अविश्वसनीय, अद्भुत और रोमाँचक: अंतरिक्ष

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अपोलो ९: एक अभ्यास उड़ान

In चन्द्र अभियान on फ़रवरी 12, 2007 at 1:01 पूर्वाह्न

अपोलो ९ यह अपोलो कार्यक्रम का तीसरा मानव सहित अभियान था। यह १० दिवसीय पृथ्वी की परिक्रमा का अभियान था जो ३ मार्च १९६९ को प्रक्षेपित किया गया था। यह सैटर्न राकेट की दूसरी मानव उडान और चन्द्रयान (Lunar Module) की पहली मानव उडान थी।

अभियान के अंतरिक्ष यात्री

  • जेम्स मैकडिवीट (James McDivitt) (2 अंतरिक्ष उडान का अनुभव), कमांडर
  • डेवीड स्काट (David Scott) (2 अंतरिक्ष उडान का अनुभव), नियंत्रण यान चालक
  • रसेल स्कवीकार्ट(Russell Schweickart) (1 अंतरिक्ष उडान का अनुभव), चन्द्रयान चालक

मैकडिवीट ,स्काट ,स्कवीकार्ट

मैकडिवीट ,स्काट ,स्कवीकार्ट

वैकल्पिक यात्री दल

  • पीट कोनराड (Pete Conrad) (जेमिनी ५, जेमिनी ११,अपोलो १२, स्कायलेब २ मे उडान),कमांडर
  • डीक गोर्डान (Dick Gordon) (जेमिनी ११ और अपोलो १२ मे उडान),नियंत्रण कक्ष चालक
  • एलेन बीन (Alan Bean) (अपोलो १२ और स्कायलैब ३की उडान), चन्द्रयान चालक

अकटूबर १९६७ मे यह तय किया गया था कि नियंत्रण कक्ष की पहली मानव उडान (अपोलो ७ या अभियान C) की उडान के बाद , दूसरा मानव अभियान(अभियान D) सैटर्न 1B पर अभ्यास करने के लिये किया जायेगा। इसके बाद चन्द्रयान को एक और सैटर्न 1B पर अभ्यास के लिये भेजा जायेगा। इसके अलावा सैटर्न ५ पर नियंत्रण कक्ष और चन्द्रयान दोनो को एक साथ भेजा जायेगा।

लेकिन चन्द्रयान की निर्माण समस्याओ के कारण अभियान D १९६९ के वसंत तक पूरा नही हो पाया, इसलिये नासा ने C और D  के मध्य एक और प्राईम C अभियान भेजने का निर्णय लिया जो कि नियंत्रण कक्ष को(चन्द्रयान को छोड़कर) चन्द्रमा तक जायेगा।इस अभियान को अपोलो ८ कहा गया जो कि सफल था।

अपोलो ९ यह चन्द्रमा तक नही जाने वाला था,यह सिर्फ पृथ्वी की परिक्रमा करने वाला अभियान था, इसे सैटर्न ५ राकेट से प्रक्षेपित किया गया जबकि योजना दो छोटे आकार वाले सैटर्न 1B की थी।

अभियान के मुख्य मुद्दे
अपोलो ९यह चन्द्रयान के साथ पहला अंतरिक्ष जांच अभियान था।१० दिनो की यात्रा मे तीनो हिस्सो राकेट , मुख्य नियंत्रण कक्ष और चन्द्रयान को अंतरिक्ष मे पृथ्वी की कक्षा मे स्थापित किया। चन्द्रयान को नियंत्रण कक्ष से अलग कर वापिस जोडने का अभ्यास किया गया। यह सब उसी तरह किया गया जैसा असली अभियान ने चन्द्रमा की कक्षा मे किया जाना था।

स्कीवीकार्ट और स्काट यान के बाहर (EVA- Extra Vehicular activity) की गतिविधीया की। स्कीवीकार्ट ने नये अपोलो अंतरिक्ष सूट की जांच की। इस सूट मे जिवन रक्षक उपकरण लगे हुये थे, इससे पहले के सूट कुछ पाईपो और तारो के जरिये यान से जुडे रहते थे।स्काट ने नियंत्रण कक्ष के हैच से स्कीवीकार्ट  की गतिविधीयो का चित्रण किया। स्कीवीकार्ट अंतरिक्ष मे आनेवाली शारीरीक परेशानीयो से जुझने लगा था इसलिये जांच सिर्फ चन्द्रयान तक ही सीमीत रही।

स्काट की अंतरिक्ष मे चहल कदमी(EVA)

स्काट की अंतरिक्ष मे चहल कदमी(EVA)

मैकडीवीट और स्कीवीकार्ट ने चन्द्रयान की जांच उडान की।चन्द्रयान के मुख्य यान से अलग होने और जुडने का अभ्यास किया। उन्होने चन्द्रयान को मुख्ययान से १११ मील की दूरी तक उडाते ले गये।

चन्द्रयान


अभियान के अंत मे अपोलो ९ प्रशांत महासागर मे गीर गया जिसे USS गुडालकैनाल जहाज ने निकाला।

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चांद के पार चलो : अपोलो ८

In चन्द्र अभियान on फ़रवरी 11, 2007 at 1:11 पूर्वाह्न

अपोलो ८ यह अपोलो कार्यक्रम का दूसरा मानव अभियान था जिसमे कमाण्डर फ़्रैंक बोरमन, नियंत्रण कक्ष चालक जेम्स लावेल और चन्द्रयान चालक विलीयम एन्डर्स चन्द्रमा ने की परिक्रमा करने वाले प्रथम मानव होने का श्रेय हासील किया। सैटर्न ५ राकेट की यह पहली मानव उड़ान थी।

नासा ने इस अभियान की तैयारी सिर्फ ४ महिनो मे की थी। इसके उपकरणो का उपयोग कम हुआ था, जैसे सैटर्न ५ की सिर्फ २ उडान हुयी थी। अपोलो यान सिर्फ एक बार अपोलो ७ मे उडा था। लेकिन इस उडान ने अमरीकन राष्ट्रपति जे एफ़ केनेडी के १९६० के दशक के अंत से पहले चन्द्रमा पर पहुंचने के मार्ग को प्रशस्त किया था।
२१ दिसंबर १९६८ को प्रक्षेपण के बाद चन्द्रमा तक यात्रा के लिये तीन दिन लग गये थे। उन्होने २० घन्टे चन्द्रमा की परिक्रमा की। क्रीसमस के दिन उन्होने टी वी पर सीधे प्रसारण के दौरान उन्होने जीनेसीस पुस्तक पढी।

इस दल के यात्री

  • फ्रैंक बोरमन (Frank Borman) -२ अंतरिक्ष उडान का अनुभव जेमिनी ७ और अपोलो ८, कमांडर
  • जेम्स लावेल(James Lovell) – ३ अंतरिक्ष उडान का अनुभव जेमिनी ७, जेमिनी १२ अपोलो ८ और अपोलो १३,नियंत्रण कक्ष चालक
  • विलीयम एण्डर्स (William Anders)– १ अंतरिक्ष उडान का अनुभव अपोलो ८,चन्द्रयान चालक
लावेल ऐंडर्स और बारमन

लावेल ऐंडर्स और बारमन


वैकल्पिक यात्री
किसी यात्री की मृत्यु या बिमार होने की स्थिती मे वैकल्पिक यात्री दल

  • नील आर्मस्ट्रांग (Neil Armstrong) -जेमिनी ८ और अपोलो ११ की उडान, कमांडर
  • बज एल्ड्रीन(Buzz Aldrin)-जेमिनी १२ और अपोलो ११ की उडान,नियंत्रण कक्ष चालक
  • फ़्रेड हैसे (Fred Haise) -अपोलो १३ की उडान, चन्द्रयान चालक

उडान

अपोलो ८ की उडान

अपोलो ८ की उडान


अपोलो ८ यह २१ दिसंबर को प्रक्षेपित किया गया, जिसमे कोई भी बडी परेशानी नही आयी। प्रथम चरण(S-IC) के राकेट ने ०.७५% क्षमता का प्रदर्शन किया जिससे उसे पुर्वनियोजित समय से २.४५ सेकंड ज्यादा जलना पडा। द्वितिय चरण के अंत मे राकेट ने पोगो दोलन का अनुभव किया जो १२ हर्टज के थे। सैटर्न ५ ने अंतरिक्षयान को १८१x१९३ किमी की कक्षा मे स्थापित कर दिया जो पृथ्वी की परिक्रमा ८८ मिनिट १० सेकंड मे कर रहा था।
अगले २ घन्टे और ३८ मिनिट यात्रीदल और अभियान नियंत्रण कक्ष ने यान की जांच की। अब वे चन्द्रपथ पर जाने के लिये तैयार थे। इसके लिये राकेट SIVB तिसरे चरण का प्रयोग होना था जो कि पिछले अभियान(अपोलो ६) मे असफल था।

S-IVB यान से अलग होने के पश्चात

S-IVB यान से अलग होने के पश्चात


अभियान नियंत्रण कक्ष से माइकल कालींस ने प्रक्षेपण के २ घण्टे २७ मिनिट और २२ सेकंड के बाद अपोलो ८ को चन्द्रपथ पर जाने का आदेश दिया। इस अंतरिक्ष यान को भेजे जाने वाले आदेशो को कैपकाम(capcoms-Capsule Communicators) कहा जाता है।अगले १२ मिनिट तक यात्री दल ने यान का निरिक्षण जारी रखा। तिसरे चरण(SIVB) का राकेट दागा गया जो ५ मिनिट १२ सेकंड जलता रहा, जिससे यान की गति १०,८२२ मी/सेकंड हो गयी। अब वे सबसे तेज यात्रा करने वाले मानव बन चुके थे।
SIVB ने अपना काम किया था। यात्री दल ने यान को घुमा कर पृथ्वी की तस्वीरे ली। पूरी पृथ्वी को एकबार मे संपूर्ण रूप से देखने वाले वे प्रथम मानव थे।

प्रथम बार मानवो ने वान एलेन विकीरण पट्टा पार किया, यह पट्टा पृथ्वी से २५,००० किमी तक है। इस पट्टे के कारण यात्रीयो ने छाती के एक्स रे के से दूगने के बराबर( १.६ मीली ग्रे) विकिरण ग्रहण किया जो प्राणघातक नही था। सामान्यतः मानव एक वर्ष मे २-३ मीली ग्रे विकिरण ग्रहण करता है।

चांद की ओर
जीम लावेल का नियंत्रण कक्ष चालक के रूप मे मुख्य कार्य यात्रा मार्ग निर्धारण था लेकिन ये कार्य भू स्थित नियंत्रण कक्ष से किया जा रहा था। जीम लावेल का कार्य असामान्य परिस्थिती के लिये ही था। उडान के सात घण्टो के बाद (योजना से १ घण्टा ४० मिनिट देरी) से उन्होने यान को असक्रिय तापमान नियंत्रण मोड मे डाल दिया। इस मोड मे यान को सूर्य की किरणो से गर्म होने से बचाने के लिये घुमाते रखा जाता है अन्यथा सूर्य की रोशनी मे यान की सतह गर्म होकर तापमान २०० डीग्री सेल्सीयस तक पहुंच जाता, वहीं छाया वाले हिस्से मे तापमान गीरकर शुन्य से निचे १०० डीग्री सेल्सीयस तक पहुंच जाता।
११ घण्टे के बाद राकेट दागकर यान को सही रास्ते पर लाया गया। अबतक यात्री लगातार १६ घण्टो से जागे हुये थे। अब फ्रैंक बोरमन को अगले ७ घण्टे सोने की बारी थी। लेकिन बीना गुरुत्वाकर्षण के अंतरिक्ष मे सोना आसान नही था। फ्रैंक ने नींद की गोली लेकर सोने की कोशीश की। सोकर उठने के बाद वह बिमार महसूस कर रहे थे। उन्होने दो बार उल्टी की और उन्हे डायरीया हो गया था। पुरे यान मे उल्टी के बुलबुले फैल गये थे। यात्रीयो ने जितनी सफाई हो सकती थी, वो की। यात्रीयो ने यह सुचना , भूस्थित नियंत्रण कक्ष को दी। बाद मे जांच से पता चला कि फ्रैंक अवकाश अनुकुलन लक्षण(Space Adaptation Syndrome) से पिडीत थे, जो एक तिहाई अंतरिक्ष यात्रीयो को पहले दिन होता है। यह भारहिनता द्वारा शरीर के असंतुलन निर्माण के कारण होता है।

अंपोलो ८ के यात्री यान के अंदर

अंपोलो ८ के यात्री यान के अंदर

प्रक्षेपण के २१ घंटे बाद अंतरिक्ष यात्री दल ने टीवी से जरीये सीधा प्रसारण किया। इसमे २ किग्रा भारी कैमरा उपयोग मे लाया गया और श्वेत स्याम प्रसारण किया गया। इस प्रसारण मे यात्रीयो ने यान का एक टूर दिखाया और अंतरिक्ष से पृथ्वी का नजारा दिखाया। लावेल ने अपनी मां को जन्मदिन की बधाई दी। १७ मिनिट बाद सीधा प्रसारण टूट गया।

अंतरिक्ष से पृथ्वी

अंतरिक्ष से पृथ्वी

 


अब तक सभी यात्री योजना के अनुसार सोने के समय के अभयस्त हो चुके थे। यात्रा के ३२.५ घण्टे बीते चुके थे। लावेल और एन्डर्श सोने चले गये।

तीन खिडकीयों पर तेल की परत के कारण एक धुण्ध छा गयी थी और बाकी दो चन्द्रमा की विपरीत दिशा मे होने से यात्री अब चन्द्रमा को देख नही पा रहे थे।
दूसरा सीधा प्रसारण ५५ घंटो के बाद हुआ। इस प्रसारण मे यान ने पृथ्वी की तस्वीरे भेजना शुरू की। यह प्रसारण २३ मिनिट तक चला।
चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण मे
५५ घंटे ४० मिनिट के बाद यान चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण मे आ गया। अब वे चन्द्रमा से ६२,३७७ किमी दूर थे और १२१६ मी/सेकंड की गति से उसकी ओर बढ रहे थे। उन्होने यान के पथ मे परिवर्तन किया और अब वे १३ घंटे बाद चन्द्रमा की कक्षा मे परिक्रमा करना शुरू करने वाले थे।

प्रक्षेपण के ६१ घंटे बाद जब वे चन्द्रमा से ३९,००० किमी दूर थे। उन्होने राकेट के इण्जन को दाग कर पथ मे एक बार और बदलाव किया, इस बार उन्होने गति कम की। इसके लिये इंजन ११ सेकंड तक जलता रहा। अब वे चन्द्रमा से ११५.४ किमी दूर थे।

उडान के ६४ घण्टे बाद यात्रीदल ने चन्द्रमा कक्षा प्रवेश की तैयारीयां शुरू की। भूस्थित नियण्त्रण कक्ष ने ६८ घण्टे बाद उन्हे आगे बढने का निर्देश दिया। चन्द्रमा कक्षा प्रवेश के १० मिनिट पहले यात्रीयो ने यान की अंतिम जांच की। अब उन्हे चन्द्रमा दिखायी दे रहा था, लेकिन वे चन्द्र्मा के अंधेरे हिस्से की ओर थे। लावेल ने पहली बार तिरछे कोण से चन्द्रमा उजली सतह को देखा। लेकिन इस दृश्य को देखने उनके पास सिर्फ २ मिनिट बचे।

चन्द्रमा की कक्षा मे
२ मिनिट पश्चात अर्थात प्रक्षेपण के ६९ घंटे ८ मिनिट और १६ सेकंड बाद SPS इंजन ४ मिनिट १३ सेकंड जला। यान चन्द्रमा की कक्षा मे पहुंच गया था। यात्रीयो इन चार मिनिटो को अपने जीवन का सबसे लंबा अंतराल बताया है। इस प्रज्वलन के समय मे कमी उन्हे अंतरिक्ष मे ढकेल सकती थी या चन्द्रमा की दिर्घवृत्ताकार कक्षा मे डाल सकती थी। ज्यादा समय से वे चन्द्रमा से टकरा सकते थे। अब वे चन्द्रमा की परिक्रमा कर रहे थे जो अगले २० घंटो तक चलने वाली थी।
पृथ्वी पर नियंत्रण कक्ष यान के चन्द्र्मा के पिछे से सामने आने की प्रतिक्षा कर रहा था। यान के चन्द्र्मा पिछे होने के कारण उनका यान से संपर्क टूटा हुआ था। सही समय पर उन्हे अपोलो ८ से संकेत मील गये और यान चंद्र्मा के सामने की ओर आ गया था। अब वह ३११.१x१११.९ किमी की कक्षा मे था।

लावेल ने यान की स्थिती बताने के बाद चन्द्र्मा के बारे कुछ इस तरह से बयान दिया

चन्द्रमा का रंग भूरा है, या कोई रंग नही है; यह प्लास्टर आफ पेरीस या कीसी भूरे समुद्रा बीच की तरह लग रहा है। अब हम काफी विस्तार से देख सकते है। सी आफ फर्टीलीटी वैसा नही है जैसा पृथ्वी से दिखता है। इसके और बाकी क्रेटर मे काफी अंतर है। बाकी क्रेटर लगभग गोल हैं। इनमे से काफी नये है। इनमे से काफी विशेषतया गोल वाले उलकापात से बने लगते है। लैन्गरेनस एक काफी बडा क्रेटर है और इसके मध्य मे एक शंकु जैसा गढ्ढा है।

मारे ट्रैन्क्युलीटेटीस

मारे ट्रैन्क्युलीटेटीस


लारेल चन्द्रमा के हर उस भाग किसके पास से यान गुजर रहा था जानकारी देता रहा। यात्रीयो का एक कार्य अब चन्द्रमा पर अपोलो ११ के उतरने की जगहे निश्चित करना भी था। वे चन्द्रमा की हर सेकंड एक तस्वीर ले रहे थे। बील एंडर्स ने अगले २० घंटे इसी कार्य मे लगाये। उन्होने चद्रमा की कुल ७०० और पृथ्वी की १५० तस्वीरे खींची।

उस घंटे के दौरान यान पृथ्वी पर के नियंत्रण कक्ष के संपर्क मे रहा। बारमन ने यान के इंजन के बारे मे आंकडे के बार मे पुछताछ की। वह यह निश्चीत कर लेना चाहता था कि इंजन सही सलामत है जिससे की वह वापसी की यात्रा मे उपयोग मे लाया जा सकता है या नही। वह भूनियंत्रण कक्ष से कर परिक्रमा के पहले निर्देश लेते रहता था।

चन्द्रमा की दूसरी परिक्रमा के बाद जब वे उसके सामने आये उन्होने एक बार फिर से टीवी पर सीधा प्रसारण किया। इस प्रसारण मे उन्होने चद्र्मा की सतह की तस्वीरे भेजी। इस परिक्रमा के बाद मे उन्होने यान की कक्षा मे परिवर्तन किये। अब वे ११२.६ x ११४.८ किमी की कक्षा मे थे।

चन्द्रमा पर पृथ्वी उदय

चन्द्रमा पर पृथ्वी उदय


अगली दो परिक्रमा मे उन्होने यान की जांच और चन्द्रमा की तस्वीरे लेना जारी रखा। चौथी परिक्रमा के दौरान उन्होने चन्द्रमा पर पृथ्वी का उदय का नजारा देखा। उन्होने इस दृश्य की कालीसफेद और रंगीन तस्वीर दोनो खिंची। ध्यान दिया जाये की चन्द्रमा अपनी धूरी पर परिक्रमा और पृथ्वी की परिक्रमा मे समान समय लेता है जिससे उसकी सतह पर पृथ्वी का उदय नही देखा जा सकता और साथ ही पृथ्वी से चन्द्रमा के एक ही ओर का गोलार्ध देखा जा सकता है।
नवीं परिक्रमा के दौरान एक सीधा प्रसारण और किया गया। इसके पहले दो परिक्रमा के दौरान बोरमैन अकेला जागता रहा था बाकि दोनो यात्रीयो को उसने सोने भेज दिया था।
अब उनके बाद पृथ्वी वापसी की तैयारी (Tran Earth Injection TEI) बाकी थी। जो टीवी प्रसारण के २.५ घंटे बाद होना था। यह पूरी ऊडान का सबसे ज्यादा महत्वपुर्ण प्रज्वलन था। यदि SPS इंजन नही प्रज्वलीत हो पाता तो वे चन्द्रकक्षा मे फंसे रह जाते, उनके पास ५ दिन की आक्सीजन बची थी और बचाव का कोई साधन नही था। यह प्रज्वलन भी चन्द्रमा की पॄथ्वी से विपरीत दिशा मे रहकर भूनियंत्रण कक्ष से नियंत्रण सपंर्क ना रहने पर करना था।

लेकिन सब कुछ ठीकठाक रहा। यान प्रक्षेपण के ८९ घंटे १८ मिनिट और ३९ सेकंड बाद पृथ्वी की ओर दिखायी दिया। पृथ्वी से संपर्क बनने के बाद लावेल ने संदेश भेजा

” सभी को सुचना दी जाती है कि वहां एक सांता क्लाज है”

। भूनियंत्रण कक्ष से केन मैटींगली ने उत्तर दिया

” आप सही है, आप ज्यादा अच्छे से जानते है”।

यह दिन था क्रिसमस का।

वापसी की यात्रा मे एक समस्या आ गयी थी। गलती से कम्प्युटर से कुछ आंकडे नष्ट हो गये थे, जिससे यान अपने पथ से भटक गया था। अब यात्रीयो ने कम्प्युटर मे आंकडे फीर से डाले जिससे यान अपने सही पथ पर आ गया। कुछ इसी तरह का काम लावेल ने १६ महिन बाद इससे गंभीर परिस्थितीयो मे अपोलो १३ अभियान के दौरान किया था।
वापसी की यात्रा आसान थी, यात्री आराम करते रहे। यान TEI के ५४ घंटो के बाद पृथ्वी के वातावरण मे आकर प्रशांत महासागर मे आ गीरा।

यार्कटाउन के डेक पर अपोलो ८

यार्कटाउन के डेक पर अपोलो ८


वापसी की यात्रा मे पृथ्वी के वातावरण के बाहर इंजन अलग हो गया। यात्री अपनी जगह पर बैठे रहे। छह मिनिट पश्चात उन्होने वातावरण की सतह को छुआ, उसी समय उन्होने चंद्रोदय भी देखा। वातावरण के स्पर्श पर उन्होने यान की सतह पर प्लाज्मा बनते देखा। यान के उतरने की गति कम हो कर ५९ मी/सेकंड हो गयी थी। ९ किमी की उंचाई पर पैराशुट खुला, इसके बाद हर ३ किमी पर एक और पैराशुट खुलते रहा। पानी मे गिरने के ४३ मिनिट बाद इसे USS यार्कटाउअन जहाज ने उठा लिया था।

टाईम मैगजीन ने अपोलो ८ के यात्रीयो १९६८ के वर्ष के पुरुष (Men of the year) खिताब से नवाजा था। एक प्रशंसक द्वारा बारमन को भेजे गये टेलीग्राम मे लिखा था

अपोलो ८ धन्यवाद। तुमने १९६८ को बचा लिया।

अपोलो ७ : मानव सहित प्रथम अपोलो उड़ान

In चन्द्र अभियान on फ़रवरी 10, 2007 at 1:01 पूर्वाह्न

अपोलो ७ यह अपोलो कार्यक्रम का प्रथम मानव अभियान था। यह ग्यारह दिन पृथ्वी की कक्षा मे रहने वाला था, साथ ही सैटर्न 1B की प्रथम मानव सहित उडान थी। पहली बार तीन अमरीकी यात्री अंतरिक्ष मे जा रहे थे।

अपोलो ७

अपोलो ७


इस यात्रा के अंतरिक्ष यात्री

  • वैली स्कीरा (Wally Schirra) -कमाण्डर (commander)। इसके पहले तीन अंतरिक्ष यात्रा का अनुभव था।
  • डान ऐसेले(Donn Eisele)– मुख्य नियंत्रण यान चालक (command module pilo)। एक अंतरिक्ष यात्रा का अनुभव।
  • वाल्टर कनींगम(Walter Cunningham)– चन्द्रयान चाल(lunar module pilot)। एक अंतरिक्ष यात्रा का अनुभव।

यह दल दुर्भाग्यशाली अपोलो १ अभियान यात्रीदल का वैकल्पिक(backup) दल था।

ऐसेले,स्कीरा,कनींगम

ऐसेले,स्कीरा,कनींगम


उडान
अपोलो ७ की उडान उत्साहवर्धक थी। जनवरी १९६७ के अपोलो १ लांच पैड दुर्घटना के बाद नियंत्रण यान(Command Module) की अभिकल्पना(Design) दूबारा की गयी थी। स्कीरा जिन्हे मर्क्युरी और जेमीनी अंतरिक्ष अभियान का अनुभव था को इस अभियान का नेत्व दिया गया। यह यान चन्द्रयान(Lunar Module) नही ले जा रहा था इसलिये बडे सैटर्न V राकेट की बजाय सैटर्न 1B राकेट का उपयोग किया गया। स्कीरा इस अभियान को अपोलो १ के यात्रीयों की याद मे फिनीक्स नाम देना चाहते थे। फिनिक्स वह मिथक पक्षी है जो अपनी राख से भी उठ खडा होता है। इस अभियान की शुरुवात अपोलो १ के राख होने से हुयी थी। लेकिन इसे नकार दिया गया।

अपोलो की उडान


अपोलो ७ के सभी उपकरणो और अभियान के सभी कार्य बिना किसी बडी बाधा के सफल रहे थे। इस अभियान का मुख्य इंजन (SPS-Service Propulsion System) जो यान को चन्द्र कक्षा मे और वापिस  पहुंचाने वाला था, सफलतापुर्वक ८ बार जाण्च के लिये दागा जा चुका था।

अपोलो का यात्री कक्ष जेमीनी के यात्री कक्ष से बडा था लेकिन कक्षा मे ११ दिन के लिये काफी नही था। ११ अक्टूबर १९६८ को अपोलो ७ को प्रक्षेपित किया गया। इस अभियान के दौरान खाना खराब हो गया और तीनो यात्रीयो को सर्दी हो गयी थी। इसके कारण कमांडर स्कीरा चीडचीडे से हो गये थे। तीनो यात्रीयो ने मुख्य नियंत्रण कक्ष से वापसी की बाते शुरू कर दी थी। इस सबके फलस्वरूप अपोलो के अगले अभियानो मे इन तीनो मे से किसी को भी नही चुना गया। लेकिन इस सब के बावजूद यह अभियान सफल रहा।

अपोलो के SIVB राकेट के अलग होने का दृश्य

अपोलो के SIVB राकेट के अलग होने का दृश्य


उपर दी गयी तस्वीर ११ अक्टूबर १९६८ को अपोलो ७ से ली गयी थी।

इस अभियान के उद्देश्यो मे टीवी पर सीधा प्रसारण और चन्द्रयान की डाकींग की जांच था। यह दोनो उद्देश्य सफल रहे !
अपोलो ७ लवफिल्ड डलास टेक्सास प्रदर्शनी मे रखा हुआ है।

अपोलो ६: असफलताओ के झटके

In चन्द्र अभियान on फ़रवरी 9, 2007 at 1:07 पूर्वाह्न

अपोलो ६ यह अपोलो चन्द्र अभियान की सैटर्न -V राकेट की दूसरी और अंतिम मानवरहित उडान थी।

अपोलो ६ से ली गयी तस्वीर

अपोलो ६ से ली गयी तस्वीर

उद्देश्य

इस अभियान का उद्देश्य मानव सहित अपोलो उडान(अपोलो ८) के पहले सैटर्न V राकेट की अंतिम जांच उडान था। दूसरा उद्देश्य नियत्रंण यान का पृथ्वी वातावरण मे अत्यंत कठीन परिस्थितीयो मे पुनःप्रवेश की जांच था। दूसरा उद्देश्य J2 इंजन की असफलता के कारण असफल रहा था।
निर्माण
प्रथम चरण का इंजन S-IC १३ मार्च १९६७ को निर्माण कक्ष मे लाया गया, चार दिन बाद उसे खडा किया गया। उसी दिन तीसरे चरण का इंजन S-IVB और नियंत्रण संगणक भी निर्माण कक्ष मे लाये गये। दूसरे चरण का इंजन SII अपनी योजना से दो महीने पिछे था इसलिये जांच के लिये उसकी जगह एक डमरू आकार का एक नकली इंजन लगाया गया। अब राकेट की उंचाई SII इंजन लगाने के बाद की उंचाई के बराबर ही थी। २० मई को SII लाया गया और ७ जुलाई को राकेट तैयार हो गया।

जांच की गति धीमी चल रही थी क्योंकि अपोलो ४ के चन्द्रयान की जांच अभी बाकि थी। निर्माण कक्ष मे ४ सैटर्न V बनाये जा सकते थे लेकिन जांच सिर्फ एक की कर सकते थे। मुख्य नियंत्रण और सेवा कक्ष २९ सितंबर को लाया गया और राकेट मे १० दिसंबर को जोडा गया। यह एक नया कक्ष था क्योंकि असली कक्ष अपोलो १ की आग मे जल गया था। दो महिने की जांच और मरम्मत के बाद राकेट लांच पैड पर ६ फरवरी १९६८ को खडा कर दिया गया।

अपोलो ६ की उडान

अपोलो ६ की उडान


उडान

अपोलो ४ की समस्यारहित उडान के विपरित अपोलो ६ की उडान मे शुरुवात से ही समस्याये आना शुरू हो गयी थी। ४ अप्रैल १९६८ को उडान के ठीक २ मिनट बाद राकेट ने पोगो दोलन(oscillation) के तिव्र झटके ३० सेकंड के लिये महसूस किये। इस पोगो के कारण नियंत्रण कक्ष और चन्द्रयान के माडल की संरचना मे परेशानीयां आ गयी। यान मे लगे कैमरो ने अनेक टुकडे गीरते हुये रिकार्ड किये।
पहले चरण के इंजन के यान से विच्छेदित होने के बाद दूसरे चरण SII के के इंजनो ने नयी समस्या खडी कर दी। इजंन क्रमांक २(दूसरे चरण SII मे कुल पांच इंजन थे) ने प्रक्षेपण के २०६ सेकंड से ३१९ सेकंड तक अपनी क्षमता से कम कार्य किया और ४१२ सेकंड के बाद बंद हो गया। दो सेकंड पश्चात इंजन क्रमांक ३ बंद हो गया। मुख्य नियंत्रण कम्प्युटर किसी तरह इस समस्याओ से जुझने मे सफल रहा और बाकि इंजनो को सामान्य से ५८ सेकंड ज्यादा जला कर निर्धारित उंचाई पर ले आया। इसी तरह तीसरे चरण SIVB को भी सामान्य से २९ सेकंड ज्यादा जलाना पडा।

इन समस्याओ के कारण SIVB और नियंत्रण कक्ष १६० किमी की वृत्ताकार कक्षा की बजाय १७८x३६७ किमी की दिर्घवृत्ताकार कक्षा मे थे। पृथ्वी की दो परिक्रमा के बाद SIVB क पुनःज्वलन नही हो पाया, जिससे चन्द्रयान को चन्द्रमा की ओर दागे जाने की स्थिति वाले इंजन ज्वलन की जांच नही हो पायी।

इस समस्या के कारण यह निश्चित किया गया कि अब नियंत्रण कक्ष के राकेट के इंजन को दागा जाये जिससे अभियान के उद्देश्य पूरे हो सके। यह इंजन ४४२ सेकंड तक जला जो सामान्य से ज्यादा था। अब यान २२,००० किमी की कक्षा मे पहुंच गया था। अब यान के वापिस आने के लिये पर्याप्त इंधन नही था इसलिये वह ११,२७० मी/सेकंड की बजाये १०,००० मी/सेकंड की गति से वापिस आया। यह निर्धारित स्थल से ८० किमी दूर जमिन पर आया।

समस्याये और उनके निदान

पोगो की समस्या पहले से ज्ञात थी, इसका हल खाली जगहो पर हिलीयम भर यान के कंपन को रोका गया। SII के दो इंजनो की असफलता का कारण इण्धन की नलीयो का दबाव मे फट जाना थ। ये समस्या इंजन ३ मे थी इसलिये इंजन ३ बंद करने का संदेश भेजा गया। लेकिन इण्जन २ और ३ के वायर उल्टे जुडे होने से इंजन २ को यह संदेश मिला और इण्जन ३ की बजाये २ बंद हो गया। इंजन २ के बंद होने से दबाव सुचक ने इंजन ३ को भी बंद कर दिया।
SIVB की अभिकल्पना SII पर आधीरित थी, सारी समस्याये वहां भी थी। इसी वजह से SIVB का पुनः ज्वलन नही हो पाया।

अपोलो के अगले अभियानो मे इन समस्याओ को दूर किया गया।

यह अभियान इसलिये भी जाना जाता है कि इसी दिन मार्टिन लूथर किंग जुनियर की हत्या कर दी गयी थी।

अपोलो ५- चन्द्रयान की उडान

In चन्द्र अभियान on फ़रवरी 8, 2007 at 1:26 पूर्वाह्न

अपोलो ५ यह चन्द्रयान (Lunar Module- जो भविष्य मे चन्द्रयात्रीयो को ले जाने वाला था) कि पहली मानव रहित उडान थी। इस उडान की खासीयत यह थी कि इसमे आरोह और अवरोह के लिये अलग अलग चरण लगे हुये थे और ये चरण यान से अलग हो सकते थे। अवरोह चरण का इंजन अवकाश मे दागा जाने वाला पहला इंजन बनने जा रहा था।

इस अभियान का एक उद्देश्य “फायर इन द होल” नामक जांच थी। इस जांच मे आरोह इंजन को अवरोह इंजन के लगे होने पर भी दागा जाना था।

निर्माण स्थल पर चन्द्रयान

निर्माण स्थल पर चन्द्रयान

अपोलो ४ की तरह इस उडान मे देरी हो रही थी। इसका मुख्य कारण चन्द्रयान के निर्माण मे हो रही देरी थी। दूसरा कारण अनुभव की कमी थी क्योंकि सब कुछ पहली बार हो रहा था। यान की अभिकल्पना पूरी हो गयी थी लेकिन इंजन ठिक तरह से कार्य नही कर रहे थे। अवरोह इंजन ठीक से जल नही रहा था वहीं आरोह इंजन मे निर्माण और वेल्डींग की समस्या थी।

यान के प्रक्षेपण की योजना अप्रैल १९६७ थी। लेकिन चन्द्रयान का निर्माण ही  जून १९६७ मे पुर्ण हो पाया। चार महीनो की जांच और मरम्मत के बाद नवंबर के अंतिम सप्ताह मे चन्द्रयान को राकेट से जोडा गया।

१७ दिसंबर चन्द्रयान एक जांच मे असफल रहा। चन्द्रयान की खिडकी दबाव के कारण टूट गयी, ये खिडकी अक्रेलीक कांच से बनी थी। बाद मे इस खिडकी को अल्युमिनीयम से बनाया गया।

अपोलो ५ की उडान मे सैटर्न IB राकेट का प्रयोग किया गया जो कि सैटर्न ५ से छोटा था लेकिन अपोलो यान को पृथ्वी की कक्षा मे स्थापित करने की क्षमता रखता था। इसमे वही राकेट उपयोग मे लाया गया जिसे अपोलो १ की उडान मे उपयोग मे लाया जाना था। यह राकेट दुर्घट्ना मे बच गया था।

समय बचाने के लिये चन्द्रयान मे पैर नही लगाये गये। खिडकी मे अल्युमिनियम की चादर लगा दी गयी। यान मे यात्रीयो के नही जाने के कारण से उडान बचाव राकेट नही लगाया गया। इन सभी कारणो से राकेट सिर्फ ५५ मिटर उंचा था।

लांचपैड पर अपोलो ५

लांचपैड पर अपोलो ५

२२ जनवरी १९६८ को अपनी योजना से ८ महिने की देरी से अपोलो ५ को सूर्यास्त से ठीक पहले प्रक्षेपित कर दिया गया। सैटर्न IB ने सही तरीके से कार्य किया और दूसरे चरण के इण्जन ने चन्द्रयान को १६३x २२२ किमी की कक्षा मे स्थापित कर दिया। ४५ मिनिट बाद चन्द्रयान अलग हो गया। पृथ्वी की कक्षा मे दो परिक्रमा के बाद ३९ सेकंड के लिये योजना मुताबिक अवरोह इंजन दागा गया। लेकिन इसे यान के मार्गदर्शक कम्युटर ने ४ सेकंड बाद ही रोक दिया गया क्योंकि उसने पाया कि इंजन आवश्यकता अनुसार प्रणोद(Thrust) उतपन्न नही कर पा रहा है। यह एक साफ्टवेयर मे रह गयी एक गलती के कारण हुआ था, जिसके कारण आवश्यक दबाव नही बन रहा था।

भूनियंत्रण कक्ष ने एक पर्यायी योजना पर काम करना शुरू किया। उन्होने यान के मार्गदर्शक कम्प्युटर को बंद कर और एक यान के एक आनबोर्ड कम्युटर पर स्वचालित क्रमिक प्रोग्राम को शुरू कर दिया। इस प्रोग्राम ने अवरोह इंजन को दो बार और दागा। इसके बाद उन्होने अन्य जरूरी “फायर इन द होल” जांच की जिसके लिये आरोह इंजन को एक बार और दागा।
यान की पृथ्वी की चार परिक्रमा होने के बाद अभियान समाप्त हो गया था। यान प्रशांत महासागर मे १२ फरवरी को गीर गया।

सफलता की पहली उडान

In चन्द्र अभियान on फ़रवरी 7, 2007 at 1:31 पूर्वाह्न

अपोलो ४ यह अपोलो अभियान का दूसरा यान था। यह सैटर्न ५ राकेट की पहली मानवरहित उडान थी। राकेट के दो चरण  S-IC और S-II की भी यह पहली उडान थी।
सैटर्न ५ यह मानव द्वारा बनाया गया सबसे बडा वाहन था। इसकी उडान के लिये एक नया लांचपैड लांच कांपलेक्स ३९ बनाया गया था।  चरण  S-IC और S-II की भी यह पहली उडान तो  थी ही , साथ मे S-IVB चरण को पहली बार अंतरिक्ष मे पृथ्वी की कक्षा मे दूबारा प्रज्वलित किया गया था। पहली बार इस यान ने पृथ्वी के यान मे उसी गति से पुनःप्रवेश किया था, जो गति से चन्द्रमा से लौटने पर अपेक्षित थी। इन सभी प्रथमो के कारण इस यान और राकेट पर ४,०९८ जांच उपकरण लगाये गये थे।

लांचपैड पर अपोलो ४

लांचपैड पर अपोलो ४

राकेट पर दो यान रखे थे. CSM-०१७(CSM Command and Service Module- नियंत्रण और कार्य भाग) उस यान का माडल था जो अंतरिक्ष यात्रीयो को चन्द्रमा तक ले जाने वाला था। यह सिर्फ ब्लाक १ अर्थात एक जांच यान था। ब्लाक -२ अर्थात वह यान जो मानव युक्त होने वाला था। लेकिन CSM-017 मे उन्नत उष्मारोधी टाइल लगायी गयी थी जो ब्लाक २ मे लगायी जानेवाली थी। LTA-10R  दूसरा यान इस राकेट पर था, यह यान चन्द्रमा पर उतरने वाला यान का एक माडल था।

२३ फरवरी १९६७ को इस यान के सभी पुर्जो को जोडकर तैयार कर दिया गया। लेकिन अपोलो १ दुर्घटना के बाद इस यान की पुनः जांच से  नियंत्रण और कार्य भाग मे १०४७ समस्याये पायी गयी।

अपोलो ४ का कलपुर्जा कक्ष

अपोलो ४ का कलपुर्जा कक्ष

२० जून को नियंत्रण और कार्य भाग की सभी समस्याओ को दूर कर दिया गया। २६ अगस्त को अपनी निर्धारीत तिथी से ६ महीने देर से इस यान को प्रक्षेपण के लिये लांच पैड पर खडा कर दिया गया।

दो महीनो की कडी जांच के बाद ६ नवंबर को राकेट मे इंधन भरना शुरु हुआ। इंधन मे द्रव आक्सीजन, द्रव हायड्रोजन और शुद्ध किया हुआ केरोसीन था।

३४० लाख न्युटन बल के धक्के के साथ केनेडी अंतरिक्ष केन्द्र को हिलाते हुये राकेट उड चला। विज्ञानीयो को आशंका थी कि प्रक्षेपण के समय राकेट मे विस्फोट हो सकता था है इसलिये लांचपैड निर्माण केन्द्र से ४ मील की दूरी पर बनाया गया था। लेकिन प्रक्षेपण के धक्के से ही निर्माण कक्ष की छतो मे दरारे आ गयी और कुछ जगह की छत गीर भी गयी।

सफलता की उड़ान

सफलता की उड़ान

सफलता की उडान

उडान सफल रही और सैटर्न राकेट ने S-IVB और CSM को १८५ किमी की कक्षा मे स्थापित कर दिया। पृथ्वी की दो परिक्रमा के बाद S-IVB को दूबारा दागा गया और उसे १७,००० किमी की दिर्घ वृताकार कक्षा मे स्थापित कर दिया गया। इसके बाद CSM को दागा गया और कक्षा १८,००० किमी पर स्थापित हो गयी। अंत मे एक बार और इसे दागकर इसे ४०,००० किमी प्रति घंटा की गति से पृथ्वी के वातावरण मे लाया गया।

यान निर्धारित स्थल से १६ किमी दूरी पर उतरा लेकिन अभियान सफल था।

इस यान की उडान का विडीयो स्टार ट्रेक के एक एपीसोड(Assignment: Earth) मे दिखाया गया है। यह यान आज भी केनेडी अंतरिक्ष केन्द्र मे रखा हुआ है।

अपोलो १ : एक दुर्घटना

In चन्द्र अभियान on फ़रवरी 6, 2007 at 1:50 पूर्वाह्न

चन्द्रमा और पृथ्वी

चन्द्रमा और पृथ्वी

चन्द्रमा यह मानव मन को सदीयो से ललचाता रहा है। कवियो ने इस चन्द्रमा के लिये क्या क्या नही लिखा। विज्ञानीयो के लिये भी चन्द्रमा एक कुतुहल का विषय रहा। जब मानव पृथ्वी की  सीमा को लांघ का ब्रम्हांड की गहराईयो मे गोते लगाने निकला , तब चन्द्रमा उसका पहला पडाव था। अपोलो चन्द्र अभियान इस यात्रा का पहला कदम !

शहीद अंतरीक्ष योद्धा : गस इवान ग्रासीम, एडवर्ड एच व्हाईट द्वीतिय और रोजर बी कैफ़ी("Gus" Ivan Grissom, Edward H. White II and Roger B. Chaffee)

शहीद अंतरीक्ष योद्धा : गस इवान ग्रासीम, एडवर्ड एच व्हाईट द्वीतिय और रोजर बी कैफ़ी("Gus" Ivan Grissom, Edward H. White II and Roger B. Chaffee)

 


ए एस २०४ यह नाम था उस यान का जो अपोलो १ कैपसूल को पृथ्वी की कक्षा मे स्थापित करने वाला था। यह सैटर्न १बी(Satirn 1B) राकेट से प्रक्षेपित होने वाला अमरीका का पहला अपोलो अभियान था, जो कि चन्द्रमा पर मानव के पहले कदम के लिये एक मील का पत्थर साबीत होने वाला था। इसे १९६७ की पहली तिमाही मे प्रक्षेपित किया जाना था। इस अभियान का लक्ष्य था, प्रक्षेपण प्रक्रिया  की जांच, भूमीकेन्द्र द्वारा यान नियंत्रण और मार्गदर्शण की जांच था।

अपोलो १

अपोलो १

अपोलो १

जनवरी २७ सन १९६७ को कोई प्रक्षेपण की योजना नही थी। योजना थी कि एक छद्म(Simulated) प्रक्षेपण से यह जांच की जाये कि अपोलो यान अपनी अंदरूनी बिजली से सामान्य कार्य कर सकता है या नही। यदि यान इस जांच मे सफल हो जाये और अगली सभी जांच मे सफल हो तो २१ फरवरी १९६७ को इस यान को प्रक्षेपित किया जाना तय था।

अपोलो १ की सफलता के बाद इस यान की दो और उडाने तय थी। पहली उडान मे अपोलो के दूसरे भाग और चन्द्रयान को सैटर्न १ बी पर प्रक्षेपीत कर पृथ्वी की निचली कक्षा मे स्थापित किया जाना था। दूसरी उडान मे सैटर्न ५ पर अपोलो और चन्द्रयान दोनो को पृथ्वी की उपरी कक्षा मे स्थापित करना था।

२७ जनवरी १९६७ को यह जांच की जानी थी , जो कि पूरी नही हो सकी। तीनो अंतरीक्ष यात्री ग्रीसम, व्हाईट और कैफी अंतरीक्ष सूट पहन कर यान के अंदर पहुंचे। १.०० बजे दोपहर वे अपनी सीट बेल्ट बांधकर जांच के लिये तैयार हो गये। २.४५ मिनिट पर यान को सील कर दिया गया और यान की हवा को निकाल आक्सीजन भरी जाने लगी।

यान मे आक्सीजन का दबाव ज्यादा हो गया था और यात्रीयो और नियंत्रण कक्ष के बिच मे संपर्क टूट गया था। इस वजह से जांच को ५.४० मिनट तक स्थगित कर दिया गया। ६.२० तक उल्टी गिनती जारी थी लेकिन ६.३० को फिर से उल्टी गिनती रोक कर नियंत्रण कक्ष और यात्रीयो के बीच सपर्क स्थापित करने की कोशीश की गयी।

अपोलो १ यह अंतरिक्ष यात्रा के लिये बनाया जरूर गया था लेकिन इसका उद्देश्य चंद्रमा की यात्रा नही था इसलिये इसमे लैंड करने के लिये उपकरण नही थे। यान मे यात्री नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूट जाने की स्थिती मे की जाने वाली स्थिती मे होने वाली क्रियाओ की जरूरी जांच मे लगे थे। ६.३१ मिनट पर नियंत्रण कक्ष को एक सही तरह से काम कर रही COM लींक से कैफी की आवाज मे एक संदेश मिला की काकपिट मे आग लगी है। कुछ सेकंड बाद एक तेज चीख के साथ संपर्क पूरी तरह टूट गया। टीवी के मानीटर पर व्हाइट को यान का द्वार खोलने की कोशीश करते देखा गया। यान इस तरह से बना था कि द्वार अंदर की ओर खुलता था लेकिन्न आक्सीजन का दबाव बाहर की ओर होने से उसे खोलने नही दे रहा था। इससे ज्यादा बूरी बात यह थी कि दरवाजे को खोलने के लिये यात्रीयो को कई बोल्ट खोलने थे। आक्सीजन का दबाव बडते जा रहा था। कुछ देर मे वह इतना हो गया कि दरवाजा खोलना असंभव हो गया था।

आक्सीजन की वजह से आग तेजी से फैली और पल भर मे सब कुछ खत्म हो गया। यान बीना प्रक्षेपण के ही जलकर राख हो या। यह सिर्फ १७ सेकंड के बीच मे हो गया। तीनो यात्री शहीद हो गये !

आग इतनी भयावह थी की व्हाईट और ग्रीसम के सूट पिघल कर एक दूसरे से जुड गये थे। यात्रीयो को बाहर निकलने के लिये कम से कम पांच मिनट चाहीये थे और उन्हे मिले सिर्फ १७ सेकंड ! दूर्घटना के एक कारण मे यान का अंदर खुलने वाला द्वार था, जो कि यान बनाने वाली कंपनी नार्थ अमेरीकन एवीएशन की योजना के विपरीत था। कंपनी की अभीकल्पना (Design) मे आक्सीजन की जगह आक्सीजन और नायट्रोजन का मिश्रण था। कंपनी की अभीकल्पना मे दूर्घटना की स्थिती मे विस्फोट से खुलने वाले द्वार भी लगाने की योजन थी।  लेकिन नासा ने इन सभी सुझावो को नही माना था।

इसी तरह की एक दुर्घटना मे सोवियत अंतरिक्षयात्री वेलेण्टीन बोन्डारेन्को की मार्च १९६१ मे मृत्यु हो गयी थी।

इस दुर्घटना ने अपोलो अभियान को नये सीरे से अभिकल्पित करने मजबूर कर दिया। यान की अभिकल्पना मे काफी सारे बदलाव किये गये। इसके बावजूद अपोलो यान मे काफी सारी खामीया थी, जो कि अपोलो १३ तक जारी रही।

इन तीन शहीद यात्रीयो के नाम तीन तारो को दिये गये है ये तारे है नवी(Navi), ड्नोसेस(Dnoces) और रेगोर(Regor)। यह नाम इवान(ivan), सेकंड(Second) और रोजर (roger) को उल्टा लिखे जाने पर मिलते है। चन्द्रमा पर के तीन गढ्ढो के और मंगल पर तीन पहाडीयो के नाम भी इन शहीदो के नाम पर रखे गये है।

तीनो शहीद यात्रीयो को मेरी हार्दिक श्रद्धांजली !

एक नन्हा कदम

In चन्द्र अभियान on फ़रवरी 5, 2007 at 2:36 अपराह्न


२० जुलाई १९६९ एक मानव ने चंद्रमा पर अपना पहला कदम रखा। यह चित्र उसी ऐतिहासीक कदम का है। यह पदचिन्ह और चन्द्रमा पर पहुचने वाले प्रथम मानव का श्रेय नील आर्मस्ट्रांग को जाता है। यह अनुमान है की एक अरब लोगो ने आर्मस्ट्रांग के इस पहले कदम को देखा होगा। इस कदम का वीडीयो चन्द्रयान पर लगे एक कैमरे से सीधा प्रसारीत कीया गया था।
नील आर्मस्ट्रांग ने अपने इस कदम पर कहा था

“मानव का यह एक नन्हा कदम, मानवता की एक लम्बी छलांग है”।

अपोलो चन्द्र अभियान अब तक के सबसे कठीन तकनीकी अभियानो मे से एक है। अपोलो अभियान पर लेखो की श्रंखला मे यह पहला है।