वी के जैसा नही होगा। दूसरी ओर यदि यह ग्रह हल्के तत्वों से बना है तब इसका गुरुत्व कम होगा।

लेकिन इस सब से इस तथ्य का महत्व कम नही होता कि इस ग्रह का अस्तित्व है। हमने एक ऐसा ग्रह खोजा है जिसका द्रव्यमान कम है और जीवन को संभव बनाने वाली दूरी पर अपने मातृ तारे की परिक्रमा कर रहा है। अभी तक हम जीवन योग्य दूरी पर बृहस्पति जैसे महाकाय ग्रह या अपने मातृ तारे के अत्यंत समीप कम द्रव्यमान वाले ग्रह ही खोज पा रहे थे। यह प्रथम बार है कि सही दूरी पर शायद सही द्रव्यमान वाला और शायद पृथ्वी के जैसा ग्रह खोजा गया है। हम अपने लक्ष्य के समीप और समीप होते जा रहे हैं।

वर्तमान मानव ज्ञान की सीमा के अंतर्गत अनुसार पूरी आकाशगंगा मे जीवन से भरपूर एक ही ग्रह है, पृथ्वी! लेकिन निरीक्षण बताते हैं कि ऐसे बहुत से ग्रह हो सकते है, और इन ग्रहो के कई प्रकार हो सकते है। हर दिन बीतने के साथ ऐसे ग्रह की खोज की संभावना पहले से बेहतर होते जा रही है। कुछ ही समय की बात है जब हम पृथ्वी के जैसा ही जीवन की संभावनाओं से भरपूर एक ग्रह पा लेंगे।