अविश्वसनीय, अद्भुत और रोमाँचक: अंतरिक्ष

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आयताकार लाल निहारिका

In अंतरिक्ष, निहारीका, ब्रह्माण्ड on दिसम्बर 16, 2010 at 5:10 पूर्वाह्न

ये फोटोशाप या किसी कम्प्युटर द्वारा बनाई गयी डीजीटल तस्वीर नही है! ये तो प्रकृती द्वारा निर्मित है !

आयताकार लाल निहारिका

आयताकार लाल निहारिका

यह असामान्य लाल आयताकार निहारिका कैसे बनी ?

इस निहारिका के मध्य मे एक वृद्ध होता तारा-युग्म (Binary Stars)है जो इस निहारिका को उर्जा प्रदान करता है। लेकिन यह तारा युग्म इस निहारिका के रंगो का कारण बताने मे असमर्थ है। इस निहारिका का असामान्य लाल आयताकार होना एक मोटे धूलि टारस के कारण है जो गोलाकार रूप से धूल और गैस के बाह्यप्रवाह को शंक्वाकार रूप मे संकुचित करता है। ये शंकू एक X के जैसे दिखायी देते है। जबकि टारस किनारो पर आयताकार रूप मे दिखायी दे रहा है।
इस निहारिका के रंगो के कारण के पिछे ज्यादा जानकारी नही है लेकिन शायद यह इसमे उपस्थित हायड्रोकार्बन अणुओ से है। यह हायड्रोकार्बन के अणु जिवन की मूलभूत ईकाई है।
यह लाल आयताकार नेबुला २३०० प्रकाशवर्ष दूर युनिकार्न (Unicorn) तारामंडल की ओर स्थित है। उपर दी गयी तस्वीर ह्ब्बल दूरबीन से ली गयी है। कुछ अरब वर्ष पश्चात यह निहारिका अपने केन्द्र के तारो के इंधन की समाप्ति के कारण एक ग्रहीय निहारिका(Planetary nebula)के रूप मे परिवर्तित हो जायेगी।

ब्रह्माण्ड की अनंत गहराईयो की ओर : वायेजर 1

In अंतरिक्ष, ब्रह्माण्ड, सौरमण्डल on दिसम्बर 14, 2010 at 7:11 पूर्वाह्न

वायेजर हिलियोशेथ मे

वायेजर हिलियोशेथ मे

वायेजर १ एक सर्वकालिक सबसे सफल अंतरिक्ष अभियान है। 1977 मे प्रक्षेपित इस अंतरिक्षयान ने बृहस्पति और शनि की यात्रा की थी और ऐसे चित्र भेजे थे जिसकी हमने कभी कल्पना भी नही की थी।बृहस्पति और शनी के बाद यह यान युरेनस और नेपच्युन की कक्षा पार कर गया। (वायेजर 2 ने इन दोनो ग्रहो की यात्रा की थी।) इन सभी वर्षो मे सौर वायु इस यान के साथ साथ बहती रही है। सौर वायु परमाणु से छोटे कणो(क्वार्क, इलेक्ट्रान,बोसान इत्यादि) से बनी होती है जो सूर्य से सैकड़ो किलोमिटर प्रति सेकंड की रफ्तार से निकलकर बहते रहते है। ये सौर वायु वायेजर से कहीं अधिक तेज गति से बहती है। लेकिन अब दिसंबर 2010 मे 33 वर्ष पश्चात 17 अरब किमी दूरी पर एक परिवर्तन आया है। वायेजर 1 एक ऐसी जगह पहुंच गया है जहां यह सौर वायु का प्रवाह रूक गया है। अब यह सौर पवन वायेजर की पिठ पर नही है।

तारो के बीच मे जो गैस होती है उसे खगोलविज्ञानी अंतरिक्षिय माध्यम (interstellar medium) कहते है। सौर वायु इस अंतरिक्षिय माध्यम की ओर बहती है तथा इस अंतरिक्षिय माध्यम की गति को मंद करती है। लगभग एक अरब किमी चौड़ा यह क्षेत्र जहां सौर वायु रूक जाती है, सौर मंडल के आसपास एक लगभग गोलाकार कवच के रूप मे रहता है। यह गोलाकार कवच हिलियोस्फियर कहलाता है। हिलियोस्फियर के बाहर एक सीमा तक अंतरिक्षिय माध्यम तथा सौर वायु दोनो का प्रभाव रहता है, इस सीमा को हिलियोपाज कहते है। इस हिलियोस्फियर और हिलियोपाज के बीच का क्षेत्र हिलियोशेथ कहलाता है

वायेजर १ अब हिलियोशेथ क्षेत्र मे पहुंच गया है। तथ्य यह है कि वायजर 1 पिछले 6 महिने से हिलियोशेथ मे है; वैज्ञानिको ने जून 2010 मे ही सौर वायु की रफ्तार को 0(शुन्य) तक गीरते देखा था लेकिन इसे जांचने मे थोड़ा समय लगा। वैज्ञानिको को निश्चित करना था कि यह उपकरणो की किसी गलती से तो नही है। वायेजर के आगे अब एक शांत खगोलिय समुद्र है।

यह यान अभी भी 60,000किमी/घंटा की गति से सौर मंडल से बाहर की दिशा मे जा रहा है। कुछ वर्षो मे वह हिलियोशेथ को पिछे छोड़ देगा। जब यह होगा तब यह यान वास्तविक अंतरिक्ष व्योम मे होगा , जो कि सितारो के मध्य एक विस्तृत और उजाड़ जगह है। इस समय यह यान मानव निर्मित ऐसी पहली वस्तु है जिसमे सौर मंडल की सीमाओ को लांघते हुये आकाशगंगा की अनंत गहराईयो मे प्रवेश किया है।

कल्पना किजिये, यह यान उस समय प्रक्षेपित किया गया था, जब कम्युटर हर जगह नही थे, मोबाईल फोन नही थे, ना था यह अंतरजाल ! आपका अपना मोबाईल वायेजर मे लगे कम्युटर से कई गुणा बेहतर है। लेकिन इस यान को गति मिली थी इसके राकेट से, बृहस्पति और शनि के गुरुत्वाकर्षण से और अदम्य मानव मन से! और कुछ ही वर्षो बाद यह यान हमारे सौर मंडल के घोंसले को छोड़ चल देगा अपनी अनंत यात्रा मे !

ये क्या जगह है दोस्तो !

In अंतरिक्ष, पृथ्वी on दिसम्बर 9, 2010 at 7:05 पूर्वाह्न

मुझसे यदि यह अनुमान लगाने कहा जाता कि निचे दी गयी तस्वीर कहां की है मै निश्च्य ही मंगल ग्रह कहता। आप क्या सोचते है ?

ये क्या जगह है दोस्तो !

ये क्या जगह है दोस्तो !

भूमी का रंग, डरावना भूदृश्य , ज्वालामुखी देखने से लगता है कि समय जैसे ठहर गया है, लाखो वर्षो से कुछ भी नही बदला है…. यह मंगल ही होना चाहीये ! है ना ? नही यह पृथ्वी ही है !
यह तस्वीर अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र के यात्रीयो द्वारा मार्च २००८ मे  लिया गया है। चित्र मे दिखाया गया प्रदेश सउदी अरब के हरात खैबर के लावा क्षेत्र है। यह एक नया ज्वालामुखीय क्षेत्र है। यहां पहला ज्वालामुखिय उत्सर्जन ५० लाख वर्ष पहले हुआ होगा लेकिन कुछ ज्वालामुखिय उत्सर्जन दो हजार वर्ष पूराने है।
यह क्षेत्र अत्यंत रूप से शुष्क है लेकिन इस तरह के ज्वालामुखी मे लावा के साथ पानी भी आता है। कुछ समय पहले यहां पर पानी अच्छी मात्रा मे रहा होगा लेकिन किसी कारण से सारा पानी कहीं चला गया ! और छोड़ गया ज्वालामुखिय चट्टाने, रेत और बालु !

बिल्कुल मंगल के जैसे ….।

सौर ज्वाला

In अंतरिक्ष, सौरमण्डल on दिसम्बर 7, 2010 at 11:18 पूर्वाह्न

क्या हो रहा है सूर्य पर ! तस्वीर के दाये निचे कोने पर ध्यान दिजिये ! क्या है यह ?

यह तस्वीर सोलर डायनेमिक्स ओबजरवेटोरी द्वारा छ: दिसंबर को १७:५० UT पर ली गयी है। यह सुर्य से समय समय पर निकलने वाली सौर ज्वाला है। इस सौर ज्वाला १० लाख किमी मे फैली हुयी है। ध्यान रहे इस तस्वीर पर पृथ्वी की लंबाई चौड़ाई ५ पिक्सेल से ज्यादा नही होगी ! पृथ्वी का व्यास लगभग १२,७५० किमी है।

सौर ज्वाला

सौर ज्वाला

अब कुछ ज्ञान की बातें

१.इस घटना से पृथ्वी को कोई खतरा नही है। इस तरह की सौर ज्वाला से का असर सूर्य तक ही रहता है और कुछ घंटो बाद यह ज्वाला शांत हो जाती है। इस ज्वाला के साथ कोई सौर विकिरण उत्सर्जन (Coronal Mass Ejection) नही हुआ है, जो उपग्रहो और पावर ग्रिडो को नुकसान पहुंचा सकती है।

२. आश्चर्यजनक रूप से इस घटना की दृश्य प्रकाशिय तस्वीर[Visible Light][निचे की तसवीर देखें] मे कोई झलक नही है। सौर ज्वाला की उपर दी गयी तस्वीर पराबैगनी फिल्टर से ली गयी है।

३.दृश्य प्रकाश की तस्वीर मे जो सूर्य धब्बे दिखायी दे रहे है वे पराबैंगनी फिल्टर वाली तस्वीर मे ज्यादा मुखर है।

सूर्य धब्बे

सूर्य धब्बे

सूर्य का चुबंकिय क्षेत्र काफी जटिल होता है,  जिसमे चुंबकिय रेखायें महाकाय लूप बनाती है जो सूर्य की सतह से निकल कर कुछ दूरी पर सतह पर वापिस आ जाती है। सूर्य धब्बे वह क्षेत्र होते है जहां चुंबिकिय शक्ति ज्यादा होती है। इसके कारण गैस सूर्य की सतह से उपर उठकर वापिस निचे नही आ पाती और गैस के पैकेट निचे से उबलते हुये सतह पर आते है और थोड़े ठन्डे हो जाते है। ये थोड़े ठन्डे क्षेत्र गहरे होने के कारण धब्बो के जैसे दिखते है। लेकिन पराबैंगनी फिल्टर से चुबंकिय उर्जा आसानी से देखी जा सकती है।
ये तस्वीरे दर्शाती है कि आकाश मे जो भी कुछ हो रहा है वह सारा का सारा हमे दिखायी नही देता। हमारी समझ सदियो के निरिक्षण का परिणाम है लेकिन पिछले कुछ दशको मे हमारी दृष्टी मे वह प्रकाश भी शामिल हुआ है जो हमारी आंखे नही देख पाती।

ब्रम्हाण्डिय पुष्प

In अंतरिक्ष, निहारीका on दिसम्बर 6, 2010 at 11:37 पूर्वाह्न

आईरीश निहारिका

आईरीश निहारिका

नाजूक ब्रम्हाण्डीय पंखुड़ीयो की तरह यह खगोलीय धूल और गैस का बादल १३०० प्रकाशवर्ष दूर सेफियस नक्षत्रमंडल मे पुष्पित हो रहा है ! इसे इण्द्रधनुष की ग्रीक देवी के नाम पर आइरीस निहारिका कहा जाता है। वैसे इसका नाम NGC 7023 है। यह पुष्पो के जैसे दिखने वाली अकेली निहारिका नही है लेकिन इस खूबसूरत तस्वीर मे आइरीस नेबुला के विभिन्न रंगो और संतुलन को प्रभावी तरिके से देखा जा सकता है।

इस निहारिका मे निहारिकिय पदार्थ एक गर्म और नवीन तारे को घेरे हुये है। इस निहरिका का मुख्य रंग निला है जो इस निहारिका के धुलिकणो द्वारा परावर्तित रंग है। इस निहारिका के केन्द्रिय तंतु हल्की लालिमा दिखाते है जो कि कुछ धुलिकणो द्वारा तारे की अदृश्य पराबैगणी किरणो को दृश्य लाल किरणो के रूप  मे परिवर्तन है।

अवरक्त (Infra red) निरिक्षण संकेत देते है कि इस निहारिका मे जटिल कार्बन के अणु हो सकते है, जिन्हे पालीसायक्लिक अरोमैटिक हायड़्रोकार्बन कहते है। इस चित्र मे दर्शित निला हिस्सा छः प्रकाशवर्ष की चौड़ाई मे है।

तस्वीर  कापीराईट(Copyright) : Daniel LópezIAC

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