अविश्वसनीय, अद्भुत और रोमाँचक: अंतरिक्ष

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अंतरिक्ष में अमरीका के प्रभुत्व का का अंत : अटलांटिस सकुशल वापिस

In अंतरिक्ष यान on जुलाई 22, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

अपने अंतिम अभियान एस टी एस 135 से अंटलांटीस अंतरिक्ष शटल की वापिसी

अपने अंतिम अभियान एस टी एस 135 से अंटलांटीस अंतरिक्ष शटल की वापिसी

अमरीकी अंतरिक्ष यान अटलांटिस अपनी अंतिम उड़ान एसटीएस 135 की समाप्ति पर 21 जुलाई 2011 को धरती पर फ्लोरिडा में कैनेडी स्पेस सेंटर में उतर गया है।

इसके साथ ही मानव के अंतरिक्ष अभियान में अमरीका के प्रभुत्व का एक दौर ख़त्म हो गया है क्योंकि इसके साथ ही अमरीकी अंतरिक्ष केंद्र नासा का तीस वर्षों का अंतरिक्ष कार्यक्रम ख़त्म हो गया है। इन तीस वर्षों में नासा ने अंतरिक्ष यानों अटलांटिस, चैलेंजर, कोलंबिया, डिस्कवरी और एंडेवर नाम के अंतरिक्ष यानों का एक बेड़ा तैयार किया।

ये दुनिया का पहला ऐसा अंतरिक्ष यानों का बेड़ा था जिसका बार बार उपयोग किया जा सकता था। ये अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष में जाने और आने के लिए, उपग्रहों की तैनाती के लिए और अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण और वहाँ बार बार जाने के लिए के लिए प्रयुक्त होते थे।

अटलांटिस अपने चार यात्रियों के साथ फ़्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर में 21 जुलाई 2011 गुरुवार को अमरीका में सूर्योदय से कुछ समय पहले उतरा।

यह अटलांटिस ने अंतरिक्ष स्टेशन की अपनी तेरहवीं यात्रा थी। अपने अंतिम उड़ान पर गए अटलांटिस ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में क़रीब चार टन की सामग्री पहुँचाई है, जिसमें बड़ी मात्रा में खाद्य सामग्री भी है। इसके बाद अटलांटिस को डिस्कवरी और एंडेवर की तरह सेवामुक्त कर दिया गया है, जबकि कोलंबिया और चैलेंजर दुर्घटना मे नष्ट हो चुके है। अटलांटिस को कैनेडी स्पेस सेंटर में दर्शकों के लिए रख दिया जाएगा।

ये यान वहाँ जिन आँकड़ों के साथ ख़डा होगा उसमें 33 उड़ानें, अंतरिक्ष में 307 दिन, पृथ्वी की 4,848 परिक्रमा और कुल 20 करोड़, 26 लाख 73 हज़ार 974 किलोमीटर की यात्रा शामिल होगी।

अटलांटिस के पहिए का विमानतल पर रुकना एक भावुक क्षण है। इसके साथ अमरीका का तीस वर्ष पुराना अंतरिक्ष अभियान ख़त्म हो रहा है तथा इन अंतरिक्ष यानों को संचालित करने के लिए रखे गए तीन हज़ार लोगों का भी काम कुछ ही दिनों के भीतर ख़त्म हो जाएगा। इसमें कम से कम दो वर्षों का समय लगेगा जब अंतरिक्ष कार्यक्रमों से जुड़ी सारी गतिविधियाँ ख़त्म की जाएँगी और बरसों में जुटाए गए अंतरिक्ष इंजीनियरिंग के आँकड़ों को संरक्षित किया जायेगा।

इसके साथ ही अमरीका के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक ऐसा शून्य पैदा हो जाएगा जो कम से कम तीन या चार वर्षों तक तो नहीं भरा जा सकेगा। अटलांटिस की वापसी के बाद अमरीका को अंतरिक्ष स्टेशन तक जाने के लिए रूस के सोयूज़ यानों पर निर्भर करना पड़ेगा। अमरीका रूस पर तब तक निर्भर रहेगा जब तक अमरीकी निजी कंपनियाँ नए अंतरिक्ष यानों का निर्माण नहीं कर लेतीं। यह एक संयोग है कि रूस ने अमरीकी अंतरिक्ष शटल के जैसे यान बुरान पर कार्य प्रारंभ किया था लेकिन सोवियत संघ के ढहने के बाद इसे रद्द कर दिया गया था और अपने सोयूज यानो को जारी रखा था। अमरीकी अंतरिक्ष शटलो के अध्याय के पश्चात आज दोनो अंतरिक्ष महाशक्ति सोयूज पर निर्भर है।

पीएसएलवी सी 17: तीन महिला वैज्ञानिको के हाथ जीसैट 12 की कमान

In अंतरिक्ष यान on जुलाई 19, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

पी एस एल वी सी 17 का श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण

पी एस एल वी सी 17 का श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण

दिनांक 15 जुलाई 2011 भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने पीएसएलवी सी-17(Polar Satelite Launch Vehical-PSLV C17) के ज़रिए संचार उपग्रह जीसैट-12(GSAT-12) को अंतरिक्ष में स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है।

इसरो के श्रीहरिकोटा रेंज से उपग्रह को प्रक्षेपित किया गया और पूरी प्रक्रिया बिना किसी रुकावट के पूरी हुई।

जीसैट-12 में 12 सी-ट्रांसपांडर्स हैं जो टेलीमेडिसिन और टेलीफोन सेवाओं के लिए इस्तेमाल किए जा सकेंगे। जीसैट-12 संचार सेटेलाइट का वज़न 1410 किलोग्राम है।

संचार उपग्रह जीसैट-12 की सभी प्रणालियां सामान्य ढंग से काम कर रही है। उपग्रह का सौर पैनल पहले से ही तैनात है। उपग्रह जीसैट-12 को अगले कुछ दिनों में भू-स्थिर कक्षा में स्थापित किए जाने की उम्मीद है। इस उपग्रह के आठ साल तक सक्रिय रहने की संभावना है। १२ विस्तारित सी बैंड ट्रांसपोंडर के साथ यह उपग्रह शिक्षा, चिकित्सा और ग्रामीण संसाधन केन्द्रों की विभिन्न संचार सेवाओं के लिए इनसेट प्रणाली की क्षमता बढ़ाएगा।

श्रीहरिकोटा स्थित मिशन नियंत्रण केन्द्र में इसे छोड़े जाने के बाद वैज्ञानिक खुशी से झूम उठे। उपग्रह छोड़े जाने के करीब एक हजार दो सौ पच्चीस सैंकेड बाद जीसैट-12, प्रक्षेपण यान से अलग हो गया और पृथ्वी की कक्षा मे पहुंच गया। इसके कुछ मिनट बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन -इसरो के अध्यक्ष डॉक्टर राधाकृष्णन ने इसके सफलतापूर्वक छोड़े जाने की घोषणा की। उन्होंने बताया कि प्रक्षेपण यान ने उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर दिया है।

यह कहने में हमें बहुत प्रसन्नता हो रही है कि भारत का ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपणयान-पी एस एल वी सी-१७ मिशन सफल रहा है। प्रक्षेपणयान ने उपग्रह को बहुत ठीक तरीके से योजना के अनुसार सही स्थान पर पहुंचाया है।

जीसैट 12 उपग्रह प्रक्षेपण भारतीय अंतरिक्ष अभियान मे एक मील का पत्त्थर है, इस उपग्रह के कक्षा मे पहुंचने की जिम्मेदारी तीन महिला वैज्ञानिकों के हाथ मे है। इन वैज्ञानिको के नाम है प्रोजेक्ट डायरेक्टर टी के अनुराधा, अभियान डायरेक्टर प्रमोदा हेगड़े तथा आपरेशन डायरेक्टर के एस अनुराधा। उपग्रह के अपनी अंतिम कक्षा मे पहुंचने के लिए 4 से 6 सप्ताह लगेंगे,उसके बाद यह अभियान पूर्णतः सफल हो जायेगा।

आम तौर पर पीएसएलवी का इस्तेमाल रिमोट सेंसिंग उपग्रहों को लांच करने में किया जाता था जो क़रीब एक हज़ार किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थापित किया जाता है। ध्यान दें कि पीएसएलवी का अर्थ ही ध्रुविय उपग्रह प्रक्षेपण वाहन है। यह पहली बार है जब पीएसएलवी के ज़रिए किसी उपग्रह को जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑरबिट(भूस्थानिक कक्षा) में स्थापित किया जा रहा है। कहने का अर्थ ये है कि आम तौर पर जियोस्टेशनलरी ऑरबिट के लिए पहली बार इतने छोटे यान का उपयोग हो रहा है जिसके लिए मिशन में कई फेर बदल किए गए हैं।

पहले संचार उपग्रहों के लिए या तो जीएसएलवी का उपयोग होता था या फिर विदेशी राकेट की सेवाएँ ली जाती थीं। लेकिन जीएसएलवी-एफ़06 यान के ज़रिए पिछले साल किया गया उपग्रह प्रक्षेपण विफल हो गया था। इसरो के पास पर्याय कम थे, जीएसएलवी के भरोसेमंद होने तक इंतजार नही किया जा सकता था और विदेशी राकेट महंगे पड़ते है।

पीएसएलवी भारत का सबसे भरोसेमंद राकेट रहा है। भारत के चंद्रयान मिशन के लिए भी पीएसलवी का ही इस्तेमाल किया गया था। इस साल इसरो ने अप्रैल में पीएसएलवी सी-16 का श्रीहरिकोटा से सफ़ल प्रक्षेपण था। पीएसएलवी सी-16 अपने साथ रिसोर्ससैट-2, एक्ससैट और यूथसैट लेकर गया था।

इसरो के वैज्ञानिको को इस सफलता के लिए बधाई!

अटलांटिस अपनी अंतिम ऐतिहासिक उड़ान पर रवाना

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान on जुलाई 9, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

अटलांटिस ने केप केनेवरल अंतरिक्ष केंद्र से 33वीं बार उड़ान भरी

अमरीका का अंतरिक्ष यान अटलांटिस अपनी अंतिम यात्रा पर रवाना हो गया है।

ये पिछले 30 साल से जारी अमरीकी अंतरिक्ष यानों के अभियान में किसी यान की 135वीं और अंतिम उड़ान है।

अटलांटिस ने शुक्रवार 8 जुलाई 2011 स्थानीय समय के हिसाब से दिन के ठीक 11 बजकर 29 मिनट पर फ़्लोरिडा के केप केनेवरल स्थित केनेडी अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरी।

अटलांटिस से 12 दिन की यात्रा पर गए चार यात्री अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर साढ़े तीन टन वज़न के सामानों की आपूर्ति करेगा।

अटलांटिस की वापसी के साथ ही अमरीकी अंतरिक्ष यानों का अभियान पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और अटलांटिस को दो अन्य यानों – डिस्कवरी और एंडेवर – की तरह संग्रहालय में रख दिया जाएगा।

अमरीकी अंतरिक्ष यानों के अभियान की समाप्ति के बाद अंतरिक्ष यात्रा करनेवालों को रूसी अंतरिक्ष यानों पर निर्भर होना पड़ेगा।

साथ ही अमरीका अगली पीढ़ी के नए अंतरिक्ष यानों को विकसित करने की भी तैयारी कर रहा है।

अंतिम उड़ान

अटलांटिस की 33वीं और अंतिम उड़ान की उल्टी गिनती पूरी होने के कोई आधे मिनट पहले अचानक गिनती रोक दी गई। ऐसा यान के पथ में एक उपकरण के टुकड़े के हटा लिए जाने की पुष्टि करने के लिए किया गया। बाद में नियंत्रकों के संतुष्ट हो जाने के बाद उड़ान शुरू किए जाने की अनुमति दे दी गई।

अटलांटिस के उड़ान की तिथि पहले ही घोषित कर दी गई थी लेकिन इस पूरे सप्ताह ख़राब मौसम के कारण यान के समय पर उड़ान भर पाने को लेकर संदेह बना हुआ था।

अटलांटिस की अंतिम यात्रा का साक्षी बनने के लिए लाखों लोग अंतरिक्ष केंद्र के आस-पास जमा थे और उसके उड़ान भरते ही वहाँ जश्न का माहौल बन गया। हालाँकि अटलांटिस को उड़ते हुए बमुश्किल चंद सेकेंड ही देखा जा सका क्योंकि तेज़ गति से उड़ता अटलांटिस देखते-देखते बादलों को चीरकर नज़रों से ओझल हो गया।

अटलांटिस रविवार को निर्माणाधीन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर पहुँच जाएगा।

स्वतन्त्र विज्ञान के लिए यह एक बुरा समाचार है। स्वतन्त्र विज्ञान से मेरा तात्पर्य बिना की लाभ हानी की चिंता किये नयी खोजों, आविष्कारो के लिए कार्य करना। नासा एक सरकारी संस्थान है जो कि बिना किसी लाभ हानी की चिंता किये कार्य करता है लेकिन सरकारी संस्थानों की अन्य समस्याएँ जैसे लाल फीता शाही, अकुशल योजना प्रबंधन जैसी समस्याए यहाँ भी है। पिछले कुछ वर्षो से नासा राजनितिज्ञो में अलोकप्रिय होते जा रहा है , वह अपने बजट के अनुसार परिणाम नहीं दे पा रहा है । मंदी के इस दौर में नासा के बजट पर भी असर पड़ा है, उसकी कई महत्वाकांक्षी परियोजनाए रद्द की जा चुकी है। जिसमे प्रोजक्ट ओरीयान भी शामिल है । यह प्रोजेक्ट नयी पीढी के राकेट विकसीत करने का था जो अंतरिक्ष शटल का स्थान लेता ।

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहीये कि नासा जिस क्षेत्र में कार्य करता है, उस क्षेत्र में असफलता की संभावना ज्यादा होती है । इस क्षेत्र में 4 में से एक अभियान असफल होता है, नासा का कार्य प्रशंसनीय है। आशा है कि अमरीकी राजनेता राजनीती और सस्ती लोकप्रियता से दूर हट कर हथियारों के बजट में कमी करें और उसे नासा की और मोड़े। नासा ऐसे भी उन्हें अंतरिक्ष से जासूसी में मदद करता है।

अब इस क्षेत्र में अमरीका ने नीजी कम्पनीयों का दरवाजा खोल दिया है, इससे अंतरिक्ष पर्यटन सस्ता होगा। लेकिन नयी खोजो और आविष्कारो का रास्ता रूक जाएगा! निजी कंपनीयां अपनी योजनाएँ नयी खोज या आविष्कारो की जगह सिर्फ और सिर्फ अपने लाभ पर केंद्रित करेंगी! लाभ की इस होड़ मे मंगल पर मानव के अवतरण का सपना और कितने दशकों बाद पूरा होगा, कह पाना मुश्किल है। पता नही कि कोई और वायेजर अंतरिक्ष यात्रा के लिए जा पायेगा? वायेजर जैसे यानो से कोई तात्कालिक व्यावसायिक लाभ जो नही है!

नासा के वर्चस्व का अंत : अंतरिक्ष शटल अटलांटिस की अंतिम उड़ान

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान on जुलाई 6, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

अंटलांटीस अंतरिक्ष शटल अपने अंतिम उड़ान के लिए प्रक्षेपण स्थल की ओर जाता हुआ। पृष्ठभूमि मे दिख रही इमारत अंतरिक्ष शटल निर्माण केन्द्र है।

अंटलांटीस अंतरिक्ष शटल अपने अंतिम उड़ान के लिए प्रक्षेपण स्थल की ओर जाता हुआ। पृष्ठभूमि मे दिख रही इमारत अंतरिक्ष शटल निर्माण केन्द्र है।

अमरीकी अंतरिक्ष संगठन नासा के अंतरिक्ष यानों(स्पेस शटल) की अंतिम उड़ान के लिए अंतिम तैयारियाँ अपने चरम पर हैं और शुक्रवार 8 जुलाई 2011 को होने वाली इस उड़ान के चालक दल के सदस्य फ्लोरिडा पहुँच चुके हैं। ये उड़ान स्थानीय समय के अनुसार 11:26 (15:26 जीएमटी) बजे होगी जिसे देखने के लिए भारी भीड़ इकट्ठा हो रही है। अटलांटिस यान शुक्रवार को कैनेडी अंतरिक्ष केंद्र से छोड़ा जाएगा जिसके लिए तीन पुरुष और एक महिला अंतरिक्ष यात्री अंतिम तैयारियाँ कर रहे हैं।

इस अंतिम उड़ान में अटलांटिस यान पर साढ़े तीन टन भोज सामग्री भेजी जाएगी जो अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र में मौजूद वैज्ञानिकों को एक साल के लिए पर्याप्त होगी।

ये सामग्री भेजे जाने के बाद नासा को इस बात की ज़्यादा चिंता नहीं रहेगी कि निजी और व्यावसायिक कंपनियाँ अगर अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करने में कुछ मुश्किलें महसूस करती हैं तो अंतरिक्ष केंद्र में मौजूद अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

अटलांटिस में चार वैज्ञानिक सवार होंगे जिनमें कमांडर क्रिस फ़रग्यूसन, पायलट डॉ हरली और मिशन विशेषज्ञ सैंडी मैगनस और रेक्स वॉलहीम होंगे। ये वैज्ञानिक टैक्सस के ह्यूस्टन स्थित अपने प्रशिक्षण केंद्र से कैनेडी पहुँच चुके हैं।

आठ जुलाई 2011 को अंतरिक्ष के लिए 135वीं यान उड़ान होगी और अटलांटिस की ये 33वीं उड़ान होगी। इस उड़ान के बाद कुल 135 अंतरिक्ष मिशन पूरे हो जाएंगे जिनके लिए 355 लोगों ने 852 बार उड़ान भर ली होगी। पहला अंतरिक्ष यान 12 अप्रैल 1981 को उड़ा था। अंतरिक्ष कार्यक्रम के दौरान पृथ्वी की कक्षा का चक्कर लगाने वाले यानों ने कुल मिलाकर 864,401,200 किलोमीटर (537,114,016 मील) का सफ़र तय किया है जो तीन बार पृथ्वी से सूरज तक जाने और वापिस लौटने के बराबर है। अटलांटिस यान इस सफ़र में क़रीब 65 लाख किलोमीटर (40 लाख मील) और जोड़ देगा।

इस अंतिम दौर को शुरू करने वाला पहला स्पेस शटल यान डिस्कवरी था जिसने मार्च 2011 में अपनी अंतिम उड़ान भरी थी। उसके बाद एंडीवर को भी एक जून 2011 को अंतिम उड़ान के बाद संग्रहालय में रख दिया गया है।

इन उड़ानों के बाद सभी अंतरिक्ष यानों को संग्रहालय में पहुँचाया जा रहा है। अटलांटिस को अंतिम उड़ान के बाद कैनेडी अंतरिक्ष केंद्र के दर्शक परिसर में रखा जाएगा। नासा अब अपने अंतरिक्ष यानों(स्पेस शटल) को रिटायर कर रहा है ताकि निजी कंपनियाँ अब इस मैदान में अपनी सेवाएँ मुहैया करा सकें।

श्रोत: बीबीसी हिन्दी से साभार

अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र के साथ एन्डेवर

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान on जुलाई 5, 2011 at 6:21 पूर्वाह्न

अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र के साथ एन्डेवर(चित्र को पूर्ण रूप से देखने चित्र पर क्लीक करें)

अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र के साथ एन्डेवर(चित्र को पूर्ण रूप से देखने चित्र पर क्लीक करें)

अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र(International Space Station) के साथ अमरीकी स्पेश शटल एन्डेवर का चित्र। लेकिन यह चित्र लिया कैसे गया है ? अंतरिक्ष से ?

सामान्यतः अंतराष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र का चित्र स्पेश शटल से लिया जाता है। लेकिन इस चित्र मे अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र के साथ स्पेश शटल भी दिख रहा है। यह कैसे हुआ?

इसका उत्तर यह है कि जब एन्डेवर अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र से अपने अंतिम अभियान के तहत जुड़ा हुआ था उसी दिन एक रूसी अंतरिक्ष यान सोयुज टी एम ए 20 अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र से वापस पृथ्वी पर लौट रहा था। यह चित्र सोयुज यान से लिया गया है। सोयुज यान अगले दिन कजाकिस्तान मे उतर गया था। अमरीकी अंतरिक्ष शटल की अंतिम उड़ान जुलाई 2011 मे प्रस्तावित है उसके पश्चात अंतराष्ट्रीय केंद्र की यात्रा के लिए सोयुज यान का ही प्रयोग होगा।

अपने अंतिम अभियान से एन्डेवर की वापसी

In अंतरिक्ष यान on जून 2, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

अपने अंतिम अभियान से अमरीकी अंतरिक्ष शटल ’एन्डेवर’ की वापसी

अपने अंतिम अभियान से अमरीकी अंतरिक्ष शटल ’एन्डेवर’ की वापसी

कल रात 1 जून 2011, 06.35 UTC पर अमरीकी अंतरिक्ष यान एन्डेवर पृथ्वी पर केनेडी अंतरिक्ष केंद्र फ्लोरीडा मे सकुशल लौट आया। यह एन्डेवर का अंतिम अभियान था।

अपने अंतिम अभियान मे एन्डेवर ने 100 लाख किमी से ज्यादा की यात्रा की। यह अभियान 15 दिन, 17 घन्टे और 51 सेकंड तक जारी रहा। 1992 के अपने पहले अभियान से अब तक इस यान ने २५ उड़ाने की है। इस यान को चैलेन्जर यान की जगह बनाया गया था, जो एक दूर्घटना मे उड़ान स्थल पर ही नष्ट हो गया था। एन्डेवर ने ही 1993 मे हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला की पहली मरम्मत की थी।

एन्डेवर का नाम कैप्टन जेम्स कूक के जहाज के नाम पर रखा गया था। इस जहाज पर जेम्स कूक ने दक्षिणी प्रशांत महासागर मे 1769 मे शुक्र ग्रह का सूर्य पर दूर्लभ ग्रहण देखा था। उसे इन ग्रहण से सौर मंडल के आकार की गणना की आशा थी। एन्डेवर यान इसी परंपरा की एक कड़ी था।

मै एन्डेवर के पृथ्वी पर लौट आने पर उसका स्वागत नही कर पाउंगा क्योंकि अंतरिक्ष यान का घर पृथ्वी नही, अंतरिक्ष होता है।

अमरीकी अंतरिक्ष यान ‘एंडेवर’ की अंतिम उड़ान

In अंतरिक्ष यान on मई 17, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

अमरीकी अंतरिक्ष यान एंडेवर की अंतिम उड़ान

अमरीकी अंतरिक्ष यान एंडेवर की अंतिम उड़ान

अमरीकी अंतरिक्ष यान ‘एंडेवर‘ सोमवार 16 मई 2011 की सुबह फ़्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सैंटर से अपने अंतिम मिशन पर रवाना हो गया। ये यान ‘अल्फ़ा मैग्नेटिक स्पैक्टोमीटर(Alpha Magnetic Spectrometer)‘ नाम के  कण भौतिकी उपकरण(Particle Physics  experiment module) को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र में पहुंचाएगा।

इस अंतिम मिशन में ‘एंडेवर’ जो ‘अल्फ़ा मैग्नेटिक स्पेक्टोमीटर‘ ले गया है उसे तैयार करने में 17 साल लगे हैं। इस यंत्र को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र के ऊपर लगाया जाएगा जहां से वो ब्रह्मांडीय किरणों(Cosmic Rays) का व्यापक सर्वेक्षण करेगा। ये अत्यधिक ऊर्जा वाले कण हैं जो ब्रह्मांड के सभी कोनों से पृथ्वी की दिशा में तेज़ी से बढ़ते हैं। वैज्ञानिकों को आशा है कि इन कणो के गुणधर्मो का पता लगाने से इस तरह के प्रश्नो के उत्तर ढूंढने में मदद मिलेगी कि ये ब्रह्मांड कैसे अस्तित्व में आया और इसका निर्माण कैसे हुआ।

जब ‘एंडेवर‘ अपना मिशन पूरा करके लौटेगा तो अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के शटल बेड़े में केवल ‘एटलांटिस‘ बचेगा। ‘एटलांटिस‘ इस साल जुलाई में अपना अंतिम मिशन पूरा करेगा।

नासा के प्रशासक चार्ल्स बोल्डन ने एक बयान में कहा,

“एंडेवर की अंतिम उड़ान मानवीय अंतरिक्ष उड़ान में अमरीकी कौशल और नेतृत्व का प्रमाण है”।

तीस साल का शटल कार्यक्रम पूरा करने के बाद अमरीका अपने अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र पहुंचाने के लिए रूसी ‘सोयूज़‘ यानों का प्रयोग करेगा।

इस दशक के मध्य तक कई अमरीकी व्यावसायिक यान भी सेवा में आ जाएंगे। नासा इन यानों में अपने अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सीटें ख़रीदेगा।  जिसका मतलब ये हुआ कि नासा पृथ्वी की कक्षा का चक्कर लगाने के लिए जिन यानों का प्रयोग करेगा वो उसके नहीं होंगे। इस योजना से ये लाभ होगा कि नासा अपने संसाधनों का प्रयोग अंतरिक्ष प्रक्षेपण प्रणाली तैयार करने के लिए कर सकेगा जिससे आगे चलकर अंतरिक्षयात्री चंद्रमा, क्षुद्रग्रहों और मंगल ग्रह तक की यात्रा कर सकेंगे।

  • एंडेवर का निर्माण 1986 में ‘चैलेंजर‘ यान के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के बाद किया गया था। 
  • इसने अपनी पहली उड़ान 7 मई 1992 को की थी।
  •  ‘एंडेवर’ ने अंतरिक्ष में 280 दिन बिताकर पृथ्वी के कुल 4,429 चक्कर लगाए हैं।
  • इस अंतिम मिशन को पूरा कर लेने के बाद एंडेवर 16 करोड़ 60 लाख किलोमीटर की यात्रा पूरी कर लेगा।
  • अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र के निर्माण के पहले मिशन पर यही यान गया था और हबल दूरबीन की मरम्मत का भी पहला मिशन इसी ने पूरा किया था।

मानव की पहली अंतरिक्ष उड़ान के 50 वर्ष : 12 अप्रैल 1961-यूरी गागरीन

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान, अंतरिक्ष वाहन, वैज्ञानिक on अप्रैल 12, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

यूरी गागारिन: प्रथम अंतरिक्ष यात्री

यूरी गागारिन: प्रथम अंतरिक्ष यात्री

आज ही के दिन पचास वर्ष पहले बारह अप्रैल 1961 सोवियत संघ के यूरी गागारिन ने पृथ्वी का एक चक्कर लगाकर अंतरिक्ष में मानव उड़ान के युग की शुरुआत की थी। अंतरिक्ष में उन्होंने 108 मिनट की उड़ान भरी। जैसे ही रॉकेट छोड़ा गया गागारिन ने कहा, “पोयेख़ाली“, जिसका अर्थ होता है  “अब हम चले“।
ये एक मजेदार तथ्य है कि युरी को इस अभियान के लिए उन की कम उंचाई के कारण चुना गया था,कुल पाँच फ़ुट दो इंच के गागारिन अंतरिक्ष यान के कैपसूल में आसानी से फ़िट हो सकते थे।

उड़ान के बाद जब वो अंतरिक्ष में पहुँचे तो पृथ्वी का प्रभामंडल देखकर हतप्रभ थे। उन्होंने आश्चर्यचकित होते हुए कहा कि पृथ्वी की सतह पर पड़ने वाली बादलों की छाँव अदभुत दृश्य का निर्माण कर रही है।

अंतरिक्ष की इस पहली उड़ान के दौरान यूरी गागारिन का अपने यान पर कोई नियंत्रण नहीं था। लेकिन इस बात को लेकर भी चिंता थी कि अगर धरती से अंतरिक्ष यान का नियंत्रण नहीं सध पाया तो क्या होगा।इसके लिए यूरी गागारिन को एक मुहरबंद लिफ़ाफ़े में कुछ कोड दिए गए थे जिनके ज़रिए वो आपात स्थिति में यान को नियंत्रित कर सकते थे। लौटते वक़्त उनका यान लगभग बरबादी के कगार पर पहुँच गया था. लेकिन इसका पता बाद में लगा। गागारिन के कैप्सूल को दूसरे मॉड्यूल से जोड़ने वाले तार लौटते वक़्त ख़ुद से अलग नहीं हुए और पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते ही उनका कैपसूल आग की लपटों में घिर गया।गागारिन ने

बाद में उस घटना को याद करते हुए कहा, “मैं धरती की ओर बढ़ते हुए एक आग के गोले के भीतर था।

पूरे दस मिनट तक आग में घिरे रहने के बाद किसी तरह तार जले और उनका कैप्सूल अलग हुआ। धरती पर लौटने से पहले ही यूरी गागारिन एक मशहूर अंतरराष्ट्रीय शख़्सियत बन चुके थे।

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श्रोत : बीबीसी हिन्दी

एक युग का अंत: डिस्कवरी अपनी अंतिम उड़ान से वापिस

In अंतरिक्ष, अंतरिक्ष यान on मार्च 10, 2011 at 4:41 पूर्वाह्न

डिस्कवरी अंतरिक्ष यान अपनी अंतिम यात्रा से वापसी पर

डिस्कवरी अंतरिक्ष यान अपनी अंतिम यात्रा से वापसी पर

मार्च ९,२०११ बुधवार को ११.५७ सुबह (पूर्वी अमरीका स्थानीय समय) पर डिस्कवरी अंतरिक्ष यान अपनी अंतिम उड़ान से सकुशल पृथ्वी पर लैंड कर गया। यह चित्र इसी ऐतिहासिक क्षण का है। डिस्कवरी अंतरिक्ष यान ने हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला को कक्षा मे स्थापित किया था, दो बार उसकी मरम्मत की थी। इसी यान ने युलीसीस शोध यान का प्रक्षेपण किया था, यह यान मीर अंतरिक्ष केन्द्र से जुड़ने वाला अंतिम यान था, चैलेंजर और कोलंबीया दूर्घटना के बाद उड़ान भरने वाला यान डीस्कवरी ही था। इसी यान ने सर्वाधिक समय अंतरिक्ष मे बिताया था। कुल ३६५ दिन, पूरा एक वर्ष। एक अंतरिक्ष यान जिसने कुल २३८,०००,००० किमी की यात्रा की है। मानव निर्मित सबसे ज्यादा उपयोग किया गया अंतरिक्ष यान ! इस यान के चक्के अब हमेशा के लिये पृथ्वी पर थम गये है।

अपनी अंतिम उड़ान पर ‘डिस्कवरी’

In अंतरिक्ष यान on फ़रवरी 25, 2011 at 8:11 पूर्वाह्न

अपनी अंतिम उड़ान के लिये तैयार डिस्कवरी

अपनी अंतिम उड़ान के लिये तैयार डिस्कवरी

डिस्कवरी अपनी अंतिम उड़ान पर

डिस्कवरी अपनी अंतिम उड़ान पर

सितंबर १९८८ मे डिस्कवरी ने दोबारा उड़ान भरी थी, चैलेंजर दुर्घटना के बाद अंतरिक्ष शटल की यह पहली उड़ान थी। इस अवसर पर ‘विज्ञान प्रगति’ का एक अंतरिक्ष विशेषांक आया था। अंतरिक्ष और खगोलशास्त्र मे मेरी रूची इस उड़ान के बाद ही जागृत हुयी थी। इसके बाद विज्ञान प्रगति मे ही श्री देवेन्द्र मेवाड़ी की सौर मंडल पर एक लेख श्रंखला ने मेरी इस रूची को स्थायित्व दिया था।
आज डिस्कवरी अंतरिक्ष शटल अपनी अंतिम उड़ान भर चूका है, एक युग का अंत होने जा रहा है।

डिस्कवरी अंतरिक्ष शटल  का नाम कैप्टन जेम्स कूक की तीसरी और अंतिम यात्रा के ब्रिटिश जहाज एच एम एस डिस्कवरी पर रखा गया था। इस का निर्माण कार्य जनवरी १९७९ मे प्रारंभ हुआ था। इस यान की पहली उड़ान ३० अगस्त १९८४ मे हुयी थी।

डिस्कवरी अंतरिक्ष शटल ने ही हब्बल अंतरिक्ष दूरबीन को स्थापित किया था। इस दूरबीन की दूसरी और तीसरी मरम्मत का कार्य भी डिस्कवरी ने ही किया था। इस शटल ने युलीसीस उपग्रह और तीन टीडीआरएस उपग्रह को कक्षा मे स्थापित किया था। चैलेंजर(१९८६) और कोलबीया(२००३) शटल दूर्घटनाओं के बाद अंतरिक्ष मे लौटने वाला यान डिस्कवरी ही था। डिस्कवरी ने जोन ग्लेन को ७७ वर्ष की उम्र मे प्रोजेक्ट मर्क्युरी के अंतर्गत सर्वाधिक उम्र का अंतरिक्ष यात्री बनने का श्रेय दिया था।

डिस्कवरी अब तक ३८ उड़ान भर चूका है और अब अपनी अंतिम ३९ उड़ान मे है। यह यान २४ फवरी २०११ तक पृथ्वी की ५२४७ परिक्रमा कर चूका है, और अंतरिक्ष मे ३२२ दिन रह चूका है। किसी अन्य यान की तुलना मे इसने सबसे ज्यादा उड़ाने भरी है।