अविश्वसनीय, अद्भुत और रोमाँचक: अंतरिक्ष

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हब्बल दूरबीन के २१ वर्ष : आर्प २७३ आकाशगंगा

In अंतरिक्ष, आकाशगंगा on अप्रैल 24, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

आर्प २७३ : एक दूसरे से टकराती युजीसी १८१० तथा युजीसी १८१३ आकाशगंगाएँ

आर्प २७३ : एक दूसरे से टकराती युजीसी १८१० तथा युजीसी १८१३ आकाशगंगाएँ

२४ अप्रैल १९०० को डीस्कवरी स्पेश शटल ने हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला को पृथ्वी की कक्षा तथा इतिहास मे स्थापित किया था। हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला की वर्षगांठ पर पेश है हब्बल द्वारा लिया गया आर्प २७३ आकाशगंगाओ का यह खूबसूरत चित्र !

वर्षो पहले खगोलविज्ञानी हाल्टन आर्प ने विचित्र आकार की कई आकाशगंगाओं का निरीक्षण कर सूचीबद्ध किया था। अब हम जानते है कि ये आकाशगंगाये एक दूसरे पर गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव डाल रही है और कुछ आकाशगंगाये टकरा रही है। इस चित्र मे दो आकाशगंगाये है युजीसी १८१०(उपर) तथा युजीसी १८१३(निचे)। ये दोनो आकाशगंगाये एक दूसरे से टकरा रही है जिन्हे संयुंक्त रूप से आर्प २७३ कहा जाता है।

अधिकतर पेंचदार आकाशगंगाये सममिती मे और लगभग वृत्ताकार होती है लेकिन युजीसी १८१० अलग है और विचित्र भी। इसकी एक बांह मोटी है और अन्य बांहो की तुलना मे दूर है। जिससे एस आकाशगंगा का केन्द्रक आकाशगंगा के ज्यामितिय केन्द्र के पास नही है। इस आकाशगंगा के उपर स्थित निले क्षेत्र नये तारो की जन्मस्थली है और तिव्रता से तारो का निर्माण कर रहे है। ये नवतारे गर्म, महाकाय निले तारे है जिनका जीवनकाल कम होता है। युजीसी १८१३ का आकार भी विकृत हो चूका है, इसकी बांहो मे एक मरोड़ है और गैस का प्रवाह चारो ओर हो रहा हओ।

कुछ करोड़ वर्ष पहले ये आकाशगंगाये एक दूसरे के समीप आ गयी होंगी। इनके गुरुत्वाकर्षण ने एक दूसरे को विकृत कर दिया है, जिससे इनकी बांहे फैल गयी है। इन आकाशगंगाओं की गैस एक दूसरे मे मिल रही है। इन आकाशगंगाओं के केन्द्रक भी असामान्य है, छोटी आकाशगंगा का केन्द्र अवरक्त किरणो मे ज्यादा चमकदार है जो दर्शाता है कि इस क्षेत्र मे तारो का निर्माण धूल के बादलो के पिछे दब गया है। बड़ी आकाशगंगा के केन्द्र मे एक श्याम वीवर(Black Hole) है जिसके चारो ओर गैस प्रवाहित हो रही है जो गर्म होकर प्रकाश उत्सर्जित कर रही है।

दोनो आकाशगंगा विकृत हो चुकी है लेकिन उनका पेंचदार तश्तरी नुमा आकार अभी तक है जिससे यह प्रतित होता है कि ये अपने ब्रह्मांडीय नृत्य के प्रथम चरण मे है। एक दोनो भविष्य मे एक दूसरे का चक्कर लगाते हुये , एक दूसरे के पास आते जायेंगे। कुछ करोड़ो वर्ष बाद ये दोनो मिलकर एक बड़ी आकाशगंगा बनायेंगे। ब्रह्माण्ड मे यह एक सामान्य प्रक्रिया है। हमारी अपनी आकाशगंगा मंदाकिनी ऐसे ही आकाशगंगाओ के मिलने से बनी है। भविष्य मे हमारी आकाशगंगा पड़ोस की आकाशगंगा एन्ड्रोमीडा से टकराएगी और एक महाकाय आकाशगंगा बनाएगी लेकिन कुछ अरबो वर्ष बाद !

इन दोनो आकाशगंगाओ का जो भी भविष्य हो, हम ३००० लाख प्रकाशवर्ष दूर इन खूबसूरत आकाशगंगाओ को देख रहे है। हमे इसके लिए हब्बल वेधशाला का आभारी होना चाहिये। हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला ने पिछले २१ वर्षो मे विज्ञान को महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसमे अंतरिक्ष विज्ञान को जन सामान्य मे लोकप्रिय बनाना भी शामिल है। आज पूरे विश्व मे यह एक ऐसी वेधशाला है जिसे लोग उसके नाम से जानते है।

हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला के जन्मदिन पर हार्दिक बधाईयां।

एक युग का अंत: डिस्कवरी अपनी अंतिम उड़ान से वापिस

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान on मार्च 10, 2011 at 4:41 पूर्वाह्न

डिस्कवरी अंतरिक्ष यान अपनी अंतिम यात्रा से वापसी पर

डिस्कवरी अंतरिक्ष यान अपनी अंतिम यात्रा से वापसी पर

मार्च ९,२०११ बुधवार को ११.५७ सुबह (पूर्वी अमरीका स्थानीय समय) पर डिस्कवरी अंतरिक्ष यान अपनी अंतिम उड़ान से सकुशल पृथ्वी पर लैंड कर गया। यह चित्र इसी ऐतिहासिक क्षण का है। डिस्कवरी अंतरिक्ष यान ने हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला को कक्षा मे स्थापित किया था, दो बार उसकी मरम्मत की थी। इसी यान ने युलीसीस शोध यान का प्रक्षेपण किया था, यह यान मीर अंतरिक्ष केन्द्र से जुड़ने वाला अंतिम यान था, चैलेंजर और कोलंबीया दूर्घटना के बाद उड़ान भरने वाला यान डीस्कवरी ही था। इसी यान ने सर्वाधिक समय अंतरिक्ष मे बिताया था। कुल ३६५ दिन, पूरा एक वर्ष। एक अंतरिक्ष यान जिसने कुल २३८,०००,००० किमी की यात्रा की है। मानव निर्मित सबसे ज्यादा उपयोग किया गया अंतरिक्ष यान ! इस यान के चक्के अब हमेशा के लिये पृथ्वी पर थम गये है।

अपनी अंतिम उड़ान पर ‘डिस्कवरी’

In अंतरिक्ष यान on फ़रवरी 25, 2011 at 8:11 पूर्वाह्न

अपनी अंतिम उड़ान के लिये तैयार डिस्कवरी

अपनी अंतिम उड़ान के लिये तैयार डिस्कवरी

डिस्कवरी अपनी अंतिम उड़ान पर

डिस्कवरी अपनी अंतिम उड़ान पर

सितंबर १९८८ मे डिस्कवरी ने दोबारा उड़ान भरी थी, चैलेंजर दुर्घटना के बाद अंतरिक्ष शटल की यह पहली उड़ान थी। इस अवसर पर ‘विज्ञान प्रगति’ का एक अंतरिक्ष विशेषांक आया था। अंतरिक्ष और खगोलशास्त्र मे मेरी रूची इस उड़ान के बाद ही जागृत हुयी थी। इसके बाद विज्ञान प्रगति मे ही श्री देवेन्द्र मेवाड़ी की सौर मंडल पर एक लेख श्रंखला ने मेरी इस रूची को स्थायित्व दिया था।
आज डिस्कवरी अंतरिक्ष शटल अपनी अंतिम उड़ान भर चूका है, एक युग का अंत होने जा रहा है।

डिस्कवरी अंतरिक्ष शटल  का नाम कैप्टन जेम्स कूक की तीसरी और अंतिम यात्रा के ब्रिटिश जहाज एच एम एस डिस्कवरी पर रखा गया था। इस का निर्माण कार्य जनवरी १९७९ मे प्रारंभ हुआ था। इस यान की पहली उड़ान ३० अगस्त १९८४ मे हुयी थी।

डिस्कवरी अंतरिक्ष शटल ने ही हब्बल अंतरिक्ष दूरबीन को स्थापित किया था। इस दूरबीन की दूसरी और तीसरी मरम्मत का कार्य भी डिस्कवरी ने ही किया था। इस शटल ने युलीसीस उपग्रह और तीन टीडीआरएस उपग्रह को कक्षा मे स्थापित किया था। चैलेंजर(१९८६) और कोलबीया(२००३) शटल दूर्घटनाओं के बाद अंतरिक्ष मे लौटने वाला यान डिस्कवरी ही था। डिस्कवरी ने जोन ग्लेन को ७७ वर्ष की उम्र मे प्रोजेक्ट मर्क्युरी के अंतर्गत सर्वाधिक उम्र का अंतरिक्ष यात्री बनने का श्रेय दिया था।

डिस्कवरी अब तक ३८ उड़ान भर चूका है और अब अपनी अंतिम ३९ उड़ान मे है। यह यान २४ फवरी २०११ तक पृथ्वी की ५२४७ परिक्रमा कर चूका है, और अंतरिक्ष मे ३२२ दिन रह चूका है। किसी अन्य यान की तुलना मे इसने सबसे ज्यादा उड़ाने भरी है।