अविश्वसनीय, अद्भुत और रोमाँचक: अंतरिक्ष

Archive for the ‘निहारीका’ Category

ठंडा होता हुआ न्यूट्रॉन तारा

In अंतरिक्ष, तारे, निहारीका on मार्च 9, 2011 at 5:13 पूर्वाह्न

 

कैस्सीओपेइआ ए (कैस्स ए) सुपरनोवा अवशेष

कैस्सीओपेइआ ए (कैस्स ए) सुपरनोवा अवशेष

सुपरनोवा अवशेष कैस्सीओपेइआ ए (कैस्स ए) ११,००० प्रकाश वर्ष दूर है। इस सुपरनोवा से विस्फोट के पश्चात प्रकाश ३३० वर्ष पहले पहुंचा था। इस सुपरनोवा विस्फोट के पश्चात फैलता हुआ मलबा १५ प्रकाशवर्ष की चौड़ाई मे है। इस सुपरनोवा के मध्य मे एक न्यूट्रॉन तारा है जो अत्याधिक घनत्व का है और मातृ तारे के केन्द्रक के घनीभूत हो जाने से बना है। महाकाय मातृ तारे के मृत्यु के समय सुपर नोवा विस्फोट मे केन्द्रक न्यूट्रॉन तारा बन गया और बाहरी परतों से यह विशालकाय ग्रहीय निहारिका। यह चित्र प्रकाशीय चित्र और एक्स किरणो के मिश्रण से बना है। कैस्स ए अब ठंडा हो रहा है लेकिन इसमे इतनी उर्जा शेष है जो एक्स किरणो का उत्सर्जन करने मे समर्थ है। चन्द्रा एक्स किरण वेधशाला से पिछले १० वर्षो के निरिक्षण के आंकड़ो के अनुसार यह न्यूट्रॉन तारा तेजी से ठंडा हो रहा है। ठंडा होने की यह दर इतनी अधिक है कि इस न्यूट्रॉन तारे के केन्द्रक का अधिकतर भाग एक घर्षणरहित न्यूट्रॉन द्रव का निर्माण कर रहे है। चन्द्रा वेधशाला के परिणामो ने पदार्थ की इस विचित्र अवस्था के प्रमाण प्रथमतः उपलब्ध किये है।

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अंतरिक्ष मे वेलेंटाईन डे

In अंतरिक्ष, निहारीका on फ़रवरी 15, 2011 at 6:13 पूर्वाह्न

अंतरिक्ष मे वेलेंटाईन डे

अंतरिक्ष मे वेलेंटाईन डे

W5 एक निहारिका है जो ६००० प्रकाश वर्ष दूर कैसीओपीया(Cassiopeia) तारामंडल की ओर है। यह विशालकाय है और आकाश मे 2×1.5 डीग्री तक चौड़ी है(पुर्ण चंद्रमा से १५ गुणा बड़ी)। इस निहारिका मे जो दिल का आकार बना है वह इस चित्र मे दिखायी दे रहे निले रंग के विशालकाय तारो द्वारा प्रवाहित गैसीय वायु द्वारा बनी हुयी एक गैस की कन्दरा है। इस जगह की गैस निले तारो ने बहा दी है। ये नये निले तारे इस महाकाय निहारिका के मध्य गैस का बुलबुला बना रहे है।
यह चित्र अवरक्त किरणो से लिया गया है और तारो का रंग निला नही है। यह प्रकाश ३.६ माइक्रान तरंगदैर्ध्य का है।

उत्तरी अमेरिका निहारिका

In अंतरिक्ष, निहारीका on फ़रवरी 13, 2011 at 6:07 पूर्वाह्न

उत्तरी अमरीका निहारिका (बाएं दृश्य प्रकाश में, दायें अवरक्त प्रकाश में )

उत्तरी अमरीका निहारिका (बाएं दृश्य प्रकाश में, दायें अवरक्त प्रकाश में )

अपने विकास की हर अवस्था में तारे ! नासा की अंतरिक्ष वेधशाला स्पिटज़र से लिए इस चित्र में आप देख सकते है ,धुल भरे छोटे बिन्दूओ से लेकर नए जवान तारो तक !

इस खगोलीय समुदाय का नाम है, उत्तरी अमेरिका निहारिका. दृश्य प्रकाश की किरणों में यह क्षेत्र उत्तरी अमरीका महाद्वीप के जैसे लगता है, आश्चर्य जनक रूप से मेक्सिको खाड़ी की समानता पर ध्यान दीजिये ! लेकिन स्पिटज़र के अवरक्त किरणों से लिए गए इस चित्र में महाद्वीप अदृश्य हो जाता है और बचता है एक धुल और नए तारो से भरा हुआ एक बड़ा सा बादल !

लुइसा रेबुल्ल जो नासा के पासाडेना कैलिफोर्निया में कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलोजी के स्पिटज़र विज्ञानं केंद्र में काम करती है, के अनुसार

इस चित्र में मुझे सबसे ज्यादा अद्भूत यहाँ लगता है कि दृश्य प्रकाश का चित्र अवरक्त प्रकाश के चित्र से कितना अलग है. हम अवरक्त चित्र में कितना ज्यादा देख सकते है?  स्पिटज़र का चित्र धुल और नए तारे से भरे इस बादल की कितनी सारी विशेषताओं को दर्शाता है.

रेबुल्ल और उनकी टीम ने इस बादल में २००० से ज्यादा नए और नए तारे बनाने के उम्मीदवार तारो का पता लगाया है. इसके पहले ऐसे सिर्पफ २०० तारो की जानकारी थी. ऐसा इसलिए था क्योंकि नए तारे धुल के कम्बल में ढंके हुए थे और दृश्य प्रकाश में छुपे हुए थे. स्पिटज़र का अवरक्त कैमरा धुल में छुपे हुए तारो को देख सकता है.

एक तारे का जन्म सिकुड़ते हुए धुल और गैस के बादल में होता है. जैसे ही पदार्थ अंदर की और सिकुड़ता है, एक गैस और धुल का  तश्तरी नुमा आकार उसके आसपास घूमना शुरू हो जाता है, नया बनाता हुआ तारा एक घूमते हुए भौरे जैसा होता है. एक गैस की तेज धारा इस तश्तरी के ऊपर और निचे लम्बवत बहना शुरू हो जाती है. जैसे ही तारा बड़ा होना शुरू होता है इस धुल और गैस की  तश्तरी से ग्रह बनाना शुरू हो जाते है. अधिकतर गैस ख़त्म हो जाती है और एक सौर मंडल जैसे एक नया परिवार बन जाता है.

स्पिटज़र का यहाँ चित्र तारे के जन्म से लेकर किशोर अवस्था के इन सभी पडावो को दिखाता है, जिसमे धुल के सिकुड़ते बादल, गैस की तेज धारा प्रवाहित करते नवजात तारे, नए ग्रहों के नए पिता तारे तथा परिपक्व तारे.

रेबुल्ल के अनुसार

यहाँ चित्र एक व्यस्त क्षेत्र का क्षेत्र का चित्र है, जहाँ हर जगह तारे  है, उत्तरी अमरीका क्षेत्र में, उसके सामने , उसके पीछे. जो तारे इस क्षेत्र में नहीं है उन्हें हम मिलावट क्षेत्र  कहते है. स्पिटज़र से हम इस मिलावट क्षेत्र को अलग कर सकते है और और इस क्षेत्र ने नए तारो को इस क्षेत्र से अलग पुराने तारो को पहचान सकते है.

उत्तरी अमरीका निहारिका अपने साथ एक रहस्य समेटे है, इसके ऊर्जा श्रोत को लेकर. कोई भी इस निहारिका के ऊर्जा श्रोत बड़े महाकाय तारो के समूह को पहचान नहीं पाया है. स्पिटज़र का चित्र इस निहारिका के मेक्सिको खाड़ी क्षेत्र के पीछे के हिस्से के बारे में छुपे इन महाकाय तारो के बारे में संकेत देता है. यह स्पिटज़र की २४ माइक्रोन तक की रोशनी पकड़ लेने वाली दूरबीन की तस्वीर में मेक्सिको की खाड़ी क्षेत्र के चमक से दिखाई  पड़ता है. यह रोशनी मेक्सिको खाड़ी क्षेत्र के गहरे रंग के बदलो के पीछे से आ रही है, जो पकाश किरणों को अवरूद्ध कर देते है.

इस निहारिका से पृथ्वी की दूरी भी एक रहस्य है, कुछ अनुमानों से यह १८०० प्रकाश वर्ष है. स्पिटज़र इस संख्या को को सही अनुमान के निकट ले जाएगा.

 

हैन्नी का वूरवेर्प

In अंतरिक्ष, निहारीका, ब्रह्माण्ड on जनवरी 12, 2011 at 6:17 पूर्वाह्न

हब्बल दूरबीन से लीये गये इस चित्र को देखीये। पहली नजर मे देखने पर यही लगेगा की यह एक स्पाइरल के आकार आकाशगंगा है। लेकिन इस आकाशगंगा के निचे देखीये…..

हैन्नी का वूरवेर्प

हैन्नी का वूरवेर्प

ये अजीब सी हरी वस्तु क्या है ?

ये है हैन्नी का वूरवेर्प(Voorwerp)! चित्र पर क्लीक किजिये और इसे बड़े आकार मे देखीये…अब आप पुछेंगे कि ये वूरवेर्प क्या है ? यह डचभाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है “वस्तु“। वस्तु ? लेकिन अंतरिक्ष मे ये विशालकाय वस्तु क्या है ?

हैन्नी वान अर्केल ने इस वूरवेर्प को खोजा था और मजे की बात यह है कि हैन्नी खगोलविज्ञानी नही है। हैन्नी डच महारानी के गिटार-वादक ’ब्रायन मे’ का ब्लाग पढ रही थी जो कि एक खगोलविज्ञानी भी है। उस ब्लाग मे ब्रायन ने एक प्रोजेक्ट ’गैलेक्सी जू’ के बारे मे लिखा था, इस प्रोजेक्ट मे आप अपने कम्युटर पर आकाशगंगाओ को वर्गीकृत कर सकते है। हैन्नी ने इस प्रोजेक्ट को खोला और आकाशगंगाओ को देखना शुरू किया। किसी तरह उसने इस विचित्र सी हरी रंग की वस्तु को देखा। उसने खगोलविज्ञानीयो से इस वस्तु के बारे मे पुछा। अब खगोल विज्ञानीयो ने इस पर ध्यान दिया और हब्बल दूरबीन से इसका विचित्र चित्र लिया और यह चित्र आपके सामने है।

यह क्या है ? हरा रंग यह बताता है कि यह एक महाकाय गैस का बादल है, और हरा रंग इसे प्रदिप्तीत आक्सीजन से प्राप्त हो रहा है। लेकिन इस बादल के पास प्रकाश का कोई साधन नही है, यह प्रकाश उसे पास की आकाशगंगा से प्राप्त हो रहा होगा। यह गैस का हरे रंग का वूरवेर्प हमारी आकाशगंगा के बराबर विशालकाय है, पूरे १००,००० प्रकाशवर्ष चौड़ा !

यह माना जाता है कि इस आकाशगंगा के मध्य एक “महाकाय श्याम विवर (Super Massive Black Hole)” है जिसे IC २४९७ नाम दिया गया है। एक लंबे अंतराल से यह श्याम विवर पदार्थ को निगले जा रहा है। किसी श्याम विवर मे पदार्थ के निगलने से पहले घटना क्षितीज(Event Horizon) पर एक श्याम विवर के आसपास एक तश्तरी बन जाती है। यह तश्तरी श्यामविवर मे गीर रहे पदार्थ के घर्षण और गुरुत्वाकर्षण से गर्म होती है और विभिन्न बलो के क्रियाशील होने से यह दो विपरित दिशाओ मे उर्जा और पदार्थ की धारा(Jet) प्रवाहित करना प्रारंभ कर देती है।

इसी समय पर आकाशगंगा के बाहर हजारो प्रकाशवर्ष चौड़ा गैस का बादल शांत अवस्था मे रहा था। अचानक IC २४९७  के केन्द्र के श्याम विवर द्वारा उत्सर्जित उर्जा और पदार्थ की धारा इस बादल से टकरायी , इस धारा ने उसे प्रकाशित कर दिया और यह बादल किसी नियानलाईट(सच्चाई मे आक्सीजन लाईट) के जैसे प्रदिप्त हो उठा।

किसी समय, लगभग २००,००० वर्ष पहले IC २४९७  के केन्द्र के श्याम विवर मे पदार्थ का जाना रूक गया। शायद श्याम विवर के आसपास पदार्थ खत्म हो गया, जिससे इसकी तश्तरी से उर्जा और पदार्थ की धारा का उत्सर्जन रूक गया। लेकिन वूरवेर्प अभी तक प्रदिप्तित है क्योंकि गैस को अपनी चमक खोने मे लम्बा समय लगता है, लेकिन एक समय आने पर यह वूरवेर्प चमकना बंद कर देगा और हमारी निगाहों से ओझल हो जायेगा।

विज्ञानीयो के लिये यह एक असाधारण पिंड है। इसके जैसा पिंड इसके पहले देखा नही गया है इसलिये इसके बारे मे हर जानकारी नयी है।

अंतरिक्ष मे एक नाजूक वलय : एस एन आर ०५०९

In अंतरिक्ष, निहारीका on जनवरी 6, 2011 at 5:58 पूर्वाह्न

अंतरिक्ष में मेरे पसंदीदा पिंडो में है तारो के मरने समय सुपरनोवा विस्फोट के बाद बनी गैस कवच निहारीकाये ! साबुन के झाग के बुलबुले जैसी ये निहारिका SNR 0509 ! हब्बल दूरबीन द्वारा ली गयी इस वलयाकार निहारिका कितनी सुन्दर है ?

 

एस एन आर ०५०९: वलय निहारिका

एस एन आर ०५०९: वलय निहारिका

अंतरिक्ष में ऐसी कई और भी निहारिकाये है ! जैसे हेलिक्स निहारिका जो निचे दी गयी तस्वीर में है. हेल्किश निहारिका और  SNR 0509 में एक अंतर यह है कि हेलिक्स निहारिका का वलय मोटा है लेकिन SNR 0509  का वाले काफी पतला है| ऐसा क्यों ?

हेलिक्स निहारिका

हेलिक्स निहारिका

पहले यह समझना जरूरी है कि इस तरह के पिंड कैसे बनते है ? जब कम द्रव्यमान वाला सूर्य जैसे तारा मरता है वह परमाण्विक कणो एक खगोलिय वायू मे उड़ा देता है। यह सौर वायू जैसे होती है लेकिन काफी घनी होती है। इसकी भौतिकी जटिल है लेकिन सरल रूप मे कह सकते है कि तारे के बुढे़ होने पर इस तारे से निकलने वाली परमाण्विक कणो की वायू की गति बढते जाती है। तेज कण धीमे कणो से टकराते है और चमकने लगते है और इस तरह ग्रहीय निहारिका बनती है। चित्र मे दिखायी गयी हेलीक्स निहारिका के जैसे।

कुछ मामलो मे ग्रहीय निहारिका एक वलय जैसे दिखायी देती है जो कि “लिंब ब्राइटनींग(Limb Brightening)” के कारण है। यदि तारे की वायू स्थिर हो तो वह तारे के चारो ओर एक बड़ी गोलाकार निहारिका बनाती है। लेकिन तेज वायू इस गोले को खोखला करते हुये एक खोखले गोले का कवच जैसा बनाती है। जब गैस प्रदिप्त होती है यह अंतरिक्ष मे एक साबून के बुलबुले के जैसे दिखती है क्योंकि किनारो पर केन्द्र की तुलना मे ज्यादा गैस होती है। बाजू मे दिया चित्र देखें। कल्पना करे कि आप एकदम दायें है और बायें गैस के गोलाकार कवच  को देख रहे है। जब आप केन्द्र के आरपार देखते है तब आपको किनारो की तुलना मे कम गैस दिखायी देती है। क्योंकि गैस प्रदिप्त हो रही है; जितनी देर आप उसे देखेंगे वह और चमकिली दिखेगी।  इसलिये निहारिका एक वृताकार  आकार मे किनारो पर चमकती है और मध्य मे अंधेरी होती है, जो एक वलय के रूप मे दिखती है।

यह जानना जरूरी है कि गैस पारदर्शी होती है। यदि वह एक दिवार की तरह अपारदर्शी होती, तब निहारिका एक वलय की जगह एक तश्तरी की तरह दिखायी देती। प्रकाश किरणे गैस के आरपार चली जाती है। इससे कोई फर्क नही पड़ता कि गैस का परमाणू गोलाकार कवच के निकट भाग मे है या दूरस्थ भाग मे; यदि वह प्रकाश उत्सर्जित करता है, वह दिखायी देगा। इससे भी कोई फर्क नही पड़ता कि आप किस दिशा से देख रहे है क्योंकि वह गोलाकार कवच के रूप मे है, आप कही भी हो वह एक वलय के रूप मे ही दिखेगा !

इस तरह की निहारिकाओ के बाह्य किनारे एक दम साफ होते है लेकिन अंदरूनी किनारे धूंधले और मोटे होते है। SNR ०५०९ को देखें, उसके बाह्य किनारे कितने साफ है लेकिन अंदरूनी हिस्सा धूंधला है लेकिन ज्यादा नही। SNR ०५०९ अलग क्यों है ?
इसका उत्तर इसके नाम मे ही है। SNR का मतलब है SuperNovaRemanant। अर्थात सुपर नोवा के अवशेष। यह कोई शांत तरिके से मृत तारा नही है, यह एक विस्फोट मे मृत तारा है। जब यह होता है भौतिकि अलग होती है। सुपरनोवा विस्फोट मे विस्तृत होते पदार्थ की गति अत्याधिक होती है जोकि हजारो किमी प्रति सेकंड हो सकती है। छोटे तारो की मृत्यू मे यह सैकड़ो किमी/सेकंड हो सकती है। इसके अतिरिक्त तारो के मध्य मे काफी सारा पदार्थ तैरते रहता है जो सुपरनोवा विस्फोट से उत्सर्जित पदार्थ से और ज्यादा गति से टकराता है। इससे गैसे और ज्यादा शक्ति से संपिड़ित होती है और आघाततरंगे(Shock Wave) बनाती है। इससे और पतला वलय बनता है।

 

एस एन आर ०५०९ की X Ray तस्वीर

एस एन आर ०५०९ की X Ray तस्वीर

SNR ०५०९ का वलय २० प्रकाशवर्ष चौड़ा है और ५००० किमी/सेकंड की गति से विस्तृत हो रहा है। ग्रहीय निहारिका सामान्यतः १ से २ प्रकाशवर्ष चौड़ी होती है। किसी सुपरनोवा का विस्फोट ही किसी तारे की ऐसी हालत कर सकता है।
हमारा सूर्य इतना बड़ा नही है कि उसमे सुपरनोवा विस्फोट होगा। अपनी मृत्यू के समय वह ग्रहीय निहारिका का पथ चुनेगा। लेकिन यह भी माना जाता है कि सौर मंडल के निर्माता गैस के बादल को पास ही के किसी सुपरनोवा विस्फोट की आघात तरंगो ने सौर मंडल के निर्माण के लिये संपिडित किया था।

जब हम SNR ०५०९ जैसे पिंडो को देखते है हम अपना भूतकाल और भविष्य दोनो ही देखते है। तारो की मौत कितनी ही विस्फोटक क्यो ना हो कितनी सूंदर होती है !

आयताकार लाल निहारिका

In अंतरिक्ष, निहारीका, ब्रह्माण्ड on दिसम्बर 16, 2010 at 5:10 पूर्वाह्न

ये फोटोशाप या किसी कम्प्युटर द्वारा बनाई गयी डीजीटल तस्वीर नही है! ये तो प्रकृती द्वारा निर्मित है !

आयताकार लाल निहारिका

आयताकार लाल निहारिका

यह असामान्य लाल आयताकार निहारिका कैसे बनी ?

इस निहारिका के मध्य मे एक वृद्ध होता तारा-युग्म (Binary Stars)है जो इस निहारिका को उर्जा प्रदान करता है। लेकिन यह तारा युग्म इस निहारिका के रंगो का कारण बताने मे असमर्थ है। इस निहारिका का असामान्य लाल आयताकार होना एक मोटे धूलि टारस के कारण है जो गोलाकार रूप से धूल और गैस के बाह्यप्रवाह को शंक्वाकार रूप मे संकुचित करता है। ये शंकू एक X के जैसे दिखायी देते है। जबकि टारस किनारो पर आयताकार रूप मे दिखायी दे रहा है।
इस निहारिका के रंगो के कारण के पिछे ज्यादा जानकारी नही है लेकिन शायद यह इसमे उपस्थित हायड्रोकार्बन अणुओ से है। यह हायड्रोकार्बन के अणु जिवन की मूलभूत ईकाई है।
यह लाल आयताकार नेबुला २३०० प्रकाशवर्ष दूर युनिकार्न (Unicorn) तारामंडल की ओर स्थित है। उपर दी गयी तस्वीर ह्ब्बल दूरबीन से ली गयी है। कुछ अरब वर्ष पश्चात यह निहारिका अपने केन्द्र के तारो के इंधन की समाप्ति के कारण एक ग्रहीय निहारिका(Planetary nebula)के रूप मे परिवर्तित हो जायेगी।

ब्रम्हाण्डिय पुष्प

In अंतरिक्ष, निहारीका on दिसम्बर 6, 2010 at 11:37 पूर्वाह्न

आईरीश निहारिका

आईरीश निहारिका

नाजूक ब्रम्हाण्डीय पंखुड़ीयो की तरह यह खगोलीय धूल और गैस का बादल १३०० प्रकाशवर्ष दूर सेफियस नक्षत्रमंडल मे पुष्पित हो रहा है ! इसे इण्द्रधनुष की ग्रीक देवी के नाम पर आइरीस निहारिका कहा जाता है। वैसे इसका नाम NGC 7023 है। यह पुष्पो के जैसे दिखने वाली अकेली निहारिका नही है लेकिन इस खूबसूरत तस्वीर मे आइरीस नेबुला के विभिन्न रंगो और संतुलन को प्रभावी तरिके से देखा जा सकता है।

इस निहारिका मे निहारिकिय पदार्थ एक गर्म और नवीन तारे को घेरे हुये है। इस निहरिका का मुख्य रंग निला है जो इस निहारिका के धुलिकणो द्वारा परावर्तित रंग है। इस निहारिका के केन्द्रिय तंतु हल्की लालिमा दिखाते है जो कि कुछ धुलिकणो द्वारा तारे की अदृश्य पराबैगणी किरणो को दृश्य लाल किरणो के रूप  मे परिवर्तन है।

अवरक्त (Infra red) निरिक्षण संकेत देते है कि इस निहारिका मे जटिल कार्बन के अणु हो सकते है, जिन्हे पालीसायक्लिक अरोमैटिक हायड़्रोकार्बन कहते है। इस चित्र मे दर्शित निला हिस्सा छः प्रकाशवर्ष की चौड़ाई मे है।

तस्वीर  कापीराईट(Copyright) : Daniel LópezIAC

एक मृत सितारे की कलाकृती

In निहारीका on फ़रवरी 3, 2007 at 1:34 पूर्वाह्न

M2-9 : तितली निहारीका के पंख

 

क्या तारे अपनी मृत्यु के बाद ज्यादा कलात्मक हो जाते है ? चित्र देख कर तो ऐसा ही प्रतित होता है। वे अपनी मत्यु के पश्चात एक सुंदर और अनुठी ब्रम्हांडिय कलाकृती का निर्माण करते है।
इस चित्र मे हमारे सूर्य के जैसे ही एक कम द्रव्यमान वाला तारा M2-9 अपनी मृत्यु के बाद अपना बाहर का गैस का आवरण उत्सर्जीत कर एक सफेद वामन (बौने) तारे मे परिवर्तीत हो गया है। यह तारे द्वारा उत्सर्जीत गैस एक सुंदर कलात्मक ग्रहीय निहारीका के रूप मे अगले हजारो वर्षो तक अपनी चमक बिखेरती रहेगी।

M29 या तितली निहारीका हमसे २१०० प्रकाशवर्ष दूर है। इसके पंख एक विचीत्र किंतु अधूरी कहानी बयान कर रहे है। इसके केन्द्र मे दो सफेद वामन तारे प्लुटो की कक्षा से १० गुनी बडी कक्षा मे एक तश्तरी नुमा आकार के अंदर परिक्रमा कर रहे है। मरते हुये तारे द्वारा  इस तस्तरी के बाहर उत्सर्जीत गैस ने यह द्विध्रुवीय आकृती बनायी है। ग्रहीय निहारीका के निर्माण की भौतिकिय प्रक्रिया के बारे मे आज भी ज्यादा जानकारी नही है।