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यूरोपा पर जीवन की संभावनाएं पहले से ज्यादा !

In अंतरिक्ष, ग्रह, सौरमण्डल on नवम्बर 22, 2011 at 3:41 पूर्वाह्न

यूरोपा की सतह पर के अव्यवस्थित भाग

यूरोपा की सतह पर के अव्यवस्थित भाग

हम वर्षो से यह जानते रहे है कि बृहस्पति का चन्द्रमा यूरोपा मे ठोस जमी हुयी सतह के नीचे द्रव जल का महासागर है। यूरोपा की लगभग पूरी सतह ठोस बर्फ से बनी हुयी है। हम यह भी जानते हैं कि इस सतह पर हजारो दरारें है जो पृथ्वी पर पानी पर तैरती बर्फ की परतो पर की दरारों के जैसे ही हैं। यूरोपा पर बृहस्पति और अन्य चंद्रमाओं के गुरुत्वीय खिंचाव के कारण उसका आंतरिक भाग गर्म होता है।

लेकिन एक प्रश्न जो मानव मन को मथता रहा है, वह यूरोपा की बर्फ की सतह की मोटाई को लेकर है? यह बर्फ की सतह कितने किलोमीटर मोटी है ? या वह एक पतली परत मात्र है? इन दोनो के समर्थन मे प्रमाण मौजूद है, जो रहस्य को गहरा करते हैं। यूरोपा की सतह का अध्ययन करते खगोलविज्ञानीयों के अनुसार यह बर्फ की परत साधारणतः बहुत मोटी है और इस सतह के नीचे द्रव जल की झीलें होना चाहीये।

चित्रकार की कल्पना मे यूरोपा की सतह के नीचे द्रव जल की झीलें और महासागर

चित्रकार की कल्पना मे यूरोपा की सतह के नीचे द्रव जल की झीलें और महासागर

उपर दिया गया चित्र गैलीलीयो अंतरिक्ष यान द्वारा किये गये निरीक्षण पर आधारित है, इस यान ने बृहस्पति की कई वर्षो तक परिक्रमा की थी। यह चित्र प्रकाशीय चित्र(Optical Image) तथा फोटोक्लीनोमेट्री(photoclinometry ) का संयुक्त चित्र है। [फोटोक्लीनोमेट्री तकनीक से चित्र  द्वारा सतह के भिन्न भागो की उंचाई ज्ञात की जाती है।] जामुनी और लाल रंग उंचा भाग दर्शाता है और इस चित्र मे धंसा हुआ भूक्षेत्र स्पष्ट देखा जा सकता है। यह भाग “अव्यवस्थित भूभाग(chaotic terrain)” कहलाता है। यूरोपा की अधिकतर सतह सपाट और व्यवस्थित है जो कि एक बर्फ की मोटी सतह से अपेक्षित है। लेकिन कुछ छोटे भाग अव्यवस्थित है और यह क्षेत्र सतह के नीचे के द्रव जल की वजह से है। भू भाग के नीचे का यह जल विशालकाय झीलो के रूप मे है जो बर्फ की सतह से ढंका है, इन झीलों का आकार उत्तरी अमरीका की विशालकाय झीलों के समान है।

निचे दिया गया चित्र कलाकार की कल्पना से है और यह यूरोपाकी भूमीगत झींलों की संरचना दर्शाता है। सामान्यतः यूरोपा की सतह पर बर्फ की परत मोटी है जोकि यूरोपा की सतह के दिखायी देने वाले स्वरूप के अनुरूप है। लेकिन कुछ विशेष क्षेत्रो मे बर्फ की सतह के निचे बर्फ पिघल कर द्रव जल मे परिवर्तित हो गयी है। इस झील के उपर बर्फ की सतह पतली है और लगभग 3 किमी मोटी है। इससे इन विशेष क्षेत्रो की अव्यवस्थित दशा के कारणो का पता चलता है।

लेकिन यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है ? हम जानते है कि पृथ्वी पर जीवन के उद्भव के लिये सबसे महत्वपूर्ण कारक द्रव जल की उपस्थिती है। और हम जानते है कि यूरोपा पर द्रव जल की झीले हैं। लेकिन यह द्रव जल बर्फ की ठोस परत के नीचे है। सतह पर सूर्य प्रकाश जीवन के लिये आवश्यक रसायनो के निर्माण मे मदद करता है लेकिन बर्फ की सतह के निचे ? इन विशेष क्षेत्रो मे जहां पर बर्फ की परत पतली है, यह रसायन सतह के नीचे द्रव जल तक पहुंच सकते है। इन झीलो से ये रसायन और भी नीचे पानी के महासागर तक पहुंच सकते है। अर्थात…..

यह एक और मनोरंजक तथ्य है कि उपर चित्र मे दिखाया गया क्षेत्र (मैकुला थेरा – Macula Thera) यह दर्शाता है कि यह झील अपने निर्माण के दौर मे ही है। यह वर्तमान मे जारी प्रक्रिया है। इसका अर्थ यह है कि वर्तमान मे, आज भी जीवन के लिये आवश्यक रासायनिक प्रक्रियायें जारी है। यूरोपा की सतह के नीचे के जल को को यह वर्तमान मे भी रसायन प्रदान हो रहे हैं। ध्यान दें कि इसका अर्थ यह नही है कि यूरोपा मे जीवन है लेकिन यहां पर जीवन की संभावनायें पहले से कहीं ज्यादा है!

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