एक सफल असफल अभियान : अपोलो १३

अपोलो १३ यह अपोलो अभियान का चद्रंमा अवतरण का तृतीय मानव अभियान था। इसे ११ अप्रैल १९७० को प्रक्षेपित किया गया था। प्रक्षेपण के दो दिन बाद ही इसमे एक विस्फोट हुआ जिसके कारण नियंत्रण यान से आक्सीजन का रीसाव शुरू हो गया और बिजली व्यवस्था चरमरा गयी। अंतरिक्षयात्रीयो ने चन्द्रयान को जिवन रक्षक यान के रूप मे प्रयोग किया और पृथ्वी मे सफलता पूर्वक वापिस आने मे सफल रहे। इस दौरान उन्हे बिजली, गर्मी और पानी की कमी जैसी समस्याओ से जुझना पडा लेकिन वे मौत के जबडो से वापिस सकुशल लौट आये।

अंतरिक्ष यात्री

  • जेम्स ए लावेल(James A. Lovell) -४ अंतरिक्ष यात्रा का अनुभव, कमांडर
  • जान एल स्वीगर्ट (John L. Swigert)- १ अंतरिक्ष यात्रा का अनुभव, मुख्य नियंत्रण यान चालक
  • फ्रेड डब्ल्यु हैसे (Fred W. Haise )- १ अंतरिक्ष यात्रा का अनुभव,चन्द्रयान चालक

लावेल, स्वीगर्ट और हैसी

वैकल्पिक यात्री दल

  • जान यंग (John Young) -कमांडर
  • जान एल स्वीगर्ट (John L. Swigert)- १ अंतरिक्ष यात्रा का अनुभव, मुख्य नियंत्रण यान चालक
  • चार्लस ड्युक ( Charles Duke), चन्द्रयान चालक

अभियान
अपोलो १३ अभियान फ़्रा मौरो संरचना का अध्यन करने वाला था। इस संरचना का नाम फ़्रा मौरो क्रेटर के नाम है जो कि इस संरचना के अंदर स्थित है।
इस अभियान मे समस्या प्रक्षेपण के तुरंत बाद ही आनी शुरू हो गयी थी। प्रक्षेपण के दूसरे चरण मे मध्य इंजन दो मिनट पहले ही बंद हो गया, इस कमी को पूरा करने के लिये चार बाहरी इंजन को ज्यादा देर तक जलाना पढा। अभियंताओ ने बाद मे पाया कि यह पोगो दोलन की वजह से था जिसने दूसरे चरण के इंजनो को ६८g के १६ हर्टज के कंपनो से चीर दिया था। इसके पहले के अभियानो मे पोगो दोलन का अनुभव किया गया था लेकिन यह काफी तिव्र था। इसके बाद के अभियानो मे प्रतिपोगो दोलन प्रणाली लगायी गयी थी।
विस्फोट
यान चन्द्रमा की ओर अपने रास्ते मे पृथ्वी से ३२१,८६० किमी दूरी पर था, नियंत्रण यान के क्रमांक २ के आक्सीजन टैंक मे विस्फोट हुआ। इस घटना की शुरुवात कुछ ऐसे हुयी। पृथ्वी स्थित अभियान नियंत्रण केन्द्र ने आक्सीजन टैंक को हिलाने(Stir) के लिये कहा, यह कार्य द्रव आक्सीजन मे तापमान की विभीन्न अवस्थाओ मे होने वाली सतहो के निर्माण से रोकने के लिये होता है। इस प्रक्रिया को Stratification कहते है। लेकिन इस दौरान आक्सीजन के टैंक को हिलाने वाली मोटर के तारो मे आग लग गयी। इस आग से द्रव आक्सीजन गर्म होने लगी और उससे दबाव बढकर १००० PSI तक पहुंच गया। फलस्वरूप टैंक मे विस्फोट हो गया। यह एक अनुमान है, अन्य अनुमानो मे यान से किसी उल्का के टकराव से हुआ विस्फोट भी है।
इस विस्फोट से कई उपकरण नष्ट हो गये और आक्सीजन टैंक क्रमांक १ को भी गंभीर नुकसान पहुंचा। नियंत्रण यान बिजली निर्माण के लिये आक्सीजन पर निर्भर था, इस विस्फोट के कारण बिजली निर्माण कम हो गया। नियंत्रण यान मे पृथ्वी के वातावरण मे पुनः प्रवेश ले लिये बैटरी थी, लेकिन ये सिर्फ १० घंटो के लिये काफी थी। इन बैटरीयो को पृथ्वी मे सकुशल वापस लौटने के लिये बचाना जरूरी था, इसलिये यात्रीदल अब जिवन रक्षा के लिये चन्द्रयान पर निर्भर था। इस अभियान के पहले चन्द्रयान को ‘जिवन रक्षा नौका’ की तरह उपयोग का एक बार रिहर्शल किया गया था, जिसे अब वास्तविकता मे रूपांतरण करना था।

नियंत्रण यान

इस विस्फोट के कारण चन्द्रमा पर अवतरण अभियान रद्द कर दिया गया और चन्द्रमा की एक परिक्रमा के साथ पृथ्वी पर सकुशल वापिसी की प्रक्रिया ‘स्वतंत्र वापिसी प्रक्षेपपथ ‘ (Free return trajectory) शुरू की गयी। यह प्रक्रिया चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण के प्रयोग से यान को पृथ्वी की ओर धकेल देती है। पृथ्वी के वातावरण मे आने के लिये यान के पथ को बीच बीच मे बदलना जरूरी था,जिसके लिये नियंत्रण यान के इंजनो को दागा जाना था। लेकिन नियंत्रको को यान मे हुये नुकसान का अनुमान नही था। वे नियंत्रण यान मे आग लगने का खतरा नही उठाना चाहते थे। अंत मे यान के पथ के बदलावो के लिये चन्द्रयान के अवरोह इंजनो का प्रयोग किया गया।
अत्यंत दबाव के मध्य अब यात्रीयो की सकुशल वापिसी के लिये अब अत्यंत कुशलता की आवश्यकता थी। सारा विश्व इस अभियान को पर नजर रखे हुये था। बिजली समस्या के कारण इस अभियान का सीधा प्रसारण नही किया गया था।
सबसे बडी परेशानी की वजह यह थी कि जिवनरक्षक नौका (चन्द्र्यान) दो यात्रीयो के लिये दो दिनो के लिये ही बनायी गयी थी, अब उसे तीन यात्रीयो द्वारा चार दिनो तक प्रयोग करना था। सबसे गंभीर समस्या थी की लीथीयम हायड्राक्साईड के कंटेनरो की चार दिनो के लिये अनुपलब्धता थी,यह लिथीयम हायड्राक्साईड कार्बन डाय आक्साईड को यान से साफ करती है। नियंत्रण यान मे लीथीयम हायड्राक्साईड के कंटेनरो इसकी उचित मात्रा थी लेकिन ये कंटेनर चन्द्रयान मे लगाने के लिये आकार मे नही थे। अब उन कंटेनरो को कीसी तरह उपलब्ध पदार्थो द्वारा एक अनुकूलक निर्माण कर चन्द्रयान मे लगाना था।

अनुकुलक के द्वारा लगाये गये लीथीयम आक्साईड के कंटेनर के साथ चन्द्रयान

जैसे ही पृथ्वी के वातावरण मे पुनःप्रवेश का समय नजदिक आया, नासा ने नियंत्रण कक्ष को अलगकर उसकी तसवीरे लेने का निर्णय किया जिससे दुर्घटना के कारणो का पता लगाया जा सके। यात्रीयो ने जब नियंत्रण कक्ष को देखा तो उन्होने पाया कि नियंत्रण यान की संपुर्ण लम्बाई मे स्थित आक्सीजन टैंक को ढकने वाला कवर विस्फोट मे उड गया था।
एक भय यह भी था कि वापिसी के दौरान चन्द्रयान मे तापमान की कमी के कारण जल घनीभूत ना हो जाये। लेकिन आशंका निर्मूल साबित हुयी। इस सफलता के पिछे एक कारण अपोलो १ की आग के बाद अभिकल्पना मे किये गये बदलाव भी थे।
यात्री सफलता पुर्वक वापिस आ गये, लेकिन हैसे को मुत्राशय मे संक्रमण हो गया था जो कि पानी की उचित मात्रा मे अनुपलब्धता के कारण था। यह अभियान असफल जरूर था लेकिन यात्री भाग्यशाली थे क्योंकि विस्फोट यात्रा के प्रथम चरण मे हुआ था। इस समय उनके पास ज्यादा मात्रा मे रसद, उपकरण और बिजली थी। यदि विस्फोट चन्द्रमा की कक्षा मे या पृथ्वी की वापिसी के चरण मे होता तब यात्रीयो के बचने की संभावना काफी कम थी।

अपोलो १३ पानी मे गीरने के बाद

अपोलो १३ जहाज पर

यह भी एक संयोग था कि आक्सीजन टैंक को हीलाने की प्रक्रिया अभियान के प्रथम चरण मे करनी पडी, सामान्यतः यह प्रक्रिया यात्रा के अंतिम चरण मे करनी पड़ती है।

चन्द्रमा पर छोडी जाने वाली प्लेट जो नही छोडी जा सकी

 

नोट : इस घटनाक्रम पर अपोलो १३ के नाम से एक फिल्म भी बनी है, जो दर्शनिय है।

2 टिप्पणियां

  1. Posted February 20, 2007 at 6:50 pm | Permalink

    अच्छी जानकारी ।
    शायद इसी घटनाक्रम पर टाम हैंक्स एक फ़िल्म भी बना चुके हैं ।

  2. Posted February 21, 2007 at 5:30 am | Permalink

    आपके सारे लेख साथ के साथ पढ़ता चल रहा हूँ. विकिपीडिया के लिए स्तरीय मैटर तैयार करने के लिए धन्यवाद!


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