अविश्वसनीय, अद्भुत और रोमाँचक: अंतरिक्ष

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अंतरिक्ष में तूफान

In अंतरिक्ष, सौरमण्डल on मई 2, 2013 at 9:57 पूर्वाह्न

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सौर मंडल की सीमा पर वायेजर 1

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान, सौरमण्डल on जून 15, 2012 at 7:53 पूर्वाह्न

चित्रकार की कल्पना मे वायेजर 1 की वर्तमान स्थिती

चित्रकार की कल्पना मे वायेजर 1 की वर्तमान स्थिति

नासा के अंतरिक्ष यान वायेजर 1 के ताजा आंकड़ो से ऐसा लग रहा है कि वह सौर मंडल की सीमा पर पहुंच चूका है। अब वह ऐसे क्षेत्र मे है जहाँ पर सौर मंडल बाह्य आवेशित कणो की मात्रा स्पष्टतया अधिक है। वायेजर से जुड़े वैज्ञानिक इन सौरमंडल बाह्य आवेशित कणो की मात्रा मे आयी तीव्र वृद्धि से इस ऐतिहासिक निष्कर्ष पर पहुंचे है कि वायेजर अब ऐसा प्रथम मानव निर्मित यान है जो कि सौर मंडल की सीमा तक जा पहुंचा है।

वायेजर यान

वायेजर यान

वायेजर से आने वाले आंकड़े पृथ्वी तक 17.8 अरब किमी की यात्रा करने मे अब 16 घंटे 38 मिनिट लेते है। नासा के डीप स्पेश नेटवर्क द्वारा प्राप्त वायेजर के आंकड़े सौरमंडल बाह्य आवेशित कणो की विस्तृत जानकारी देते है। ये आवेशित कण हमारे खगोलीय ब्रह्मान्डीय पड़ोस मे तारो के सुपरनोवा विस्फोट से उत्पन्न होते है।

जनवरी 2009 से जनवरी 2012 के मध्य मे ब्रह्माण्डीय विकिरण की मात्रा मे वायेजर ने 25% की वृद्धि दर्ज की है। लेकिन हाल ही मे वायेजर ने इन किरणो की मात्रा मे तीव्र वृद्धि देखी है, 7 मई 2012 के पश्चात इन कणो मे वृद्धि हर सप्ताह 5% की दर से हो रही है और पिछले एक महीने 9% मे वृद्धि देखी गयी है।

यह स्पष्ट वृद्धि हमारे अंतरिक्ष अभियान मे एक नये युग का प्रारंभ है। इस अंतरिक्षयान से प्राप्त सूचनाओं का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसने हीलीयोस्फीयर के आवेशित कणो की मात्रा मे कमी दर्ज की है। हीलीयोस्फीयर सूर्य द्वारा उत्सर्जित आवेशित कणो का एक बुलबुला है। जब वायेजर सौर मंडल की सीमा पार कर जायेगा, तब सूर्य द्वारा उत्सर्जित कणो की मात्रा मे एक तेज कमी आयेगी और एक नया इतिहास बनेगा।

वायेजर से प्राप्त सौर मंडल के इन अंतिम आंकड़ो से वैज्ञानिक को पता चलेगा कि वायेजर यान को घेरे हुये चुंबकिय धाराओं की दिशा मे परिवर्तन हो गया है। जब वायेजर हिलीयोस्फीयर मे है तब इन चुंबकिय धाराओं की दिशा पूर्व से पश्चिम है। जब वायेजर सौर मंडल के बाहर खगोलिय क्षेत्र मे पहुंच जायेगा इन चुंबकिय धाराओं की दिशा उत्तर-दक्षिण होगी। इस विश्लेषण के लिये कई हफ़्ते लग जायेंगे और वायेजर वैज्ञानिक अभी इसका अध्यन कर रहे हैं।

वायेजर को 1977 मे प्रक्षेपित किया गया था, तब अंतरिक्ष अभियान केवल 20 वर्ष का था, उस समय किसी ने सोचा भी नही था कि वायेजर सौर मंडल की सीमाओं तक जा सकेगा। लेकिन वायेजर 1 (वायेजर 2 भी) ने सारी उम्मीदों से कहीं आगे जाकर अपने अभियान को एक नयी उंचाईयों तक पहुंचाया है।

यह दोनो यान अभी भी अच्छी अवस्था मे हैं। वायेजर 2 सूर्य से 14.7 अरब किमी दूरी पर हैं। दोनो वायेजर अभियान के तहत कार्य कर रहे है, जोकि सौर मंडल के ग्रहों के अध्यन का विस्तारित अभियान है।

वर्तमान मे वायेजर मानवता के सबसे दूरस्थ सक्रिय दूत है।

यह भी देखें :

  1. ब्रह्माण्ड की अनंत गहराईयो की ओर : वायेजर १
  2. मानव इतिहास का सबसे सफल अभियान :वायेजर २

शुक्र के सूर्य संक्रमण का सीधा प्रसारण

In ग्रह, सौरमण्डल on जून 6, 2012 at 6:17 पूर्वाह्न


आज बुधवार, 6 जून, 2012एक दुर्लभ खगोलीय घटना होने वाली है। सूर्य पर शुक्र ग्रह का साया पड़ने वाला है जिसे “शुक्र संक्रमण” कहते हैं।

ये नज़ारा अगले 105 वर्षों तक दोबारा नज़र नहीं आयेगा। हवाई, अलास्का, पूर्वी ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी एशिया के आसमान पर इसे छह घंटे से ज्यादा समय तक देखा जा सकेगा।

दुनिया की अन्य जगहों पर इस आकाशीय घटना का आरंभ या अंत ही नजर आएगा।

वैज्ञानिकों के लिए इस घटना का विशेष महत्व है। वे शुक्र संक्रमण के दौरान सूर्य से आने वाले प्रकाश का अध्ययन करेंगे।

इससे उन्हें आकाशगंगा में पृथ्वी के समान अन्य ग्रहों की खोज में मदद मिलेगी।

20 मई 2012 का कंकणाकृति सूर्यग्रहण

In तारे, सौरमण्डल on मई 22, 2012 at 5:20 पूर्वाह्न

20 मई 2012 के कंकणाकृति सूर्यग्रहण की खूबसूरत तस्वीर।

20 मई 2012 का कंकणाकृति सूर्यग्रहण

20 मई 2012 का कंकणाकृति सूर्यग्रहण

हम जानते है कि सूर्यग्रहण पृथ्वी और सूर्य के मध्य चंद्रमा के आ जाने के कारण से होता है।

सामान्य परिस्थितियों मे पृथ्वी से सूर्य का दृश्य आकार और चंद्रमा का दृश्य आकार समान होता है। सूर्य चंद्रमा से हजारो गुणा बड़ा है लेकिन वह पृथ्वी से चंद्रमा की तुलना मे कई गुणा दूर है, जिससे दोनो का दृश्य आकार लगभग समान है। इसलिये जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के मध्य आता है तब वह सूर्य को पूरी तरह से ढक लेता है तब खग्रास सूर्यग्रहण अर्थात पूर्ण सूर्यग्रहण होता है। यह स्थिति सूर्य चंद्रमा और पृथ्वी के पूरी तरह से एक सीध मे आने पर ही होती है।

जब चंद्रमा सूर्य के एकदम सामने नही हो पाता है तब खंडग्रास सूर्यग्रहण होता है। यह स्थिति सूर्य चंद्रमा और पृथ्वी के पूरी तरह से एक सीध मे नही आने से होती है।

सूर्य चंद्रमा और पृथ्वी के पूरी तरह से एक सीध मे आने पर भी खग्रास सूर्यग्रहण कुछ किलोमीटर चौड़ी पट्टी मे ही दिखायी देता है। इस पट्टी मे ही चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह से ढक पाता है, इस पट्टी के दोनो ओर कुछ दूरी तक खंडग्रास सूर्यग्रहण दिखायी देता है तथा उसके बाहर सूर्यग्रहण दिखायी नही देता है।

लेकिन इन दोनो सूर्यग्रहण से भिन्न और दुर्लभ सूर्यग्रहण होता है कंकणाकृति सूर्यग्रहण। चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा वृत्ताकार कक्षा मे न कर, दीर्घवृत्ताकार कक्षा मे करता है जिससे चंद्रमा की पृथ्वी से दूरी कम ज्यादा होते रहती है। एक विशेष परिस्थिति मे जब चंद्रमा पृथ्वी से अधिकतम दूरी पर होता है और चंद्रमा पृथ्वी सूर्य एक सीध मे आ जाते है, तब चंद्रमा का दृश्य आकार सामान्य से कम होने के कारण सूर्य को पूरी तरह ढंक नही पाता है ; जिससे सूर्य एक स्वर्ण कंगन(कंकण) के जैसे दिखता है। इसे  कंकणाकृति सूर्य ग्रहण कहते है। 20 मई 2012 का सूर्यग्रहण इसी प्रकार का था।

हमारे सौर मंडल के बाहर पदार्थ भिन्न है !

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान, सौरमण्डल on फ़रवरी 3, 2012 at 6:51 पूर्वाह्न

आक्सीजन कहां है ?

आक्सीजन कहां है ?

नासा के अंतरखगोलीय सीमा अन्वेषक यान ( Interstellar Boundary Explorer -IBEX) ने हमारे सौर मंडल के कुछ महत्वपूर्ण तत्वों के वितरण मे अद्भुत विषमता की खोज की है। विशेषतः हमारे सौर मंडल मे आक्सीजन की मात्रा ज्यादा क्यों है ?

IBEX को 2008 मे सौर मंडल के बाहर खगोलीय माध्यम की जांच के लिये प्रक्षेपित कीया गया था। यह खोजी अंतरिक्ष यान तब से सौर मंडल मे 52,000 मील/घंटा की गति से प्रवाहित उदासीन आक्सीजन, नियान तथा हीलीयम की धारा से संबधित आंकड़े एकत्रित कर रहा है। उसने पाया कि खगोलिय माध्यम मे आक्सीजन के 74 परमाणु प्रति 20 नियोन परमाणु है, जबकि यह सौर मंडल मे यह अनुपात 111आक्सीजन परमाणु प्रति 20 नियान परमाणु है।

नासा का IBEX अंतरिक्ष यान

नासा का IBEX अंतरिक्ष यान

IBEX अभियान के प्रमुख जांचकर्ता डेवीड मैककोमास के अनुसार

“हमारा सौर मंडल उसके बाहर के अंतराल से भिन्न है, यह दो संभावना दर्शाता है। या तो सौर मंडल अपनी वर्तमान स्थिति से अलग से आकाशगंगा के आक्सीजन से भरपूर भाग मे बना है या जीवन प्रदान करने वाली आक्सीजन की एक बड़ी मात्रा खगोलीय धूल या बर्फ मे बंधी है और स्वतंत्र रूप से अंतरिक्ष मे विचरण मे असमर्थ है।”

जब सौर मंडल आकाशगंगा मे विचरण करता है वह ब्रह्माण्डीय विकिरण से हीलीयोस्फीयर द्वारा रक्षित रहता है। यह हीलीयोस्फीयर सूर्य उष्मीय तथा चुंबकीय त्वरण द्वारा उत्सर्जित आवेशित कणो की धारा से बना बुलबुला है। यह बुलबुला सौर मंडल से बाहर से आये आवेशित कणो को सौर मंडल मे प्रवेश से रोकता है लेकिन उदासीन कण सौर मंडल मे स्वतंत्र रूप से प्रवेश कर सकते है और इन्ही कणो का IBEX ने मापन कीया है।

हीलीयोस्फीयर

हीलीयोस्फीयर

IBEX के एक वैज्ञानिक एरीक क्रिश्चीयन के अनुसार :

हमारे हीलीयोस्फीयर पर आकाशगंगा के पदार्थ तथा चुंबकिय क्षेत्र द्वारा उत्पन्न दबाव का मापन, आकाशगंगा मे विचरण करते हमारे सौर मंडल के आकार और आकृति को तय करने मे सहायता करेगा।

नासा ने अब हमारे प्रथम खगोलीय अंतरिक्ष यान वायेजर 1 की ओर ध्यान देना प्रारंभ किया है जिसे 1977 मे प्रक्षेपित किया गया था और वह अब हीलीयोस्फियर की सीमा पर है। यह यान शायद हिलीयोस्फीयर के बाहर क्या है, बताने मे समर्थ हो।

श्वेत श्याम उपग्रह

In ग्रह, सौरमण्डल on जनवरी 25, 2012 at 4:17 पूर्वाह्न

शनि का श्वेत श्याम चंद्रमा : आऐपिटस

शनि का श्वेत श्याम चंद्रमा : आऐपिटस

यह विचित्र आकाशीय पिंड कैसा है ? इस विचित्र पिंड का कुछ भाग कोयले के जैसा गहरा है जबकि शेष भाग बर्फ के जैसे चमकीला है। यह शनि का चंद्रमा आऐपिटस है। इसके गहरे रंग के भाग की संरचना अज्ञात है लेकिन अवरक्त वर्णक्रम की जांच से माना जाता है कि यह कार्बन के ही कीसी गहरे प्रकार से बना है। आऐपिटस के विषुवत पर एक असाधारण पर्वत श्रेणी है जो इस चंद्रमा को अखरोट के जैसे बनाती है। यह चित्र अमरीकी अंतरिक्षयान कासीनी से 2007 मे लिया है जब कासीनी आऐपिटस से 75,000 किमी दूरी पर था। चित्र मे दिखायी दे रहे विशाल क्रेटर का व्यास 450 किमी है और ऐसा प्रतित होता है कि इसने एक समान आकार के पुराने क्रेटर को ढंका हुआ है। गहरे रंग के पदार्थ ने इसके पूर्वी क्षेत्रो मे समान रूप से पर्वतो और क्रेटरो को से ढंका हुआ है। इस गहरे रंग के पदार्थ की मोटाई लगभग 1 मीटर से कम है।

पृथ्वी के आकार के ग्रह की खोज!

In अंतरिक्ष, ग्रह, पृथ्वी, ब्रह्माण्ड, सौरमण्डल on दिसम्बर 21, 2011 at 5:58 पूर्वाह्न

पृथ्वी और शुक्र की तुलना मे केप्लर 20e तथा केप्लर 20f

पृथ्वी और शुक्र की तुलना मे केप्लर 20e तथा केप्लर 20f

खगोलशास्त्रीयों ने दूसरी पृथ्वी की खोज मे एक मील का पत्त्थर पा लीया है, उन्होने एक तारे की परिक्रमा करते हुये दो ग्रहों की खोज की है। और ये दोनो ग्रह पृथ्वी के आकार के है!

इन ग्रहों को केप्लर 20e तथा केप्लर 20f नाम दिया गया है। चित्र मे आप देख सकते हैं कि वे हमारे मातृ ग्रह पृथ्वी के आकार के जैसे ही है। 20e का व्यास 11,100 किमी तथा 20f का व्यास 13,200 किमी है। तुलना के लिए पृथ्वी का व्यास 12,760 किमी है। ये दोनो ग्रह सौर मंडल के बाहर खोजे गये सबसे छोटे ग्रह है। इससे पहले पाया गया सबसे छोटा ग्रह केप्लर 10b था जोकि पृथ्वी से 40% ज्यादा बड़ा था।

लेकिन यह स्पष्ट कर दें कि ये दोनो ग्रह पृथ्वी के आकार के हैं लेकिन पृथ्वी के जैसे नही है। इनका मातृ तारा केप्लर 20 हमारे सूर्य के जैसा है, लेकिन थोड़ा छोटा और थोड़ा ठंडा है। यह तारा हमसे 950 प्रकाशवर्ष दूर है। लेकिन ये दोनो ग्रह केप्लर 20 की परिक्रमा पृथ्वी और सूर्य की तुलना मे समीप से करते है। इनकी कक्षा अपने मातृ तारे से 76 लाख किमी तथा 166 लाख किमी है। यह कक्षा अपने मातृ तारे के इतने समीप है कि इन ग्रहो की सतह का तापमान क्रमशः 760 डीग्री सेल्सीयस तथा 430 डीग्री सेल्सीयस तक पहुंच जाता है। इनमे से ठंडे ग्रह केप्लर 20f पर भी यह तापमान टीन या जस्ते को पिघला देने के लिये पर्याप्त है।

इन ग्रहों की यात्रा के लिये सूटकेश पैक करना अभी जल्दबाजी होगी, हालांकि राकेट से इन तक जाने के लिये अभी लाखों वर्ष लग जायेंगे। हम अभी इन ग्रहो का द्रव्यमान नही जानते है। लेकिन इन ग्रहो के आकार के कारण इनका द्रव्यमान पृथ्वी के तुल्य ही होगा।

यह प्रमाणित करता है कि केप्लर अंतरिक्ष वेधशाला अंतरिक्ष मे पृथ्वी के जैसे ग्रहो की खोज मे सक्षम है। यह अभियान सही दिशा मे प्रगतिशील है।

यह यह भी दर्शाता है कि हमारा सौर मंडल अपने आप मे अकेला नही है। हम ऐसे कई तारो को जानते है जिनके अपने ग्रह है लेकिन अब तक पाये गये सभी ग्रह महाकाय थे और उनकी खोज आसान थी। लेकिन केप्लर 20e तथा केप्लर 20f पृथ्वी के जैसे है और यह एक बड़ी खोज है।

केप्लर 20 मंडल मे तीन अतिरिक्त ग्रह भी है जोकि पृथ्वी से बड़े है, इनका नाम केप्लर 20b,c तथा d है, इनका व्यास क्रमशः 24,000,40,000 तथा 35,000 किमी है, जोकि नेपच्युन और युरेनस से कम है, इसके बावजूद ये विशालकाय ग्रह है। हम इनके द्रव्यमान को जानते है, इनका द्रव्यमान पृथ्वी से क्रमशः 8.7,16.1 तथा 20 गुणा ज्यादा है। आप इन्हे महापृथ्वी कह सकते है।

यह सभी ग्रह अपने तारे की परिक्रमा काफी समीप से करते है। इनमे से सबसे बाहरी ग्रह केप्लर 20f है लेकिन यह सारी प्रणाली तुलनात्मक रूप से बुध की कक्षा के अंदर ही है! यह प्रणाली हमारे सौर मंडल से अलग है। हमारे सौर मंडल मे कम द्रव्यमान वाले ग्रह अंदर है, तथा ज्यादा द्रव्यमान वाले ग्रह बाहर, लेकिन केप्लर 20 मे यह बारी-बारी से है, बड़ा ग्रह – छोटा ग्रह – बड़ा ग्रह – छोटा ग्रह…

हम यह सब कैसे जानते है ?

केप्लर वेधशाला अंतरिक्ष मे है, वह एक समय मे एक छोटे से हिस्से का निरीक्षण करती है। इसके दृश्य पटल मे 100,000 तारे है जिसमे केप्लर 20 भी है। जब किसी तारे की परिक्रमा करता कोई ग्रह अपने मातृ तारे के सामने से जाता है, उस तारे के प्रकाश मे थोड़ी कमी आती है, इसे संक्रमण(ग्रहण) कहते है। जितना बड़ा ग्रह होगा उतना ज्यादा प्रकाश रोकेगा। प्रकाश की इस कमी को केप्लर वेधशाला पकड़ लेती है और प्रकाश मे आयी कमी की मात्रा से उसका आकार ज्ञात हो जाता है, इसी तरह से हमने इन ग्रहो का आकार ज्ञात किया है।

केप्लर20 तारा प्रणाली

केप्लर20 तारा प्रणाली

जब यह ग्रह अपने तारे की परिक्रमा करते है तब वे अपने मातृ तारे को भी अपने गुरुत्व से विचलीत करते। इस विचलन को भी उस तारे के प्रकाश से मापा जा सकता है, यह विचलन उसके प्रकाश मे आने वाले डाप्लर प्रभाव से देखा जाता है। यह डाप्लर विचलन दर्शाता है कि उस तारे पर ग्रह का गुरुत्व कितना प्रभाव डाल रहा है और यह गुरुत्व उस ग्रह के द्रव्यमान पर निर्भर करता है। केप्लर 20 प्रणाली मे हम उसके विशाल ग्रहो द्वारा डाले गये गुरुत्विय प्रभाव को मापने मे सफल हो पाये है, जिससे हम केवल उसके विशाल ग्रहो का द्रव्यमान ही जानते है। लेकिन केप्लर 20e तथा 20f इतने छोटे है कि उनका गुरुत्विय प्रभाव हम मापने मे असमर्थ है।

एक और तथ्य स्पष्ट कर दें कि हम इन ग्रहो का अस्तित्व जानते है, इन ग्रहों का कोई चित्र हमारे पास नही है। प्रस्तुत चित्र कल्पना आधारित है। इन ग्रहो का अस्तित्व अप्रत्यक्ष प्रमाणो अर्थात उनके द्वारा उनके मातृ तारे पर पड़ने वाले प्रभाव से प्रमाणित है। यह विधियाँ विश्वशनिय है इसलिये हम कह सकते है कि इन ग्रहों का अस्तित्व निसंदेह है।

इन ग्रहो की खोज सही दिशा मे एक कदम है। हमारी दिशा है कि किसी तारे के गोल्डीलाक क्षेत्र मे जहां पर जल अपनी द्रव अवस्था मे रह सके पृथ्वी के आकार के चट्टानी ग्रह की खोज! आशा है कि निकट भविष्य मे ऐसा ग्रह खोज लेंगे। और यह दिन अब ज्यादा दूर नही है।

केप्लर अंतरिक्ष वेधशाला: सूर्य सदृश तारे के जीवन योग्य क्षेत्र मे पृथ्वी सदृश ग्रह की खोज!

In अंतरिक्ष, ग्रह, तारे, पृथ्वी, सौरमण्डल on दिसम्बर 6, 2011 at 6:00 पूर्वाह्न

केप्लर 22 की परिक्रमा करता केप्लर 22b(कल्पना आधारित चित्र)

केप्लर 22 की परिक्रमा करता केप्लर 22b(कल्पना आधारित चित्र)

यह एक बड़ा समाचार है। अंतरिक्ष वेधशाला केप्लर ने सूर्य के जैसे तारे के जीवन योग्य क्षेत्र(गोल्डीलाक क्षेत्र) मे एक ग्रह की खोज की गयी है। और यह ग्रह पृथ्वी के जैसे भी हो सकता है।

इस तारे का नाम केप्लर 22 तथा ग्रह का नाम केप्लर 22बी रखा गया है। यह पृथ्वी से 600 प्रकाशवर्ष दूर स्थित है। केप्लर 22 तारे का द्रव्यमान सूर्य से कम है और इसका तापमान भी सूर्य की तुलना मे थोड़ा कम है। केप्लर 22बी अपने मातृ तारे केप्लर 22 की परिक्रमा 290 दिनो मे करता है।

हमारे सौर मंडल के बाहर ग्रह की खोज कैसे की जाती है, जानने के लिये यह लेख देखें।

290 दिनो मे अपने मातृ तारे की परिक्रमा इस ग्रह को विशेष बनाती है। इसका अर्थ यह है कि यह ग्रह अपने मातृ तारे की जीवन योग्य क्षेत्र की कक्षा मे परिक्रमा कर रहा है। इस ग्रह की अपने मातृ तारे से दूरी इतनी है कि वहाँ पर पानी द्रव अवस्था मे रह सकता है। पानी की अनुपस्थिति मे जीवन संभव हो सकता है लेकिन पृथ्वी पर उपस्थित जीवन के लिए पानी आवश्यक है। पृथ्वी पर जीवन के अनुभव के कारण ऐसे ग्रहों की खोज की जाती है जिन पर पानी द्रव अवस्था मे उपस्थित हो। किसी ग्रह पर पानी की द्रव अवस्था मे उपस्थिती के लिए आवश्यक होता है कि वह ग्रह अपने मातृ तारे से सही सही दूरी पर हो, जिसे गोल्डीलाक क्षेत्र कहते है। इस दूरी से कम होने पर पानी भाप बन कर उड़ जायेगा, इससे ज्यादा होने पर वह बर्फ के रूप मे जम जायेगा।

इस ग्रह की मातृ तारे से दूरी, पृथ्वी और सूर्य के मध्य की दूरी से कम है, क्योंकि इसका एक वर्ष 290 दिन का है। लेकिन इसका मातृ तारा सूर्य की तुलना मे ठंडा है, जो इस दूरी के कम होने की परिपूर्ती कर देता है। यह स्थिति इस ग्रह को पृथ्वी के जैसे जीवनसहायक स्थितियों के सबसे बेहतर उम्मीदवार बनाती है। लेकिन क्या यह ग्रह पृथ्वी के जैसा है ?

यह कहना अभी कठीन है!

केप्लर किसी ग्रह की उपस्थिति उस ग्रह के अपने मातृ तारे पर संक्रमण द्वारा पता करता है। जब कोई ग्रह अपने मातृ तारे के सामने से गुजरता है, वह उसके प्रकाश को अवरोधित करता है। जितना बड़ा ग्रह होगा, उतना ज्यादा प्रकाश अवरोधित करेगा। खगोलशास्त्रीयों ने इन आंकड़ो के द्वारा जानकारी प्राप्त की कि केप्लर 22बी पृथ्वी से 2.4 गुणा बड़ा है। हमारे पास समस्या यह है कि हम इतना ही जानते है! हम नही जानते कि यह ग्रह चट्टानी है या गैसीय! हम नही जानते कि इस ग्रह पर वातावरण है या नही ?

केप्लर 22 तथा केप्लर 22b प्रणाली की आंतरिक सौर मंडल से तुलना

केप्लर 22 तथा केप्लर 22b प्रणाली की आंतरिक सौर मंडल से तुलना

हम यह नही कह सकते कि इस ग्रह पर क्या परिस्थितियाँ हैं। उपर दिये गये चित्र से आप जान सकते हैं कि द्रव्यमान और वातावरण से बहुत अंतर आ जाता है। तकनीकी रूप से मंगल और शुक्र दोनो सूर्य के जीवन योग्य क्षेत्र मे हैं, लेकिन शुक्र का घना वातावरण उसे किसी भट्टी के जैसे गर्म कर देता है, वहीं मंगल का पतला वातावरण उसे अत्यंत शीतल कर देता है।(यदि इन दोनो ग्रहो की अदलाबदली हो जाये तो शायद सौर मंडल मे तीन ग्रहो पर जीवन होता !) केप्लर 22बी शायद स्वर्ग के जैसे हो सकता है या इसके विपरीत। यह उस ग्रह के गुरुत्वाकर्षण पर निर्भर करता है, और गुरुत्वाकर्षण उसके द्रव्यमान पर निर्भर है।

यह एक समस्या है कि हमे इस ग्रह का द्रव्यमान ज्ञात नही है। केप्लर की संक्रमण विधी से ग्रह का द्रव्यमान ज्ञात नही किया जा सकता; द्रव्यमान की गणना के लिये उस ग्रह के गुरुत्वाकर्षण द्वारा उसके मातृ तारे पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है, जोकि एक जटिल गणना है। केप्लर 22बी अपने मातृ तारे की परिक्रमा के लिए 290 दिन लेता है जो इस निरीक्षण को और कठिन बनाता है। ( कोई ग्रह अपने मातृ तारे के जितना समीप होगा वह अपने मातृ तारे पर उतना ज्यादा प्रभाव डालेगा तथा उसे अपने तारे की परिक्रमा कम समय लगेगा।) इस ग्रह की खोज मे समय लगने के पीछे एक कारण यह भी था कि इसके खोजे जाने के लिये उस ग्रह का अपने तारे पर संक्रमण(ग्रहण) आवश्यक था। इसका पहला संक्रमण केप्लर के प्रक्षेपण के कुछ दिनो पश्चात हुआ था लेकिन इस ग्रह को 290 दिनो बाद दोबारा संक्रमण आवश्यक था जो यह बताये कि प्रकाश मे आयी कमी वास्तविक थी, तथा अगले 290 दिनो पश्चात एक तीसरा संक्रमण जो 290 दिनो की परिक्रमा अवधी को प्रमाणित करे।

यदि यह मान कर चले की यह ग्रह संरचना मे पृथ्वी के जैसा है, चट्टान, धातु और पानी से बना हुआ। इस स्थिति मे इस ग्रह का गुरुत्व पृथ्वी से ज्यादा होगा। इस ग्रह के धरातल पर आपका भार पृथ्वी की तुलना मे 2.4 गुणा ज्यादा होगा, अर्थात वह ग्रह पृथ्वी के जैसी संरचना रखते हुये भी पृथ्वी के जैसा नही होगा। दूसरी ओर यदि यह ग्रह हल्के तत्वों से बना है तब इसका गुरुत्व कम होगा।

लेकिन इस सब से इस तथ्य का महत्व कम नही होता कि इस ग्रह का अस्तित्व है। हमने एक ऐसा ग्रह खोजा है जिसका द्रव्यमान कम है और जीवन को संभव बनाने वाली दूरी पर अपने मातृ तारे की परिक्रमा कर रहा है। अभी तक हम जीवन योग्य दूरी पर बृहस्पति जैसे महाकाय ग्रह या अपने मातृ तारे के अत्यंत समीप कम द्रव्यमान वाले ग्रह ही खोज पा रहे थे। यह प्रथम बार है कि सही दूरी पर शायद सही द्रव्यमान वाला और शायद पृथ्वी के जैसा ग्रह खोजा गया है। हम अपने लक्ष्य के समीप और समीप होते जा रहे हैं।

वर्तमान मानव ज्ञान की सीमा के अंतर्गत अनुसार पूरी आकाशगंगा मे जीवन से भरपूर एक ही ग्रह है, पृथ्वी! लेकिन निरीक्षण बताते हैं कि ऐसे बहुत से ग्रह हो सकते है, और इन ग्रहो के कई प्रकार हो सकते है। हर दिन बीतने के साथ ऐसे ग्रह की खोज की संभावना पहले से बेहतर होते जा रही है। कुछ ही समय की बात है जब हम पृथ्वी के जैसा ही जीवन की संभावनाओं से भरपूर एक ग्रह पा लेंगे।

मंगल की यात्रा पर मानव उत्सुकता (मंगल शोध वाहन ’क्यूरियोसिटी ’)

In अंतरिक्ष यान, अंतरिक्ष वाहन, सौरमण्डल on नवम्बर 28, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

’क्यूरियोसिटी’ का फ्लोरिडा के केप कैनावेरल से एक एटलस रॉकेट के द्वारा प्रक्षेपण

’क्यूरियोसिटी’ का फ्लोरिडा के केप कैनावेरल से एक एटलस रॉकेट के द्वारा प्रक्षेपण

अमरीका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने शनिवार 26, नवंबर 2011 को मंगल ग्रह पर अब तक का अपना सबसे उत्कृष्ट रोबोटिक रोवर को भेज दिया है।

रोबोटिक रोवर क्यूरियोसिटी को फ्लोरिडा के केप कैनावेरल से एक एटलस रॉकेट के ज़रिये अंतरिक्ष में भेजा गया। ‘रोबोटिक रोवर‘ यानी रोबोट के समान एक मशीन है जो अंतरिक्ष में जाकर मंगल के चारों ओर घूमेगी। ये एक बड़ी गाड़ी के आकार का घूमने वाला वाहन है। छह चक्कों वाले इस मोबाइल लेबॉरेटरी रोबोटिक रोवर का नाम क्यूरियोसिटी रखा गया है और इसका वज़न करीब एक टन है। क्यूरियोसिटी को ‘मार्स साइंस लैबोरेटरी’ (एमएसएल) के नाम से भी जाना जाता है।

क्यूरियोसिटी मंगल पर भेजे गए पूर्व के रोवर से पांच गुना भारी है, और इसके पास चूर हो चुके चट्टान नमूनों की जांच करने की क्षमता है। क्यूरियोसिटी का मुख्य काम ये पता करना है कि क्या कभी मंगल ग्रह पर जीवन मौजूद था। ये मंगल ग्रह से मिट्टी के सैंपल इकट्ठा करेगा और कैमरे से इस ग्रह के सतह को स्कैन भी किया जाएगा। इसमें प्लूटोनियम बैटरी है जिससे इसे दस साल से भी ज़्यादा समय तक लगातार ऊर्जा मिलती रहेगी।

मंगल वाहन ’क्यूरियोसिटी’

मंगल वाहन ’क्यूरियोसिटी’

ये रोवर अगस्त 2012 में मंगल पर पहुंचेगा और यदि ये सफलतापूर्वक मंगल की सतह पर उतर गया तो ये रोवर दो वर्ष के अपने मिशन के दौरान इस बात की जांच करेगा कि क्या वहां का वातावरण सूक्ष्म जीवों के विकास के लिए अनुकूल है या नहीं। प्रक्षेपण के 50 मिनट बाद नासा का यान से पहला संपर्क भी स्थापित हुआ है।

इस पूरे मिशन का कुल खर्च ढाई अरब डॉलर है।

यूरोपा पर जीवन की संभावनाएं पहले से ज्यादा !

In अंतरिक्ष, ग्रह, सौरमण्डल on नवम्बर 22, 2011 at 3:41 पूर्वाह्न

यूरोपा की सतह पर के अव्यवस्थित भाग

यूरोपा की सतह पर के अव्यवस्थित भाग

हम वर्षो से यह जानते रहे है कि बृहस्पति का चन्द्रमा यूरोपा मे ठोस जमी हुयी सतह के नीचे द्रव जल का महासागर है। यूरोपा की लगभग पूरी सतह ठोस बर्फ से बनी हुयी है। हम यह भी जानते हैं कि इस सतह पर हजारो दरारें है जो पृथ्वी पर पानी पर तैरती बर्फ की परतो पर की दरारों के जैसे ही हैं। यूरोपा पर बृहस्पति और अन्य चंद्रमाओं के गुरुत्वीय खिंचाव के कारण उसका आंतरिक भाग गर्म होता है।

लेकिन एक प्रश्न जो मानव मन को मथता रहा है, वह यूरोपा की बर्फ की सतह की मोटाई को लेकर है? यह बर्फ की सतह कितने किलोमीटर मोटी है ? या वह एक पतली परत मात्र है? इन दोनो के समर्थन मे प्रमाण मौजूद है, जो रहस्य को गहरा करते हैं। यूरोपा की सतह का अध्ययन करते खगोलविज्ञानीयों के अनुसार यह बर्फ की परत साधारणतः बहुत मोटी है और इस सतह के नीचे द्रव जल की झीलें होना चाहीये।

चित्रकार की कल्पना मे यूरोपा की सतह के नीचे द्रव जल की झीलें और महासागर

चित्रकार की कल्पना मे यूरोपा की सतह के नीचे द्रव जल की झीलें और महासागर

उपर दिया गया चित्र गैलीलीयो अंतरिक्ष यान द्वारा किये गये निरीक्षण पर आधारित है, इस यान ने बृहस्पति की कई वर्षो तक परिक्रमा की थी। यह चित्र प्रकाशीय चित्र(Optical Image) तथा फोटोक्लीनोमेट्री(photoclinometry ) का संयुक्त चित्र है। [फोटोक्लीनोमेट्री तकनीक से चित्र  द्वारा सतह के भिन्न भागो की उंचाई ज्ञात की जाती है।] जामुनी और लाल रंग उंचा भाग दर्शाता है और इस चित्र मे धंसा हुआ भूक्षेत्र स्पष्ट देखा जा सकता है। यह भाग “अव्यवस्थित भूभाग(chaotic terrain)” कहलाता है। यूरोपा की अधिकतर सतह सपाट और व्यवस्थित है जो कि एक बर्फ की मोटी सतह से अपेक्षित है। लेकिन कुछ छोटे भाग अव्यवस्थित है और यह क्षेत्र सतह के नीचे के द्रव जल की वजह से है। भू भाग के नीचे का यह जल विशालकाय झीलो के रूप मे है जो बर्फ की सतह से ढंका है, इन झीलों का आकार उत्तरी अमरीका की विशालकाय झीलों के समान है।

निचे दिया गया चित्र कलाकार की कल्पना से है और यह यूरोपाकी भूमीगत झींलों की संरचना दर्शाता है। सामान्यतः यूरोपा की सतह पर बर्फ की परत मोटी है जोकि यूरोपा की सतह के दिखायी देने वाले स्वरूप के अनुरूप है। लेकिन कुछ विशेष क्षेत्रो मे बर्फ की सतह के निचे बर्फ पिघल कर द्रव जल मे परिवर्तित हो गयी है। इस झील के उपर बर्फ की सतह पतली है और लगभग 3 किमी मोटी है। इससे इन विशेष क्षेत्रो की अव्यवस्थित दशा के कारणो का पता चलता है।

लेकिन यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है ? हम जानते है कि पृथ्वी पर जीवन के उद्भव के लिये सबसे महत्वपूर्ण कारक द्रव जल की उपस्थिती है। और हम जानते है कि यूरोपा पर द्रव जल की झीले हैं। लेकिन यह द्रव जल बर्फ की ठोस परत के नीचे है। सतह पर सूर्य प्रकाश जीवन के लिये आवश्यक रसायनो के निर्माण मे मदद करता है लेकिन बर्फ की सतह के निचे ? इन विशेष क्षेत्रो मे जहां पर बर्फ की परत पतली है, यह रसायन सतह के नीचे द्रव जल तक पहुंच सकते है। इन झीलो से ये रसायन और भी नीचे पानी के महासागर तक पहुंच सकते है। अर्थात…..

यह एक और मनोरंजक तथ्य है कि उपर चित्र मे दिखाया गया क्षेत्र (मैकुला थेरा – Macula Thera) यह दर्शाता है कि यह झील अपने निर्माण के दौर मे ही है। यह वर्तमान मे जारी प्रक्रिया है। इसका अर्थ यह है कि वर्तमान मे, आज भी जीवन के लिये आवश्यक रासायनिक प्रक्रियायें जारी है। यूरोपा की सतह के नीचे के जल को को यह वर्तमान मे भी रसायन प्रदान हो रहे हैं। ध्यान दें कि इसका अर्थ यह नही है कि यूरोपा मे जीवन है लेकिन यहां पर जीवन की संभावनायें पहले से कहीं ज्यादा है!