अविश्वसनीय, अद्भुत और रोमाँचक: अंतरिक्ष

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हृदय मे एक काला रहस्य समेटे खूबसूरत आकाशगंगायें

In अंतरिक्ष, आकाशगंगा, ब्रह्माण्ड on अप्रैल 17, 2012 at 7:00 पूर्वाह्न

ब्रह्माण्ड के सबसे खूबसूरत पिण्डो मे स्पायरल आकाशगंगायें है। उनका भव्य प्रभावशाली स्वरूप सैकंडो से लेकर हजारो प्रकाशवर्ष तक विस्तृत होता है, उनकी बाहें सैकड़ो अरब तारो से बनी होती है तथा एक दूधिया धारा बनाती है। लेकिन उनके केन्द्रो की एक अलग कहानी होती है।
आज प्रस्तुत है दो खूबसूरत आकाशगंगायें लेकिन अपने हृदय मे एक काला रहस्य समेटे हुये।

पहले NGC 4698 आकाशगंगा, यह चित्र माउंट लेमन अरिजोना की 0.8 मीटर व्यास के स्क्लमन दूरबीन से लिया गया है।

NGC 4698 (विस्तृत रूप से देखने चित्र पर क्लिक करें)

NGC 4698 (विस्तृत रूप से देखने चित्र पर क्लिक करें)

NGC 4698 आकाशगंगा हमारे काफी समीप है, लगभग 600 लाख प्रकाशवर्ष की दूरी पर। यह चित्र मनोहर है जिसमे आकाशगंगा की धूंधली बाह्य बाहें स्पष्ट रूप से दिखाती दे रही है, आंतरीक बाहें धूल के बादलों से इस तरह से ढंकी हुयी है जैसे किसी धागे मे काले मोती पीरोये हुये हों। इस आकाशगंगा का केन्द्र विचित्र है, यह अपेक्षा से ज्यादा दीप्तीवान है और ऐसा लग रहा है कि यह आकाशगंगा के प्रतल से बाहर आ जायेगा।

M77 (विस्तृत रूप से देखने चित्र पर क्लिक करें)

M77 (विस्तृत रूप से देखने चित्र पर क्लिक करें)

दूसरी स्पायरल आकाशगंगा सुप्रसिद्ध आकाशीय पिण्ड M77 है। M77 के प्रतल को हम NGC 4698 की तुलना मे ज्यादा अच्छे से देख पाते हैं। संयोग से यह आकाशगंगा भी लगभग 600 लाख प्रकाशवर्ष दूर है। इसकी बांहो मे दिख रहे लाल बिंदू नव तारो के जन्म का संकेत दे रहे है और वे नये तारो के जन्म से उष्ण होते हुये महाकाय गैस के बादल है। इसका केन्द्र भी NGC 4698 के केन्द्र के जैसे मोटा और विचित्र है। यह भी अपेक्षा से ज्यादा दीप्तीवान, ज्यादा संघनीत है। इस चित्र को ध्यान से देखने पर आप इसके केन्द्र के बायें एक हरी चमक देख सकते है जैसे कोई हरी सर्चलाईट हो।

प्रथम दृष्टी मे दोनो आकाशगंगाये सामान्य लगती है लेकिन यह स्पष्ट है कि इनमे कुछ ऐसा चल रहा है कि जो इन्हे अन्य आकाशगंगाओं से अलग बनाती है।

तारे सामान्यत: हर तरंगदैर्ध्य(wavelength) पर, हर रंग का प्रकाश उत्सर्जित करते है। इसे सतत वर्णक्रम कहा जाता है। किसी प्रिज्म के प्रयोग से इन सभी रंगो(तरंगदैर्ध्य) को अलग कर के देखा जा सकता है। लेकिन उष्ण गैस कुछ विशिष्ट रंग का उत्सर्जन करती है जिन्हे उत्सर्जन रेखा(emission lines) कहते है। इसका उदाहरण निआन बल्ब है, यदि आप निआन बल्ब से उत्सर्जित प्रकाश को प्रिज्म से देखेंगे तब आपको सभी रंग की बजाये कुछ ही रंगो की रेखाये दिखेंगी।

अंतरिक्ष के गैस के बादल भी ऐसे ही होते है। वे कुछ विशिष्ट तरंगदैर्ध्य वाले रंग के प्रकाश का उत्सर्जन करते है जो उस गैस के बादल के घटको पर निर्भर है। आक्सीजन के बादल से हरा, हायड्रोजन से लाल, सोडीयम से पीला रंग के प्रकाश का उत्सर्जन होता है। यह थोड़ा और जटिल है लेकिन यह इसका सरल रूप मे समझने के लिये पर्याप्त है। यदि आप स्पेक्ट्रोग्राफ उपकरण के प्रयोग से आकाशगंगा के प्रकाश को उसके घटक रंगो मे तोड़कर मापन करें तो आप उस आकाशगंगा की संरचना, घटक तत्व, तापमान तथा गति जान सकते है।

स्पेक्ट्रोग्राफ द्वारा M77 तथा NGC 4698 के प्रकाश की जांच से ज्ञात होता है कि इनके केन्द्रक द्वारा उतसर्जित प्रकाशवर्णक्रम सामान्य से काफी ज्यादा जटिल है तथा इसमे सरल वर्णक्रम ना होकर जटिल उत्सर्जन रेखायें है। इसका अर्थ यह है कि इसके केन्द्र मे ढेर सारी गर्म गैस के बादल है। यह विचित्र है लेकिन एक और विचित्र तथ्य है कि किसी आकाशगंगा के केन्द्र मे ऐसा क्या हो सकता है जो इस विशाल सैकड़ो प्रकाश वर्ष चौड़े गैस के बादल को इतना ज्यादा गर्म कर सके ?

आपका अनुमान सही है, यह कार्य किसी दानवाकार महाकाय श्याम विवर द्वारा ही संभव है। हम जानते है कि सभी आकाशगंगाओं के केन्द्र मे महाकाय श्याम विवर होता है। लेकिन इन आकाशगंगाओं का केन्द्रीय श्याम विवर सक्रिय रूप से अपने आसपास के गैस बादल को निगल रहा है। इन श्याम विवरो मे पदार्थ जा रहा है लेकिन उसके पहले वह इनके आसपास एक विशालकाय तश्तरी के रूप मे जमा हो रहा है। यह तश्तरी उष्ण हो कर प्रकाश का उत्सर्जन प्रारंभ कर देती है। यह प्रकाश आकाशगंगा के अन्य गैस बादलो द्वारा अवशोषित होकर उन्हे भी उष्ण करता है और वे भी चमकना प्रारंभ कर देती है। इस कारण से हमे इन दोनो आकाशगंगाओं का केन्द्रक ज्यादा दीप्तीवान दिख रहा है।

इस तरह की आकाशगंगाओं को सक्रिय आकाशगंगा कहा जाता है। हमारी आकाशगंगा के केन्द्र का श्याम विवर वर्तमान मे सक्रिय नही है अर्थात गैसो को निगल नही रहा है। यह सामान्य है लेकिन सक्रिय आकाशगंगाओं की संख्या भी अच्छी मात्रा मे है और इतनी दीप्तीवान होती है कि उन्हे लाखों प्रकाश वर्ष दूरी से भी देखा जा सकता है।

आप समझ गये होंगे कि इन सामान्य सी दिखने वाली मनोहर आकाशगंगाओं के हृदय मे छुपे काले रहस्य का तात्पर्य!

ब्रह्माण्ड, हमारी आकाशगंगा, विशालकाय, महाकाय… जब शब्द कम पड़ जाये…

In अंतरिक्ष, आकाशगंगा, निहारीका, ब्रह्माण्ड on अप्रैल 5, 2012 at 7:00 पूर्वाह्न

हमारा ब्रह्माण्ड इतना विशाल है कि उसके वर्णन के लिये मेरे पास शब्द कम पड़ जाते है। इतना विशाल, महाकाय कि शब्द लघु से लघुतम होते जाते है।

सर्वेक्षण का एक क्षेत्र

सर्वेक्षण का एक क्षेत्र

खगोल वैज्ञानिकों ने चीली के VISTA दूरबीन तथा हवाई द्विप की UKIRT दूरबीन के प्रयोग से संपूर्ण आकाश का अवरक्त किरणो मे एक असाधारण अविश्वसनीय रूप से विस्तृत मानचित्र बनाया है। यह मानचित्र हमे हमारी अपनी आकाशगंगा मंदाकिनी, दूरस्थ आकाशगंगायें, क्वासर, निहारिका और अन्य खगोलिय पिंडो को समझने मे मदद करेगा।

लेकिन “असाधारण अविश्वसनीय रूप से विस्तृत ” का अर्थ क्या है ?

इसे समझाने के लिये मेरे पास शब्द नही है, मै इसे आपको कुछ दिखाकर ही समझा पाउंगा।

उपर दिया गया चित्र इस सर्वेक्षण का एक भाग है जो एक तारों के निर्माण क्षेत्र G305 को दर्शा रहा है। यह क्षेत्र एक गैस का विशालकाय, महाकाय भाग है और हम से 12,000 प्रकाशवर्ष की दूरी पर है। इस क्षेत्र मे दसीयो हजार तारों का जन्म हो रहा है।

है ना यह खूबसूरत चित्र ? इस चित्र मे लगभग 10,000 तारे है, और आप इस चित्र मे नये तारो का निर्माण करते गैस और धूल के क्षेत्रो को देख सकते है। नये तारे सामान्यतः नीले रंग के होते है।

लेकिन दसीयो हजारों तारो का यह विशालकाय भाग इस सर्वेक्षण का एक लघु से भी लघु भाग है। कितना लघु ? यह क्षेत्र निचे दिये गये चित्र मे सफेद वर्ग से दर्शाया गया है।

उपर दिये गये चित्र को पूर्णाकार मे देखने उसपर क्लीक करें! है ना विशालकाय! लेकिन यह चित्र भी निचे के चित्र का एक छोटा सा भाग(सफेद वर्ग मे दर्शीत) है।

और उपर दिया गया क्षेत्र भी निचे दिये गये चित्र का सफेद वर्ग मे दर्शित एक क्षेत्र है।

यह उपर दिया गया चित्र उतना प्रभावी नही लग रहा ना! चित्र पर क्लीक किजीये और इसे पूर्णाकार मे देखीये! अब कहीये कि कितना खूबसूरत है यह ! यह एक लगभग 20,000 x 200 पिक्सेल का आकाश का चित्र है और इसे आकाश के हजारो भिन्न भिन्न चित्रो को मिलाकर बनाया गया है। और यह चित्र भी वास्तविक चित्र को बहुत ही छोटा कर बनाया गया है।

क्या कहा ? वास्तविक चित्र को बहुत छोटा कर बनाया गया है! तो वास्तविक चित्र के आंकड़े कितने विशाल है ? ज्यादा नही केवल 150 अरब पिक्सेल इइइइइइइइइइइइइ इइइइइइइइइइइइइइइइइ…………………..!!!!!

इतने विशालकाय, महाकाय, दानवाकार के लिये कोई शब्द है आपके पास…..
इस चित्र का आकार एक सौ पचास हजार मेगापिक्सेल है………………

इस विशाल वास्तविक चित्र को देखना चाहते है ? यहां पर जाईये, आप वास्तविक चित्र को देख सकते है। आप इस चित्र को जूम कर हर हिस्से को विस्तार से देख सकते है।

इस चित्र मे एक अरब से ज्यादा तारें हैं। एक अरब! यह अभी तक का आकाश का सबसे बेहतर व्यापक सर्वेक्षण है लेकिन यह भी एक लघुतम है। इस सर्वेक्षण मे हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी के एक भाग का ही समावेश है जहाँ पर वह सबसे ज्यादा मोटी है! और इस चित्र के तारे हमारी आकाशगंगा के कुल तारो के 1% से भी कम है।

संपूर्ण ब्रह्माण्ड मे हमारी आकाशगंगा जैसी लाखों अरबो आकाशगंगाये है….. अब मेरे शब्द चूक गये है। आप इन चित्रो पर क्लीक किजीये और प्रकृति की खूबसूरती का आनंद लीजीये!

पृथ्वी के आकार के ग्रह की खोज!

In अंतरिक्ष, ग्रह, पृथ्वी, ब्रह्माण्ड, सौरमण्डल on दिसम्बर 21, 2011 at 5:58 पूर्वाह्न

पृथ्वी और शुक्र की तुलना मे केप्लर 20e तथा केप्लर 20f

पृथ्वी और शुक्र की तुलना मे केप्लर 20e तथा केप्लर 20f

खगोलशास्त्रीयों ने दूसरी पृथ्वी की खोज मे एक मील का पत्त्थर पा लीया है, उन्होने एक तारे की परिक्रमा करते हुये दो ग्रहों की खोज की है। और ये दोनो ग्रह पृथ्वी के आकार के है!

इन ग्रहों को केप्लर 20e तथा केप्लर 20f नाम दिया गया है। चित्र मे आप देख सकते हैं कि वे हमारे मातृ ग्रह पृथ्वी के आकार के जैसे ही है। 20e का व्यास 11,100 किमी तथा 20f का व्यास 13,200 किमी है। तुलना के लिए पृथ्वी का व्यास 12,760 किमी है। ये दोनो ग्रह सौर मंडल के बाहर खोजे गये सबसे छोटे ग्रह है। इससे पहले पाया गया सबसे छोटा ग्रह केप्लर 10b था जोकि पृथ्वी से 40% ज्यादा बड़ा था।

लेकिन यह स्पष्ट कर दें कि ये दोनो ग्रह पृथ्वी के आकार के हैं लेकिन पृथ्वी के जैसे नही है। इनका मातृ तारा केप्लर 20 हमारे सूर्य के जैसा है, लेकिन थोड़ा छोटा और थोड़ा ठंडा है। यह तारा हमसे 950 प्रकाशवर्ष दूर है। लेकिन ये दोनो ग्रह केप्लर 20 की परिक्रमा पृथ्वी और सूर्य की तुलना मे समीप से करते है। इनकी कक्षा अपने मातृ तारे से 76 लाख किमी तथा 166 लाख किमी है। यह कक्षा अपने मातृ तारे के इतने समीप है कि इन ग्रहो की सतह का तापमान क्रमशः 760 डीग्री सेल्सीयस तथा 430 डीग्री सेल्सीयस तक पहुंच जाता है। इनमे से ठंडे ग्रह केप्लर 20f पर भी यह तापमान टीन या जस्ते को पिघला देने के लिये पर्याप्त है।

इन ग्रहों की यात्रा के लिये सूटकेश पैक करना अभी जल्दबाजी होगी, हालांकि राकेट से इन तक जाने के लिये अभी लाखों वर्ष लग जायेंगे। हम अभी इन ग्रहो का द्रव्यमान नही जानते है। लेकिन इन ग्रहो के आकार के कारण इनका द्रव्यमान पृथ्वी के तुल्य ही होगा।

यह प्रमाणित करता है कि केप्लर अंतरिक्ष वेधशाला अंतरिक्ष मे पृथ्वी के जैसे ग्रहो की खोज मे सक्षम है। यह अभियान सही दिशा मे प्रगतिशील है।

यह यह भी दर्शाता है कि हमारा सौर मंडल अपने आप मे अकेला नही है। हम ऐसे कई तारो को जानते है जिनके अपने ग्रह है लेकिन अब तक पाये गये सभी ग्रह महाकाय थे और उनकी खोज आसान थी। लेकिन केप्लर 20e तथा केप्लर 20f पृथ्वी के जैसे है और यह एक बड़ी खोज है।

केप्लर 20 मंडल मे तीन अतिरिक्त ग्रह भी है जोकि पृथ्वी से बड़े है, इनका नाम केप्लर 20b,c तथा d है, इनका व्यास क्रमशः 24,000,40,000 तथा 35,000 किमी है, जोकि नेपच्युन और युरेनस से कम है, इसके बावजूद ये विशालकाय ग्रह है। हम इनके द्रव्यमान को जानते है, इनका द्रव्यमान पृथ्वी से क्रमशः 8.7,16.1 तथा 20 गुणा ज्यादा है। आप इन्हे महापृथ्वी कह सकते है।

यह सभी ग्रह अपने तारे की परिक्रमा काफी समीप से करते है। इनमे से सबसे बाहरी ग्रह केप्लर 20f है लेकिन यह सारी प्रणाली तुलनात्मक रूप से बुध की कक्षा के अंदर ही है! यह प्रणाली हमारे सौर मंडल से अलग है। हमारे सौर मंडल मे कम द्रव्यमान वाले ग्रह अंदर है, तथा ज्यादा द्रव्यमान वाले ग्रह बाहर, लेकिन केप्लर 20 मे यह बारी-बारी से है, बड़ा ग्रह – छोटा ग्रह – बड़ा ग्रह – छोटा ग्रह…

हम यह सब कैसे जानते है ?

केप्लर वेधशाला अंतरिक्ष मे है, वह एक समय मे एक छोटे से हिस्से का निरीक्षण करती है। इसके दृश्य पटल मे 100,000 तारे है जिसमे केप्लर 20 भी है। जब किसी तारे की परिक्रमा करता कोई ग्रह अपने मातृ तारे के सामने से जाता है, उस तारे के प्रकाश मे थोड़ी कमी आती है, इसे संक्रमण(ग्रहण) कहते है। जितना बड़ा ग्रह होगा उतना ज्यादा प्रकाश रोकेगा। प्रकाश की इस कमी को केप्लर वेधशाला पकड़ लेती है और प्रकाश मे आयी कमी की मात्रा से उसका आकार ज्ञात हो जाता है, इसी तरह से हमने इन ग्रहो का आकार ज्ञात किया है।

केप्लर20 तारा प्रणाली

केप्लर20 तारा प्रणाली

जब यह ग्रह अपने तारे की परिक्रमा करते है तब वे अपने मातृ तारे को भी अपने गुरुत्व से विचलीत करते। इस विचलन को भी उस तारे के प्रकाश से मापा जा सकता है, यह विचलन उसके प्रकाश मे आने वाले डाप्लर प्रभाव से देखा जाता है। यह डाप्लर विचलन दर्शाता है कि उस तारे पर ग्रह का गुरुत्व कितना प्रभाव डाल रहा है और यह गुरुत्व उस ग्रह के द्रव्यमान पर निर्भर करता है। केप्लर 20 प्रणाली मे हम उसके विशाल ग्रहो द्वारा डाले गये गुरुत्विय प्रभाव को मापने मे सफल हो पाये है, जिससे हम केवल उसके विशाल ग्रहो का द्रव्यमान ही जानते है। लेकिन केप्लर 20e तथा 20f इतने छोटे है कि उनका गुरुत्विय प्रभाव हम मापने मे असमर्थ है।

एक और तथ्य स्पष्ट कर दें कि हम इन ग्रहो का अस्तित्व जानते है, इन ग्रहों का कोई चित्र हमारे पास नही है। प्रस्तुत चित्र कल्पना आधारित है। इन ग्रहो का अस्तित्व अप्रत्यक्ष प्रमाणो अर्थात उनके द्वारा उनके मातृ तारे पर पड़ने वाले प्रभाव से प्रमाणित है। यह विधियाँ विश्वशनिय है इसलिये हम कह सकते है कि इन ग्रहों का अस्तित्व निसंदेह है।

इन ग्रहो की खोज सही दिशा मे एक कदम है। हमारी दिशा है कि किसी तारे के गोल्डीलाक क्षेत्र मे जहां पर जल अपनी द्रव अवस्था मे रह सके पृथ्वी के आकार के चट्टानी ग्रह की खोज! आशा है कि निकट भविष्य मे ऐसा ग्रह खोज लेंगे। और यह दिन अब ज्यादा दूर नही है।

ब्रह्मांडीय जलप्रपात

In अंतरिक्ष, निहारीका, ब्रह्माण्ड on अक्टूबर 25, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

NGC 1999: 10 प्रकाश वर्ष उंचा  ब्रह्मांडीय जलप्रपात

NGC 1999: 10 प्रकाश वर्ष उंचा ब्रह्मांडीय जलप्रपात

इस ब्रह्माण्डीय जलप्रपात निहारिका का निर्माण कैसे हुआ ? कोई नही जानता! इस चित्र मे प्रस्तुत संरचना NGC 1999 का भाग है जो कि बृहद ओरीयान आण्विक बादल संरचना( Great Orion Molecular Cloud complex ) का एक भाग है। यह ब्रह्माण्ड की सबसे रहस्यमयी संरचनाओं मे से एक है। इस क्षेत्र को HH-22 के नाम से भी जाना जाता है।

इस चित्र मे दिखायी दे रही गैस की धारा लगभग १० प्रकाशवर्ष लंबाई मे है, और यह अनेको रंगो को प्रदर्शित करती है। एक अवधारणा के अनुसार गैस की यह धारा पास के आण्विक बादल से एक नये तारे से प्रवाहित सौर वायु के टकराव के फलस्वरूप बन रही है। लेकिन यह अवधारणा यह बताने मे असमर्थ रहती है कि इस जलप्रपात की धारा और अन्य धूंधली धारायें मुड़कर एक चमकीले बिंदू पर मील रही है, जो कि एक रेडियो तरंगो का अतापी(non thermal) श्रोत है। यह रेडियो श्रोत इस मुड़ी हुयी धारा के उपर बायें स्थित है।

एक दूसरी अवधारणा के अनुसार यह असामान्य रेडियो श्रोत किसी युग्म तारे से उत्पन्न हो रही है जिसमे एक तारा श्वेत वामन(White Dwarf), न्युट्रान तारा(Neutron Star) या श्याम विवर(Black Hole) है और यह जलप्रपात इस तीव्र ऊर्जावान प्रणाली से उत्सर्जित गैसीय जेट धारा है। लेकिन इस तरह की प्रणाली मे एक्स रे(X Ray) का भी उत्सर्जन होता है लेकिन किसी एक्स रे श्रोत का पता नही चला है।
वर्तमान मे रहस्य बरकरार है। भविष्य के ज्यादा सावधानीपुर्वक किये गये निरीक्षण इस रहस्य के आवरण को हटा सकते है।

भौतिकी का नोबेल तीन खगोलशास्त्रीयों को!

In ब्रह्माण्ड, वैज्ञानिक on अक्टूबर 11, 2011 at 4:55 पूर्वाह्न

1994 मे एक स्पायरल आकाशगंगा के बाह्य क्षेत्र मे हुआ सुपरनोवा विस्फोट !

1994 मे एक स्पायरल आकाशगंगा के बाह्य क्षेत्र मे हुआ सुपरनोवा विस्फोट !

लगभग 13 वर्ष पहले यह खोज हुयी थी कि ब्रह्माण्ड की अधिकांश ऊर्जा तारों या आकाशगंगा मे ना होकर अंतराल से ही बंधी हुयी है। किसी खगोलवैज्ञानिक की भाषा मे एक विशाल खगोलीय स्थिरांक (Cosmological Constant) की उपस्थिति का प्रमाण एक नये सुपरनोवा के निरिक्षण से मीला था। इस खगोलीय स्थिरांक (लैम्डा) की उपस्थिती के पक्ष मे यह प्रथम सलाह नही थी, यह तो आधुनिक खगोल विज्ञान के जन्म से विद्यमान थी। लेकिन वैज्ञानिक इस खगोलीय स्थिरांक की उपस्थिति से बैचेन थे क्योंकि यह खगोलिय स्थिरांक ज्ञात ऊर्जा श्रोत (तारे, निहारिका, आकाशगंगा या श्याम विवरो) से जुड़ा ना होकर, निर्वात अंतरिक्ष से जुड़ा हुआ है। निर्वात की ऊर्जा समझ से बाहर है।

पिछले तेरह वर्षो मे स्वतंत्र वैज्ञानिको के समूहो ने इस खगोलीय स्थिरांक की उपस्थिति के समर्थन मे पर्याप्त आंकड़े जुटा लीये है। ये आंकड़े प्रमाणित करते है कि एक विशाल खगोलीय स्थिरांक अर्थात श्याम ऊर्जा(Dark Energy) का अस्तित्व है। इस श्याम ऊर्जा के परिणाम स्वरूप ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे तेजी आ रही है। इस खोज के लिए वर्ष 2011 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार तीन खगोल वैज्ञानिको साउल पर्लमटर(Saul Perlmutter), ब्रायन स्कमिड्ट( Brian P. Schmidt) तथा एडम रीस(Adam G. Riess) को दीया जा रहा है।

प्रस्तुत चित्र 1994 के एक सुपरनोवा विस्फोट का है जो एक स्पायरल आकाशगंगा के बाह्य क्षेत्र मे हुआ था। इस विस्फोट के निरिक्षण से प्राप्त आंकड़े भी इस श्याम ऊर्जा की उपस्थिति के प्रमाणन मे प्रयुक्त हुये है।

2012 के भौतिकी नोबेल पुरुष्कार विजेता : एडम रीस(Adam G. Riess), साउल पर्लमटर(Saul Perlmutter) तथा  ब्रायन स्कमिड्ट( Brian P. Schmidt)

2012 के भौतिकी नोबेल पुरुष्कार विजेता : एडम रीस(Adam G. Riess), साउल पर्लमटर(Saul Perlmutter) तथा ब्रायन स्कमिड्ट( Brian P. Schmidt)

सप्तॠषि तारामंडल का सुपरनोवा अपनी चरम दीप्ती पर

In तारे, ब्रह्माण्ड on सितम्बर 8, 2011 at 7:42 पूर्वाह्न

सप्तऋषी तारामंडल का सुपरनोवा SN2011fe

सप्तऋषी तारामंडल का सुपरनोवा SN2011fe

कुछ सप्ताह पहले खगोलविज्ञानीयों ने M101 आकाशगंगा मे एक सुपरनोवा विस्फोट देखा था। यह एक वर्ग Ia का सुपरनोवा है, जो कि खगोलीय दूरीयों की गणना मे प्रयुक्त होते है। यह सुपरनोवा अपनी इस विशेषता के कारण महत्वपूर्ण होते है और इस तरह के सुपरनोवा को अपने इतने समीप 260 लाख प्रकाश वर्ष दूरी पर पाना दुर्लभ होता है। (खगोलीय पैमाने पर 260 लाख प्रकाश वर्ष छोटी दूरी है।)

प्रस्तुत चित्र आक्सफोर्ड विश्विद्यालय द्वारा कैलीफोर्निया स्थित अंतरिक्ष वेधशाला से लिया गया है।

इस सुपरनोवा की खोज पालोमर ट्रान्जीएन्ट फ़ैक्टरी(Palomar Transient Factory) के वैज्ञानिको ने की थी और अस्थायी नाम PTF 11kly दिया था। अब इसे स्थायी नाम SN2011fe दिया गया है। 2011 मे खोजा गया यह 136 वाँ सुपरनोवा है। (सुपरनोवा के नाम रोमन अक्षरो पर रखे जाते है, पहले 26 सुपरनोवा SN2011a-z थे, उसके पश्चात अगले 26 सुपरनोवा SN2011aa-az थे।)

यह चित्र 0.8 मीटर दूरबीन से लास कम्ब्रेस वेधशाला वैश्विक वेधशाला संजाल( the Las Cumbres Observatory Global Telescope Network) से लिया गया है। यह एक अपेक्षाकृत छोटी दूरबीन है अर्थात यह सुपरनोवा काफी चमकदार पिंड है।

यह सुपरनोवा अपनी चरम दीप्ती पर पहुंच रहा है और अब यह बायनाकुलर या छोटी दूरबीन से दिखायी देना चाहीये। यदि आप सप्तऋषि तारामंडल की ओर देंखे तो इसे खोज पाना कठीन नही होगा। सुपरनोवा सामान्यतः अपने चरम दीप्ती पर पहुंचने के लिए 1-2सप्ताह लेते है और उसके पश्चात धीमे धीमे धुंधले होते जाये है। यदि आप इसे आज-कल मे नही देख पाये तो परेशानी नही है लेकिन ज्यादा देर ना करें। ऐसे मौके दुर्लभ होते है।

श्याम विवर(Black Hole) ने तारे को निगला

In अंतरिक्ष, तारे, ब्रह्माण्ड on जून 28, 2011 at 6:10 पूर्वाह्न

श्याम विवर द्वारा किसी तारे का निगला जाना और एक्रीशन डिस्क(Accretion Disk) का निर्माण

ब्रिटेन के खगोलविदों ने श्याम विवर में फंस कर एक तारे की मौत होने के सबूत जुटाने का दावा किया है।

बताया जा रहा है कि एक तारा परिभ्रमण के दौरान एक श्याम विवर के इतना क़रीब आ गया कि परिणाम धीमी मौत के अलावा कुछ और हो ही नहीं सकता था। वॉरिक विश्वविद्यालय के खगोलविद डॉ. एंड्र्यू लेवन की टीम ने इस साल 28 मार्च 2011 को अंतरिक्ष में गामा किरणों का एक तूफ़ान (Gama ray Burst – GRB)दर्ज़ किया। आमतौर पर किसी बूढ़े तारे में विस्फोट के दौरान गामा किरणों का रेला निकलता है।

लेकिन ऐसी स्थिति में विकिरण का महाप्रवाह(GRB) एक बार ही होता है, जबकि मार्च में पहली बार दिखा गामा किरणों का प्रवाह ढाई महीने बाद अब भी रह-रह कर ज़ोर पकड़ रहा है।

भारी ऊर्जा


डॉ. लेवन इसे किसी तारे के श्याम विवर की चपेट में आने का नतीजा बता रहे हैं. उन्होंने कहा,

“जितनी मात्रा में ऊर्जा सामने आ रही है, वो वैसी स्थिति में संभव है जब किसी तारे को एक श्याम विवर में फेंक दिया जाए। ”

खगोलविदों का मानना है कि हर आकाशगंगा के केंद्र में एक श्याम विवर होता है। लेकिन उसकी उपस्थिति का स्वतंत्र रूप से अंदाज़ा लगा पाना असंभव है क्योंकि श्याम विवर में महागुरुत्व की अवस्था होती है जिसके चंगुल से प्रकाश तक नहीं निकल सकता है। ब्रह्मांड के किसी कोने में श्याम विवर की उपस्थिति का हमें तभी पता चलता है जब तारे जैसा कोई बड़ा खगोलीय पिंड उसका शिकार बनता है।

कोई तारा श्याम विवर में समाने की प्रक्रिया में पहले अपना गोल आकार खोता है। महागुरुत्व के असर से वह लगातार पिचकता जाता है।

तारे का स्वतंत्र अस्तित्व पूरी तरह ख़त्म हो उससे पहले उससे रह-रह कर एक्स और गामा किरणों का रेला निकलता है जो धरती पर रेडियो दूरबीनों के ज़रिए देखा जा सकता है।

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श्रोत : बी बी सी  से साभार

बिल्ली की आंखे(Cat’s Eye Nebula) : सितारों की खूबसूरत मृत्यु !

In अंतरिक्ष, निहारीका, ब्रह्माण्ड on मई 10, 2011 at 7:00 पूर्वाह्न

बिल्ली की आंखो के जैसी ग्रहीय निहारिका

बिल्ली की आंखो के जैसी ग्रहीय निहारिका

अंतरिक्ष की गहराईयो मे यह विशालकाय बिल्ली की आंख(Cat’s Eye Nebula) के जैसी ग्रहीय निहारिका(planetary nebula) पृथ्वी से तीन हजार प्रकाश वर्ष दूर है। इस निहारिका को एन जी सी ६५४३(NGC 6543) भी कहते है। यह निहारिका सूर्य के जैसे तारे की मृत्यु के क्षणो को दर्शाती है। इस निहारिका के मध्य के तारे ने अपनी मृत्यु के समय गैस की तहो को एक के बाद एक अनेक विस्फोटो मे इस तरह छीतरा दिया था। अब यह तारा एक श्वेत वामन तारे(White Dwarf) के रूप मे है, जो धीरे धीरे धुंधला होते हुये विलुप्त हो जायेगा(अर्थात धीरे धीरे ठंडा होते हुये प्रकाश का उत्सर्जन बंद कर देगा)।

ये तारे अपनी मृत्यु के समय इतना खूबसूरत पैटर्न कैसे बनाते है ?

इस प्रक्रिया को अभी तक पूरी तरह नही समझा जा सका है। हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला से लिए गये इस चित्र मे अंतरिक्ष मे फैली यह विशालकाय आंख आधा प्रकाशवर्ष चौड़ी है। बिल्ली की आंखो को घूरते हुये खगोलविज्ञानी इसमे अपने सूर्य की मृत्यु के क्षणो को देखते है जिसके भाग्य मे अपनी मृत्यु के पश्चात ऐसी ही निहारिका मे परिवर्तन निश्चित है।

ज्यादा दूर नही बस ५ अरब वर्षो के बाद!

सीगार आकाशगंगा(M82)

In आकाशगंगा, ब्रह्माण्ड on जनवरी 18, 2011 at 8:26 पूर्वाह्न

सीगार के आकार की एम ८२ आकाशगंगा

सीगार के आकार की एम ८२ आकाशगंगा

सीगार आकाशगंगा(M82) किससे प्रकाशमान हो रही है ? एम ८२ एक अनियमित आकार की आकाशगंगा है। हाल ही मे यह विशालकाय पेंचदार आकाशगंगा एम ८१ के पास से गुजरी है जिस कारण से इस आकाशगंगा मे काफी हलचल हुयी है। लेकिन यह हलचल भी लाल रंग मे चमकती हुयी बाहर की ओर विस्तृत होती हुयी गैस के कारण को समझाने मे असमर्थ है। हालिया प्रमाणो के अनुसार यह गैस कई सारे तारो द्वारा उत्सर्जित कणो की वायू से बन रही है और एक आकाशगंगीय आकार की महा-वायू बना रही है। इस चित्र के लाल रंग के हिस्से आयोनाइज्ड हायड़्रोजन गैस के कारण है, जो इस गैस के चमकते हुये तंतुओ को दिखा रहे है। यह लाल रंगे के तंतु १०,००० प्रकाशवर्ष चौड़े है। १२० लाख प्रकाशवर्ष दूर की यह सीगार के आकार की आकाशगंगा अवरक्त(Infrared) किरणो मे सबसे चमकदार आकाशगंगा है। इसे साधारण प्रकाश के रंगो मे छोटी दूरबीन से सप्तऋषि तारामंडल के पास देखा जा सकता है।

हैन्नी का वूरवेर्प

In अंतरिक्ष, निहारीका, ब्रह्माण्ड on जनवरी 12, 2011 at 6:17 पूर्वाह्न

हब्बल दूरबीन से लीये गये इस चित्र को देखीये। पहली नजर मे देखने पर यही लगेगा की यह एक स्पाइरल के आकार आकाशगंगा है। लेकिन इस आकाशगंगा के निचे देखीये…..

हैन्नी का वूरवेर्प

हैन्नी का वूरवेर्प

ये अजीब सी हरी वस्तु क्या है ?

ये है हैन्नी का वूरवेर्प(Voorwerp)! चित्र पर क्लीक किजिये और इसे बड़े आकार मे देखीये…अब आप पुछेंगे कि ये वूरवेर्प क्या है ? यह डचभाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है “वस्तु“। वस्तु ? लेकिन अंतरिक्ष मे ये विशालकाय वस्तु क्या है ?

हैन्नी वान अर्केल ने इस वूरवेर्प को खोजा था और मजे की बात यह है कि हैन्नी खगोलविज्ञानी नही है। हैन्नी डच महारानी के गिटार-वादक ’ब्रायन मे’ का ब्लाग पढ रही थी जो कि एक खगोलविज्ञानी भी है। उस ब्लाग मे ब्रायन ने एक प्रोजेक्ट ’गैलेक्सी जू’ के बारे मे लिखा था, इस प्रोजेक्ट मे आप अपने कम्युटर पर आकाशगंगाओ को वर्गीकृत कर सकते है। हैन्नी ने इस प्रोजेक्ट को खोला और आकाशगंगाओ को देखना शुरू किया। किसी तरह उसने इस विचित्र सी हरी रंग की वस्तु को देखा। उसने खगोलविज्ञानीयो से इस वस्तु के बारे मे पुछा। अब खगोल विज्ञानीयो ने इस पर ध्यान दिया और हब्बल दूरबीन से इसका विचित्र चित्र लिया और यह चित्र आपके सामने है।

यह क्या है ? हरा रंग यह बताता है कि यह एक महाकाय गैस का बादल है, और हरा रंग इसे प्रदिप्तीत आक्सीजन से प्राप्त हो रहा है। लेकिन इस बादल के पास प्रकाश का कोई साधन नही है, यह प्रकाश उसे पास की आकाशगंगा से प्राप्त हो रहा होगा। यह गैस का हरे रंग का वूरवेर्प हमारी आकाशगंगा के बराबर विशालकाय है, पूरे १००,००० प्रकाशवर्ष चौड़ा !

यह माना जाता है कि इस आकाशगंगा के मध्य एक “महाकाय श्याम विवर (Super Massive Black Hole)” है जिसे IC २४९७ नाम दिया गया है। एक लंबे अंतराल से यह श्याम विवर पदार्थ को निगले जा रहा है। किसी श्याम विवर मे पदार्थ के निगलने से पहले घटना क्षितीज(Event Horizon) पर एक श्याम विवर के आसपास एक तश्तरी बन जाती है। यह तश्तरी श्यामविवर मे गीर रहे पदार्थ के घर्षण और गुरुत्वाकर्षण से गर्म होती है और विभिन्न बलो के क्रियाशील होने से यह दो विपरित दिशाओ मे उर्जा और पदार्थ की धारा(Jet) प्रवाहित करना प्रारंभ कर देती है।

इसी समय पर आकाशगंगा के बाहर हजारो प्रकाशवर्ष चौड़ा गैस का बादल शांत अवस्था मे रहा था। अचानक IC २४९७  के केन्द्र के श्याम विवर द्वारा उत्सर्जित उर्जा और पदार्थ की धारा इस बादल से टकरायी , इस धारा ने उसे प्रकाशित कर दिया और यह बादल किसी नियानलाईट(सच्चाई मे आक्सीजन लाईट) के जैसे प्रदिप्त हो उठा।

किसी समय, लगभग २००,००० वर्ष पहले IC २४९७  के केन्द्र के श्याम विवर मे पदार्थ का जाना रूक गया। शायद श्याम विवर के आसपास पदार्थ खत्म हो गया, जिससे इसकी तश्तरी से उर्जा और पदार्थ की धारा का उत्सर्जन रूक गया। लेकिन वूरवेर्प अभी तक प्रदिप्तित है क्योंकि गैस को अपनी चमक खोने मे लम्बा समय लगता है, लेकिन एक समय आने पर यह वूरवेर्प चमकना बंद कर देगा और हमारी निगाहों से ओझल हो जायेगा।

विज्ञानीयो के लिये यह एक असाधारण पिंड है। इसके जैसा पिंड इसके पहले देखा नही गया है इसलिये इसके बारे मे हर जानकारी नयी है।

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