मानव इतिहास का सबसे सफल अभियान :वायेजर २

वायेजर २ यह एक मानव रहित अंतरग्रहीय शोध यान था जिसे वायेजर १ से पहले २० अगस्त १९७७ को प्रक्षेपित किया गया था।

यह अपने जुड़वा यान वायेजर १ के जैसा ही है, लेकिन वायेजर १ के विपरित इसका पथ धीमा है। इसे धीमा रखकर इसका पथ युरेनस और नेपच्युन तक पहुचने के लिये अभिकल्पित किया गया था। शनि के गुरुत्वाकर्षण के फलस्वरूप यह युरेनस की ओर धकेल दिया गया था जिससे यह यान वायेजर १ की तरह टाईटन चन्द्रमा को नही देख पाया था। लेकिन यह युरेनस और नेपच्युन तक पहुंचने वाला पहला यान बन गया था, इस तरह मानव का एक विशेष ग्रहीय परिस्थिती के दौरान जिसमे सभी ग्रह एक सरल रेखा मे आ जाते है;महा सैर (Grand Tour) का सपना पूरा हुआ था। यह विशेष स्थिती हर १७६ वर्ष पश्चात उतपन्न होती है।

वायेजर २ का पथ

वायेजर २ यह सबसे ज्यादा सुचनाये प्राप्त करने वाला शोध यान है, जिसने चार ग्रह और उनके अनेको चन्द्रमाओ की अपने शक्तिशाली कैमरो और उपकरणो के साथ यात्रा की है। जबकि इस यान पर खर्च हुआ धन अन्य विशेष शोध यानो जैसे गैलेलीयो या कासीनी-हायगेन्स की तुलना मे काफी कम है।

यह यान मूलतः मैरीनर कार्यक्रम के यान मैरीनर १२ के रूप मे बनाया गया था। इसे २० अगस्त १९७७ को केप केनर्वल फ्लोरीडा से टाईटन ३इ सेन्टार राकेट से प्रक्षेपित किया गया था।

वायेजर २ का प्रक्षेपण

गुरू की सैर
९ जुलाई १९७९ को वायेजर गुरु के सबसे समिप ५७०,००० किमी की दूरी पर था। इस यान ने गुरू के कुछ वलयो की खोज की। इसने गुरू के चन्द्रमा आयो की तस्वीरे ली और उसपर एक सक्रिय ज्वालामुखी का पता लगाया। पहली बार किसी अंतरिक्ष पिंड पर ज्वालामुखी का पता चला था।
गुरू सौरमंडल का सबसे बडा़ ग्रह है, जो मुख्यतः हायड्रोजन और हीलीयम से बना है, कुछ मात्रा मे मिथेन,अमोनिया, जल भाप, अन्य यौगीको के अल्प मात्रा भी है। इसके केन्द्र मे द्रव अवस्था मे पत्त्थर और बर्फ है। इसके अक्षांसो पर बने रंगीन पट्टे, वातावरण मे बादल और तुफान इस ग्रह के हमेशा बदलने वाले मौसम के बारे मे बताते है। इस महाकाय ग्रह के अब तक ज्ञात चन्द्रमाओ की संख्या ६३ तक पहुंच चूकी है। यह ग्रह सूर्य की ११.८ वर्ष मे और खुद की परिक्रमा ९ घण्टे ५५ मिनिट मे करता है। अंतरिक्ष विज्ञानी इस ग्रह का आंखो से और दूरबीन से सदियो से निरिक्षण करते आ रहे है लेकिन वे वायेजर २ द्वारा प्रदान की गयी अनेको सूचनाओ से आश्चर्य चकित रह गये थे।
इस ग्रह पर स्थित विशाल लाल धब्बा एक महाकाय तुफान है जो घडी़ के कांटो की विपरीत दिशा मे घूम रहा है। इस ग्रह पर कई अन्य छोटे तुफान भी पाये गये।
आयो चन्द्रमा पर पाया गया सक्रिय ज्वालामुखी यह सबसे ज्यादा अनपेक्षित खोज थी। इस ज्वालामुखी से निकलने वाला लावा और धुंवा सतह से ३०० किमी तक जाता है। वायेजर २ ने इस ज्वालामुखी से उत्सर्जीत पदार्थ की अधिकतम गति १ किमि प्रति सेकंड तक मापी थी। आयो के ज्वालामुखी इस चन्द्रमा पर ज्वारीय प्रभाव के कारण होने वाली उष्णता के कारण है। आयो अपनी कक्षा से समिओ के चन्द्रमा युरोपा और गीनीमेड के कारण भटकता है लेकिन गुरू का गुरुत्व उसे वापिस अपनी कक्षा मे ला देता है। इस रस्साकसी के चलते आयो पर १०० मीटर उंचा ज्वार आता है। ध्यान दें कि पृथ्वी पर आनेवाला ज्वार सिर्फ १ मीटर उंचा रहता है।
आयो के इस ज्वालामुखी का प्रभाव सम्पूर्ण गुरू मंडल(गुरू और उसके चन्द्रमा) पर पडा़ है। ये ज्वालामुखी गुरू के चुंबकिय क्षेत्र मे पाये जाने वाले पदार्थ का मुख्य श्रोत है। इस ज्वालामुखी से उत्सर्जीत पदार्थ गंधक(सल्फर),आक्सीजन, सोडीयम गुरू से लाखो किमी दूर तक पाये गये हैं।
वायेजर १ द्वारा ली गयी युरोपा की तस्वीरो मे एक दूसरे को काटती रेखाओ जैसी संरचनाओ का पता चला था। प्रारंभ मे विज्ञानीयो को ये भूकंप द्वारा निर्मीत गहरी दरारे जैसी प्रतित हुयी थी। वायेजर २ द्वारा ली तस्वीरो ने इस रहस्य को और गहरा कर दिया। एक विज्ञानी के अनुसार ये किसी पेन द्वारा खींची गयी रेखाये जैसी है। संभावना है कि ज्वारीय प्रभाव की उष्णता के कारण युरोपा आंतरिक रूप से सक्रिय है, ये ज्वारीय प्रभाव आयो की तुलना मे दहाई है। युरोपा का भूपृष्ठ पतला है लगभग ३० किमी मोटी बर्फ से बना है, जो शायद ५० किमी गहरे समुद्र पर तैर रही है।
गीनीमेड सौरमंडल का सबसे बड़ा चन्द्रमा है, जिसका व्यास ५,२७६ किमी है। इसकी सतह पर दो तरह के मैदान दिखायी दिये है एक क्रेटर से भरा हुआ है दूसरा पहाड़ो से। विज्ञानीयो को इससे प्रतित होता है कि गीनीमेड का बर्फीला भूपृष्ठ सर्वत्र व्याप्त विवर्तनिक प्रक्रियाओ से उतपन्न तनाव से प्रभावित है।
कैलीस्टो का भूपृष्ठ काफी पूराना और उल्कापातो से बने क्रेटरो से भरा पड़ा है। सबसे बड़ा क्रेटर बर्फ से भर गया है।
गुरू के आसपास एक धूंधला और पतला वलय पाया गया है, जिसका बाहरी व्यास १२९,००० किमी और चौडा़ई ३०,००० की मी है। दो नये चन्द्रमा एड्रास्टी और मेटीस इस वलय से ठीक बाहर की ओर पाये गये। एक तीसरा नया चन्द्रमा थेबे ,अमाल्था और आयो के बीच मे पाया गया।
गुरू के वलय और चन्द्रमा गुरू के चुंबकिय प्रभाव के जाल मे फंसे एक घने इलेक्ट्रान और आयन के एक बड़े विकीरण पट्टे के मध्य है। ये कण और चुंबकिय क्षेत्र एक जोवीयन चुंबकिय वातावरण बनाते है जो कि सूर्य की ओर ३० लाख से ७० लाख किमी तक और शनि की ओर ७५०० लाख किमी तक विस्तृत है।
यह चुंबकिय वातावरण गुरु के साथ ही घुर्णन करता है, यह वातावरण आयो से हर सेकंड १ टन पदार्थ उड़ा ले जाता है। यह पदार्थ एक अंगूठी की शक्ल मे आयनो का एक बाद्ल बनाता है जो पराबैंगनी किरणो मे चमकता है। इस वलय मे भारी आयन बाहर की तरफ जाते है, जिसके दबाव से जोवीयन चुंबकिय क्षेत्र अपेक्षित आकार से दूगना फैल जाता है।
आयो इस चुंबकिय क्षेत्र मे परिक्रमा करते हुये एक विद्युत निर्माण संयत्र का कार्य करता है, इसके व्यास के साथ ४००,००० वोल्ट और ३० लाख एम्पीयर की विद्युत धारा प्रवाहीत होती है जो कि इस ग्रह के चुंबकिय क्षेत्र मे प्रभा का निर्माण करती है।

शनि की सैर
२५ अगस्त १९८१ को शनि के सबसे समीप आया था। शनि के पिछे रहते हुये वायेजर २ ने शनि के बाहरी वातावरण के तापमान और घन्तव का मापन किया। वायेजर ने बाहरी सतह पर  (७ किलो पास्कल) पर तापमान ७० केल्विन(-२०३ डीग्री सेल्सीयस) और अंदरूनी तह पर (१२० कीलो पास्कल) पर १४३(-१२० डीग्री सेल्सीयस) केल्विन तापमान पाया। उत्तरी ध्रुव पर तापमान १० केल्विन कम था, जो की मैसम के अनुसार बदल सकता है।

शनि

शनि का चन्द्रमा आयपेट्स

 

शनि का चन्द्रमा  एन्सेलडस

 

शनि का चन्द्रमा  टाईटन

शनि की सैर के बाद वायेजर २ चल दिया युरेनस की ओर
युरेनस की सैर
२४ जनवरी १९८६ को वायेजर २ युरेनस के निकट ८१,५०० किमी की दूरी पर पहुंचा। वायेजर ने युरेनस के १० नये चन्द्रमा ढुंढ निकाले। युरेनस के वातावरण का अध्यन किया और उसकी ९७.७७ डीग्री झुके अक्ष का मापन और वलयो का अध्यन किया।
युरेनस सौरमंडल का तीसरा सबसे बड़ा ग्रह है। यह सूर्य की परिक्रमा २.८ करोड़ किमी की दूरी से ८४ वर्षो मे करता है। युरेनस पर एक दिन १७ घंटे अ४ मिनिट का होता है।
युरेनस का अक्ष सूर्य की परिक्रमा प्रतल से ९० डीग्री अंश पर झुका हुआ है जो उसे अन्य सभी ग्रहो से अलग करता है। इस वजह से उसके ध्रुव लम्बे समय सूर्य के ठीक सामने और पिछे रहते है। सबसे आश्चर्य वाली खोज यह रही कि युरेनस का चुम्बकिय अक्ष घुर्णन अक्ष से ६० डीग्री का झुकाव लिये हुये है। युरेनस पर चुम्बकिय क्षेत्र की उपस्थिती वायेजर २ से पहले ज्ञात नही थी। इस क्षेत्र का प्रभाव पृथ्वी के बराबर ही है। युरेनस पर विकीरण का पटटा शनि के जैसा ही पाया गया।
वायेजर द्वारा खोजे गये नए १० चन्द्रमाओ के साथ युरेनस के कुल चन्द्रमाओ की संख्या १५ हो गयी। अधिकतर नये चन्द्रमा छोटे है, जिसमे से सबसे बडे़ का व्यास १५० किमी है।
मिरांडा नामक चन्द्रमा जो पांच बडे़ चन्द्रमाओ मे से सबसे अंदरूनी है, सौर मंडल का सबसे विचीत्र पिंड है। इस चन्द्र्मा पर २० किमी गहरी नहरे पायी गयी है जो भूगर्भीय हलचलो से बनी है। इसका भूपृष्ठ नये और पूराने का एक मिश्रण है। युरेनस के सभी पांच चन्द्रमा शनि के चन्द्र्माओ की तरह बर्फ और पत्थरो से बने है। इनमे से एरीयल सबसे चमकदार है, टाईटेनीया पर काफी बडी दरारे है, कैन्यान्स पर भूकंपीय घटनाओ के निशान है जबकि ओबेरान और अम्ब्रीयल पर भूकम्प कम या नही आते है।
युरेनस के नौ वलय है और ये वलय शनि और गुरू के वलय से अलग है। ये वलय काफी नये है , युरेनस की उम्र से इनकी उम्र काफी कम है। ये वलय किसी चन्द्रमा के टूट जाने से बने है।

युरेनस

युरेनस के वलय

नेपच्युन के ओर
२५ अगस्त १९८९ को वायेजर नेपच्युन के पास पहुंचा। इस यान ने नेपच्युन के चन्द्रमा ट्रीटान की भी सैर की।
इस यान ने नेपच्युन पर गुरू के विशाल लाल धब्बे के जैस विशाल गहरा धब्बा देखा। पहले इसे एक बादल समझा जाता था, लेकिन असल मे यह बादलो मे एक बड़ा छेद है।


नेपच्युन

नेपच्युन का चन्द्रमा ट्राईटन

सौर मंडल के बाहर: सूदूर अंतरिक्ष मे
वायेजर २ का ग्रहीय अभियान नेपच्युन के साथ खत्म हो गया था। अब यह अंतरखगोल अभियान मे तब्दिल हो गया है। वायेजर अभी भी हीलीयोस्फीयर के अंदर है। इस यान पर वायेजर १ की तरह एक सोने की ध्वनी चित्र वाली डीस्क रखी है। यह किसी अन्य बुद्धीमान सभ्यता के लिये पृथ्वीवासीयो का संदेश है। इस डीस्क पर पृथ्बी और उसके जीवो की तस्वीरे है।इस पर पृथ्वी पर की विभिन्न ध्वनीयां जैसे व्हेल की आवाज, बच्चे के रोने की आवाज, समुद्र के लहरो की आवाज है।
५ सीतम्बर २००६ को वायेजर सूर्य से ८० खगोलीय इकाई की दूरी पर था, इसकी गति एक वर्ष मे ३.३ खगोलीय ईकाई है। अभी यह प्लूटो से उसके सूर्य की दूरी के दूगनी दूरी पर स्थित है और सेडना से भी बाहर स्थित है। लेकिन अभी भी यह एरीस क्षुद्र ग्रह के पथ के अंदर है।
वायेजर २ २०२० तक पृथ्वी तक संकेत भेजता रहेगा।
उर्जा की बचत और इस यान का जिवन काल बढाने के लिये विज्ञानीयो ने इसके उपकरण क्रमशः बंद करने का निर्णय लिया है।
१९९८: स्केन प्लेटफार्म और पराबैंगनी निरिक्षण बंद कर दिया गया
२०१२ : इसके एंटीना को घुमाने की प्रक्रिया(Gyro Operation) बंद कर दिया जाएगा
२०१२ : DTR प्रक्रिया बंद कर दी जायेगी।
२०१६ : उर्जा को सभी उपकरण बांट कर उपयोग करेंगे।
२०२० : शायद उर्जा का उत्पादन बंद हो जायेगा

वायेजर श्रंखला इसके साथ समाप्त होती है, अगले लेख पायोनियर पर होंगे

वायेजर १ : अनजान राहो पर यात्री

वायेजर १ अंतरिक्ष शोध यान एक ८१५ किग्रा वजन का मानव रहित यान है जिसे हमारे सौर मंडल और उसके बाहर की खोज के के लिये ५ सितंबर १९७७ को प्रक्षेपित किया गया था। यह अभी भी(मार्च २००७) कार्य कर रहा है। यह नासा का सबसे लम्बा अभियान है। इस यान ने गुरू और शनि की यात्रा की है, यह यान इन महाकाय ग्रहो के चन्द्रमा की तस्वीरे भेजने वाला पहला शोध यान है।
वायेजर १ मानव निर्मित सबसे दूरी पर स्थित वस्तू है और यह पृथ्वी और सूर्य दोनो से दूर अंनत अंतरिक्ष की गहराईयो मे अनसुलझे सत्य की खोज मे गतिशील है। न्यु हारीजोंस शोध यान जो इसके बाद छोड़ा गया था, वायेजर १ की तुलना मे कम गति से चल रहा है इसलिये वह कभी भी वायेजर १ को पिछे नही छोड़ पायेगा।

वायेजर १ यान

१२ अगस्त २००६ के दिन वायेजर सूर्य से लगभग १४.९६ x १० ९ किमी दूरी पर स्थित था और इसतरह वह हीलीयोसेथ भाग मे पहुंच चूका है। यह यान समापन सदमा(टर्मीनेशन शाक) सीमा को पार कर चूका है। यह वह सीमा है जहां सूर्य का गुरुत्व प्रभाव खत्म होना शूरू होता है और अंतरखगोलीय अंतरिक्ष प्रभाव प्रारंभ हो जाता है। यदि वायेजर १ हिलीयोपाज को पार करने के बाद भी कार्यशील रहता है तब विज्ञानीयो को पहली बार अंतरखगोलीय माध्यम के सीधे मापे गये आंकड़े और दशा का पता चलेगा। इस दूरी से वायेजर १ से भेजे गये संकेत पृथ्वी तक पहुंचने मे १३ घंटे का समय लेते है। वायेजर १ एक हायपरबोलीक पथ पर जा रहा है ; इसने सौर मंडल के गुरुत्व से बाहर जाने योग्य गति प्राप्त कर ली है। वायेजर १ अब सौर मंडल मे कभी वापिस नही आयेगा। इस स्थिती मे पायोनियर १०, पायोनियर ११, वायेजर २ भी है।

वायेजर पथ

वायेजर १ का प्राथमिक अभियान उद्देश्य गूरू और शनि ग्रह, उनके चन्द्रमा और वलय का निरिक्षण था; अब उसका उद्देश्य हीलीयोपाज की खोज, सौर वायू तथा अंतरखगोलीय माध्यम के कणो का मापन है। अंतरखगोलीय माध्यम यह हायड्रोजन और हिलीयम के कणो का मिश्रण है जो अंत्यंत कम घनत्व की स्थिती मे सारे ब्रम्हांड मे फैला हुआ है। वायजर यान दोनो रेडीयोधर्मी बिजली निर्माण यंत्र से चल रहे है और अपने निर्धारीत जिवन काल से कहीं ज्यादा कार्य कर चूके है। इन यानो की उर्जा निर्माण क्षमता इन्हे २०२० तक पृथ्वी तक संकेत भेजने मे सक्षम रखने के लिये पर्याप्त है।
वायेजर १ को मैरीनर अभियान के मैरीनर ११ यान की तरह बनाया गया था। इसकी अभिकल्पना इस तरह से की गयी थी कि यह ग्रहो के गुरुत्वाकर्षण की सहायता से कम इंधन का प्रयोग कर यात्रा कर सके। इस तकनिक के तहत ग्रहो के गुरुत्वाकर्षण के प्रयोग से यान की गति बढायी जाती है। एक संयोग से इस यान के प्रक्षेपण का समय महा सैर (Grand Tour) के समय से मेल खा रहा था, सौर मंडल के ग्रह एक विशेष स्थिती मे एक सरल रेखा मे आ रहे थे। इस विशेष स्थिती के कारण कम से कम इंधन का उपयोग कर ग्रहो के गुर्त्वाकर्षण के प्रयोग से चारो महाकाय गैस पिंड गुरू, शनि, नेप्च्युन और युरेनस की यात्रा की जा सकती थी। बाद मे इस यान को महा सैर पर भेजा जा सकता था। इस विशेष स्थिती के कारण यात्रा का समय भी ३० वर्षो से घटकर सिर्फ १२ वर्ष रह गया था।
५ सितंबर १९७७ को नासा के केप कार्नीवल अंतरिक्ष केन्द्र से टाइटन ३ सेन्टार राकेट द्वारा वायेजर १ को वायेजर २ से कुछ देर बाद छोड़ा गया। वायेजर १ को वायेजर २ के बाद छोड़ा गया था लेकिन इसका पथ वायेजर २ की तुलना मे तेज रखा गया था जिससे वह गुरू और शनि पर पहले पहुंच सके।

वायेजर १ का प्रक्षेपण

गुरू की सैर

वायेजर १ ने गुरू की तस्वीरे जनवरी १९७९ मे लेना प्रारंभ किया। यह ५ मार्च १९७० को गुरू से सबसे न्युनतम दूरी(३४९,००० किमी) पर था। इस यान ने गुरू, उसके चन्द्रमा और वलय की अत्याधिक रीजाल्युशन वाली तस्वीरे खींच कर पृथ्वी पर भेजी। इस यान द्वारा गुरू के चुंबकिय क्षेत्र, विकीरण का भी अध्यन किया। अप्रैल १९७९ मे इसका गुरू अभियान खत्म हुआ।
वायजर यानो ने गुरू और उसके चन्द्रमाओ की अत्यंत महत्वपूर्ण खोजे की। सबसे ज्यादा आश्च्यर्य जनक खोजो मे से एक आयो पार चन्द्रमा पर ज्वालामुखी की खोज थी। इस ज्वालामुखी की खोज पायोनियर १० और ११ द्वारा भी नही की जा सकी थी।

गुरू का महाकाय लाल धब्बा

 

गुरू के चन्द्रमा आयो पर ज्वालामुखी से लावे का प्रवाह

 

गुरू की सतह का एक चित्र

गुरू के चन्द्रमा केलीस्टो पर बना एक क्रेटर

शनि की ओर
गुरू के गुरुत्वाकर्षण ने वायेजर को शनि की ओर धकेल दिया था। शनि के पास वायेजर नवंबर १९८० मे पहुंचा और १२ नवंबर को वायजर १ शनि से सबसे न्युनतम दूरी (१२४,००० किमी) पर था। इस यान ने शनि की कठीन वलय सरंचना का अध्यन किया और ऐसी अनेक खोजे की जिसके बारे मे हम पहले नही जानते थे। इस यान ने शनि के खूबसूरत चन्द्रमा टाईटन का और उसके घने वातावरण का भी अध्यन किया। टाईटन के गुरुत्व का प्रयोग कर यह यान शनि से दूर अपने पथ पर आगे बढ़ गया।

शनि

 

शनि के चन्द्रमा टाइटन पर छाया कुहरा

शनि के चन्द्रमा टाइटन पर छाया कुहरा

शनि का f वलय

अंतरखगोलीय यात्रा
उर्जा की बचत और इस यान का जिवन काल बढाने के लिये विज्ञानीयो ने इसके उपकरण क्रमशः बंद करने का निर्णय लिया है।

  • २००३ मे : स्केन प्लेटफार्म और पराबैंगनी निरिक्षण बंद कर दिया गया
  • २०१० : इसके एंटीना को घुमाने की प्रक्रिया(Gyro Operation) बंद कर दिया जाएगा
  • २०१० : DTR प्रक्रिया बंद कर दी जायेगी।
  • २०१६ : उर्जा को सभी उपकरण बांट कर उपयोग करेंगे।
  • २०२० : शायद उर्जा का उत्पादन बंद हो जायेगा

हीलीयोपाज
वायेजर १ अंतरखगोलीय अंतरिक्ष की ओर गतिशील है और उसके उपकरण सौर मंडल के अध्यन मे लगे हुये है। जेट प्रोपल्शन प्रयोगशाला मे विज्ञानी वायेजर १ और २ पर प्लाजमा तरंग प्रयोगो से हीलीयोपाज की खोज कर रहे हैं।
जान हापकिंस विश्वविद्यालय की भौतिकी प्रयोगशाला के विज्ञानियो का मानना है कि वायेजर १ फरवरी २००३ मे समापन सदमा(टर्मीनेशन शाक) सीमा पार कर गया।
कुछ अन्य विज्ञानियो के अनुसार वायेजर १ ने टर्मीनेशन शाक सीमा दिसंबर २००४ मे पार की है। लेकिन विज्ञानी इस बात पर सहमत है कि वायेजर अब हीलीयोसेथ क्षेत्र मे है और २०१५ मे हीलीयोपाज तक पहुंच जायेगा।

वायेजर १ हीलीयोसेथ मे प्रवेश करते हुये

आज की स्थिती
१२ अगस्त २००६ की स्थिती के अनुसार वायेजर सूर्य से १०० खगोलीय ईकाई की दूरी पर है। यह किसी भी ज्ञात प्राकृतिक सौर पिंड से भी दूर है, सेडना ९०३७७ भी आज की स्थिती मे सूर्य से ९० खगोलिय इकाई की दूरी पर है।
वायेजर १ से आने वाले संकेत जो प्रकाश गति से यात्रा करते है पृथ्वी तक पहुंचने मे १३.८ घंटे ले रहे है। तुलना के लिये चन्द्रमा पृथ्वी से १.४ प्रकाश सेकंड दूरी पर, सूर्य ८.५ प्रकाश मिनिट दूरी पर और प्लूटो ५.५ प्रकाश घंटे की दूरी पर है।

नवंबर २००५ मे यह यान १७.२ किमी प्रति सेकंड की गति से यात्रा कर रहा था जो कि वायेजर २ से १०% ज्यादा है। यह किसी विशेष तारे की ओर नही जा रहा है लेकिन आज से ४०००० वर्ष बाद केमीलोपार्डीस(Camelopardis) तारामंडल के तारे AC ७९३८८८ से १.७ प्रकाश वर्ष की दूरी से गुजरेगा।

सौरमंडल की सीमायें

सौरमंडल यह सूर्य और उसकी परिक्रमा करते ग्रह, क्षुद्रग्रह और धूमकेतुओ से बना है। इसके केन्द्र मे सूर्य है और सबसे बाहरी सीमा पर नेप्च्युन ग्रह है। नेपच्युन के परे प्लुटो जैसे बौने ग्रहो के अलावा धूमकेतु भी आते है।
हीलीयोस्फियर (heliosphere)
हमारा सौरमंडल एक बहुत बड़े बुलबुले से घीरा हुआ है जिसे हीलीयोस्फियर कहते है।हीलीयोस्फीयर यह सौर वायू द्वारा बनाया गया एक बूलबूला है, इस बूलबूले के अंदर सभी पदार्थ सूर्य द्वारा उत्सर्जित हैं।वैसे इस बुलबुले के अंदर हीलीयोस्फीयर के बाहर से अत्यंत ज्यादा उर्जा वाले कण प्रवेश कर सकते है!

सौर वायू यह किसी तारे के बाहरी वातावरण द्वारा उत्सर्जीत आवेशीत कणो की एक धारा होती है। सौर वायू मुख्यतः अत्याधिक उर्जा वाले इलेक्ट्रान और प्रोटान से बनी होती है, इनकी उर्जा किसी तारे के गुरुत्व प्रभाव से बाहर जाने के लिये पर्याप्त होती है। सौर वायू सूर्य से हर दिशा मे प्रवाहित होती है जिसकी गति कुछ सौ किलोमीटर प्रति सेकंड होती है। सूर्य के संदर्भ मे इसे सौर वायू कहते है, अन्य तारो के संदर्भ मे इसे ब्रम्हांड वायू कहते है।

सूर्य से कुछ दूरी पर प्लुटो से काफी बाहर सौर वायु खगोलिय माध्यम के प्रभाव से धीमी हो जाती है। यह प्रक्रिया कुछ चरणो मे होती है। खगोलिय माध्यम यह हायड्रोजन और हिलीयम से बना हुआ है और सारे ब्रम्हांड मे फैला हुआ है। यह एक अत्याधिक कम घनत्व वाला माध्यम है।

  1. सौर वायू सुपर सोनिक गति से धीमी होकर सबसोनिक गति मे आ जाती है, इस चरण को टर्मीनेशन शाक(Termination Shock) या समापन सदमा कहते है।
  2. सबसोनिक गति पर सौर वायु खगोलिय माध्यम के प्रवाह के प्रभाव मे आ जाती है। इस दबाव से सौर वायू धूमकेतु की पुंछ जैसी आकृती बनाती है जिसे हीलीयोशेथ(Helioseath) कहते है।
  3. हीलीयोशेथ की बाहरी सतह जहां हीलीयोस्फियर खगोलीय माध्यम से मिलता है हीलीयोपाज(Heliopause) कहलाती है।
  4. हीलीयोपाज क्षेत्र सूर्य के आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमा के दौरान खगोलीय माध्यम मे एक खलबली उतपन्न करता। यह खलबली वाला क्षेत्र जो हीलीयोपाज के बाहर है बौ शाक (Bow Shock) या धनुष सदमा कहलाता है।

सौर मण्डल और उसकी सीमाये(पूर्णाकार के लिये चित्र पर क्लीक करें) 

सौर मंडल की सीमाओ मे सबसे अंदरूनी सीमा है ‘टर्मीनेशन शाक(Termination shock)’  या समापन सदमा, इसके बाद आती है हीलीयोपाज(Heliopause) और अंत मे ‘बौ शाक(bow shock)’ या धनुष सदमा।

टर्मीनेशन शाक
खगोल विज्ञान मे टर्मीनेशन शाक यह सूर्य के प्रभाव को सीमीत करने वाली बाहरी सीमा है। यह वह सीमा है जहां सौर वायु के बुलबुलो की स्थानिय खगोलिय माध्यम के प्रभाव से कम होकर सबसोनिक(Subsonic) गति तक सीमीत हो जाती है। इससे संकुचन , गर्म होना और चुंबकिय क्षेत्र मे बदलाव जैसे प्रभाव उतपन्न होते है। यह टर्मीनेशन शाक क्षेत्र सूर्य से ७५-९० खगोलीय इकाई की दूरी पर है।(१ खगोलिय इकाई= पृथ्वी से सूर्य की दूरी)। टर्मीनेशन शाक सीमा सौर ज्वाला के विचलन के अनुपात मे कम ज्यादा होते रहती है।
समापन सदमा या टर्मीनेशन शाक की उतपत्ती का कारण तारो ने निकलते वाली सौर वायू के कणो की गति (४०० किमी /सेकंड) से ध्वनी की गति (०.३३ किमी/सेकंड) मे परिवर्तन है। खगोलिय माध्यम जिसका घनत्व अत्यंत कम होता है और उसपर कोई विशेष दबाव नही होता है ;वही सौर वायू का दबाव उसे उतपन्न करने वाले तारे की दूरी के वर्गमूल के अनुपात मे कम होती है। जैसे सौर वायु तारे से दूर जाती है एक विशेष दूरी पर खगोलिय माध्यम का दबाव सौर वायु के दबाव से ज्यादा हो जाता है और सौर वायु के कणो की गति को कम कर देता है जिससे एक सदमा तरंग(Shock Wave) उत्पन्न होती है।

सूर्य से बाहर जाने पर टर्मीनेशन शाक के बाद एक और सीमा आती है जिसे हीलीयोपाज कहते है। इस सीमा पर सौर वायू के कण खगोलीय माध्यम के प्रभाव मे पूरी तरह से रूक जाते है। इसके बाद की सीमा धनुष सदमा (बौ शाक-bow shock) है जहां सौरवायु का आस्तित्व नही होता है।

वैज्ञानिको का मानना है कि शोध यान वायेजर १ दिसंबर २००४ मे टर्मीनेशन शाक सीमा पार कर चूका है, इस समय वह सूर्य से ९४ खगोलीय इकाई की दूरी पर था। जबकि इसके विपरीत वायेजर २ ने मई २००६ मे ७६ खगोलिय इकाई की दूरी पर ही टर्मीनेशन शाक सीमा पार करने के संकेत देने शूरू कर दिये है। इससे यह प्रतित होता है कि टर्मीनेशन शाक सीमा एक गोलाकार आकार मे न होकर एक अजीब से आकार मे है।

हीलीयोशेथ
हीलीयोशेथ यह टर्मीनेशन शाक और हीलीयोपाक के बीच का क्षेत्र है। वायेजर १ और वायेजर अभी इसी क्षेत्र मे है और इसका अध्यन कर रहे हैं। यह क्षेत्र सूर्य से ८० से १०० खगोलीय दूरी पर है।

हीलीयोपाज
यह सौर मंडल की वह सीमा है जहां सौरवायू खगोलीय माध्यम के कणो के बाहर धकेल पाने मे असफल रहते है। इसे सौरमंडल की सबसे बाहरी सीमा माना जाता है।

बौ शाक
हीलीयोपाज क्षेत्र सूर्य के आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमा के दौरान खगोलीय माध्यम मे एक खलबली उतपन्न करता। यह खलबली वाला क्षेत्र जो हीलीयोपाज के बाहर है बौ शाक या धनुष सदमा कहलाता है।

वायेजर : सूदूर अंतरिक्ष का एकाकी यात्री

वायेजर कार्यक्रम मे दो मानवरहित वैज्ञानिक शोध यान वायेजर १ और वायेजर २ शामील है। इन दोनो अंतरिक्ष यानो १९७७ मे १९७० के दशक के अंत की अनुकूल ग्रहीय दशा का लाभ लेने के लिये प्रक्षेपित किया गया था। इन दोनो यानो को तो ऐसे गुरू और शनि के अध्यन के लिये भेजा गया था, लेकिन दोनो यान सौर मंडल के बाहरी हिस्से के अध्यन का अभियान जारी रखे हुये है। ये अपने अभियान मे अग्रसर है और भविष्य मे सौर मंडल से बाहर चले जायेंगे।

वायेजर का पथ

दोनो अभियानो ने गैस के महाकाय पिंडो (गुरू, शनि, युरेनस, नेपच्युन) के बारे बडी़ मात्रा मे आंकड़े जमा किये है। इस आंकड़ो मे से काफी ज्यादा सुचनाये इसके पहले अज्ञात थी। इसके अलावा इन यानो का पथ इस तरह से अभिकल्पित किया गया है कि यह प्लुटो के बाद के किसी कल्पित  ग्रह का पता लगा सके।
वायेजर असल मे १९६० के दशक के अंत मे और १९७० के दशक की शुरुवात मे बनाये गये महा सैर(Grand Tour) नामके एक कार्यक्रम का संक्षिप्त रूप है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत दो शोध यानो को बाहरी ग्रहो के पास से गुजरना था, लेकिन बजट की कमी से इस कार्यक्रम को छोटा कर दिया गया। लेकिन वायेजर कार्यक्रम ने इस महासैर कार्यक्रम के प्लुटो को छोड़कर बाकि सभी उद्देश्यो को पूरा किया। प्लुटो उस समय एक ग्रह माना जाता था।
१९९० के दशक मे वायेजर १ पायोनीयर १० को पिछे छोड़कर अंतरिक्ष मे सबसे दूरी पर स्थित मानव निर्मित पिंड बन गया था। वायेजर १ यह रिकार्ड अगले कई दशको तक बनाये रखेगा। हाल ही मे छोड़ा गया न्यु हारीजोंस यान इसे पिछे नही छोड़ पायेगा क्योंकि उसकी गति वायेजर १ से काम है। वायेजर १ और पायोनीयर १० दोनो मानव निर्मित एक दूसरे से सबसे ज्यादा दूरी पर स्थित पिंड भी है क्योंकि ये सूर्य की दो विपरित दिशाओ मे यात्रा कर रहे हैं।

 

वायेजर यान

इन दोनो यानो से एक नियमित अंतराल के बाद संपर्क साधा जाता रहा है। यानो के रेडीयोधर्मिक उर्जा श्रोत अभी भी बिजली निर्माण कर रहे है। आशा है कि ये यान सौरमंडल के सबसे बाहरी हिस्से हिलीयोपास की खोज कर पाने मे सफल होंगे। २००३ के अंत मे वायेजर १ ने ऐसे संकेत भेजने शुरू कर दिये थे जिससे यह प्रतित होता है कि उसने टर्मिनेशन शाक को पार कर लिया है। लेकिन इस खोज पर विवाद है। अब यह माना जाता है कि वायेजर १ ने टर्मीनेशन शाक को दिसंबर २००४ मे पार किया है।

वायेजर यान हेलीयोसीथ हिस्से मे प्रवेश करते हुये

वायेजर यानो की संरचना
ये यान तीन अक्षो वाले यान है जो पृथ्वी की तरफ अपने एंटीना को रखने के लिये खगोलिय निर्देशीत अक्ष नियंत्रण प्रणाली का उपयोग करते है। मुख्य अभियान के वैज्ञानिक यंत्रो की संख्या १० थी जिसमे से ५ अभी भी काम कर रहे है।
फ़्लाईट डाटा सबसीस्टम (FDS) और ८ ट्रेकोवाला डीजीटल टेप रिकार्डर(DTR) आकंड़े जमा करने का कार्य कर रहे हैं। FDS यह हर उपकरण को निर्देश देने और नियंत्रण का कार्य करता है। वह इन उपकरणो से आंकड़े प्राप्त कर पृथ्वी की ओर प्रसारण के लिये तैयार करता है। DTR इन आंकड़ो को प्लाज्मा वेव सबसीस्टम (PWS) के रूप मे रीकार्ड करता है जिसे हर छः महीने बाद पृथ्वी पर भेजा जाता है।
तस्वीरे लेने के लिये इन यानो मे दो कैमरे लगे हुये है। इन कैमरो मे चक्र के आकार मे ८ फिल्टर लगे हुये है। एक कैमरा का लेंस २०० मीमी का है जबकि दूसरे कैमरे का लेंस १५०० मीमी का है। ये कैमरे बाकि यंत्रो की तरह स्वचालित नही है, इन्हे FDS द्वारा प्राप्त आंकड़ो के आधार पर एक कम्प्युटर संचालित करता है।

यान के नियंत्रण के लिये एक कम्प्युटर लगा हुआ है जिसे कम्प्युतर कमांड सबसीस्टम (CCS) कहते है। CCS कुछ निश्चीत प्रक्रियाये जैसे निर्देशो का पालन, पथ प्रदर्शन , एंटीना की स्थिती बदलने जैसे कार्य करता है।

बिजली निर्माण के लिये यान मे दो रेडीयोधर्मिक विद्युत निर्माण ईकाईयां लगी हुयी है जो की प्लुटोनियम का प्रयोग करती है। यान के प्रक्षेपण के समय ये ३० वोल्ट की ४०० वाट उर्जा का उत्पादन करते थे। अगस्त २००६ मे वायजर १ की उर्जा निर्माण क्षमता गीरकर २९० वाट और वायेजर २ की क्षमता गीरकर २९१ वाट रह गयी है।

बिजली निर्माण की क्षमता मे लगातार होती जा रही कमी के कारण इन यानो के उपकरणो को एक के बाद एक बंद करना पढा़ है। ऐसी उम्मीद है कि २०२० तक सभी उपकरण बंद हो जायेंगे। लेकिन इससे यान रूकेंगे नही, पृथ्वी पर आंकड़े भेजना बंद कर देंगे लेकिन यान अपनी मृत अवस्था मे अपनी अनंत यात्रा जारी रखेंगे।

विभिन्न यानो की वर्तमान स्थिती(अक्टूबर २००६)

वायजर १ और वायेजर २ मे एक सोने का रिकार्ड रखा हुआ है जो पृथ्वी की तस्वीरे और आवाज रखे है। इसके साथे मे रीकार्ड को बजाने के लिये संकेत भी बनाये हुयी है। पृथ्वी की दिशा दर्शाता हुआ एक मानचित्र भी रखा हुआ है। यह किसी अन्य बुद्धीमान सभ्यता द्वारा इस यान को पाने कि स्थिती मे उनके लिये पृथ्वी से मित्रता का संदेश है।

अगले अंक मे वायेजर १  !

शनि और उसके वलय अपनी पूरी छटा मे

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यह तस्वीर पृथ्वी से नही ली ज सकती। पृथ्वी से ली गयी तस्वीरो मे हम सिर्फ शनि का दायां हिस्सा और उसपर उसके वलयो की छाया ही देख पाते है। पृथ्वी शनि की तुलना मे सूर्य के काफी निकट है इसलिये पृथ्वी से शनि का दिन वाला हिस्सा ही दिखायी देता है। उपर दी गयी तस्वीर कासीनी अंतरिक्ष यान ने जनवरी २००७ मे ली है। कासीनी अंतरिक्ष यान अभी यानी मार्च २००७ मे शनि की परिक्रमा कर रहा है। शनि के सुंदर वलय अपनी पूरी छ्टा के साथ इस तस्वीर मे दिखायी दे रहे है। शनि पर उसके वलय की छाया भी दिखायी दे रही है।
तस्वीर को ध्यान से देखने पर दिन और रात की विभाजन रेखा पर बाद्ल भी दिखायी दे रहे हैं।

अपोलो अभियान

 अपोलो कार्यक्रम यह संयुक्त राज्य अमरीका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा की मानव उड़ानो की एक श्रंखला थ। इस मे सैटर्न राकेट और अपोलो यानो का प्रयोग किया गया था। यह श्रंखला उड़ान १९६१-१९७४ के मध्य मे हुयी थी। यह श्रंखला अमरीकी राष्ट्रपति जान एफ केनेडी के १९६० के दशक मे चन्द्रमा पर मानव के सपने को समर्पित थी। यह सपना १९६९ मे अपोलो ११ की उड़ान ने पूरा किया था।
यह अभियान १९७० के दशक के शुरुवाती वर्षो मे भी चलता रहा, इस कार्यक्रम मे चन्द्रमा पर छः मानव अवतरणो के साथ चन्द्रमा का वैज्ञानिक अध्यन कार्य किया गया। इस कार्यक्रम के बाद आज २००७ तक पृथ्वी की निचली कक्षा के बाहर कोई मानव अभियान नही संचालित किया गया है। बाद के स्कायलैब कार्यक्रम और अमरीकी सोवियत संयुक्त कार्यक्रम अपोलो-सोयुज जांच कार्यक्रम जिन्होने अपोलो कार्यक्रम के उपकरणो का प्रयोग किया था, इसी अपोलो कार्यक्रम का भाग माना जाता है।
बहुत सारी सफलताओ के बावजूद इस कार्यक्रम को दो बड़ी असफलताओ को झेलना पड़ा। इसमे से पहली असफलता अपोलो १ की प्रक्षेपण स्थल पर लगी आग थी जिसमे विर्गील ग्रीसम, एड व्हाईट और रोजर कैफी शहीद हो गये थे। इस अभियान का नाम AS२०४ था लेकिन बाद मे शहीदो की विधवाओं के आग्रह पर अपोलो १ कर दिया गया था। दूसरी असफलता अपोलो १३ मे हुआ भीषण विस्फोट था लेकिन इसमे तीनो यात्रीयों को सकुशल बचा लीया गया था।
इस अभियान का नाम सूर्य के ग्रीक देवता अपोलो को समर्पित था।

पृष्ठभूमी
अपोलो अभियान का प्रारंभ आइजनहावर के राष्ट्रपतित्व काल के दौरान १९६० के दशक की शुरूवात मे हुआ था। यह मर्क्युरी अभियान का अगला चरण था। मर्क्युरी अभियान मे एक ही अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी की निचली कक्षा मे सीमीत परिक्रमा कर सकता था, जबकि इस अभियान का उद्देश्य तीन अंतरिक्षयात्री द्वारा पृथ्वी की वृत्तीय कक्षा मे परिक्रमा और संभव होने पर चन्द्रमा पर अवतरण था।
नवंबर १९६० मे जान एफ केनेडी ने एक चुनाव प्रचार सभा मे सोवियत संघ को पछाड़ कर अंतरिक्ष मे अमरीकी प्रभूता साबित करने का वादा किया था। अंतरिक्ष प्रभूता तो राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न था लेकिन इसके मूल मे प्रक्षेपास्त्रो की दौड़ मे अमरीका के पिछे रहना था। केनेडी ने अमरीकी अंतरिक्ष कार्यक्रम को आवश्यक वित्तीय सहायता उपलब्ध करायी।
१२ अप्रैल १९६१ मे सोवियत अंतरिक्ष यात्री युरी गागरीन अंतरिक्ष मे जाने वाले प्रथम मानव बने; इसने अमरीका के मन मे अंतरिक्ष की होड़ मे पिछे रहने के डर को और बड़ा दिया। इस उड़ान के दूसरे ही दिन अमरीकी संसद की विज्ञान और अंतरिक्ष सभा की बैठक बुलायी गयी। इस सभा मे अमरीका के सोवियत से आगे बड़ने की योजनाओ पर विचार हुआ। सरकार पर अमरीकी अंतरिक्ष कार्यक्रम को तेजी से आगे बडाने के लिये दबाव डाला गया।
२५ मई  १९६१ को केनेडी ने अपोलो कार्यक्रम की घोषणा की। उन्होने १९६० के दशक के अंत से पहले चन्द्रमा पर मानव को भेजने की घोषणा की।
अभियान की शुरूवात
केनेडी ने एक लक्ष्ये दे दिया था, लेकिन इस मे मानव जिवन, धन, तकनिक की कमी और अंतरिक्ष क्षमता की कमी का एक बड़ा भारी खतरा था। इस अभियान के लिये निम्नलिखीत पर्याय थे
१. सीधी उडा़न : एक अंतरिक्षयान एक इकाई के रूप मे चन्द्रमा तक सीधी उड़ान भरेगा, उतरेगा और वापिस आयेगा। इसके लिये काफी शक्तिशाली राकेट चाहीये था जिसे नोवा राकेट का नाम दिया गया था।
२.पृथ्वी परिक्रमा केंद्रीत उडा़न: इस पर्याय मे दो सैटर्न ५ राकेट छोडे़ जाने थे, पहला राकेट अंतरिक्षयान को पृथ्वी की कक्षा के बाहर छोड़ने के बाद अलग हो जाता जबकि दूसरा राकेट उसे चन्द्रमा तक ले जाता।

सीधी उड़ान के लिये प्रस्तावित यान

३.चन्द्र सतह केंद्रीत उडा़न: इस पर्याय मे दो अंतरिक्ष यान एक के बाद एक छोडे़ जाते। पहला स्वचालित अंतरिक्षयान इंधन को लेकर चन्द्रमा पर अवतरण करता, जबकि दूसरा मानव अंतरिक्ष यान उसके बाद चन्द्रमा पर पहुंचता। इसके बाद स्वचालित अंतरिक्ष यान से इंधन मानव अंतरिक्षयान मे भरा जाता। यह मानव अंतरिक्षयान पृथ्वी पर वापिस आता।
चन्द्रमा कक्षा केंद्रीत अभियान : इस पर्याय मे एक सैटर्न राकेट द्वारा विभीन्न चरणो वाले अंतरिक्ष यान को प्रक्षेपित करना था। एक नियंत्रण यान चन्द्रमा की परिक्रमा करते रहता, जबकि चन्द्रयान चन्द्रमा पर उतरकर वापिस नियंत्रण यान से जुड़ जाता। अन्य पर्यायो की तुलना मे इस पर्याय मे चन्द्रयान काफी छोटा था जिससे चन्द्रमा की सतह से काफी कम द्रव्यमान वाले यान को प्रक्षेपित करना था।

१९६१ मे नासा के अधिकतर विज्ञानी सीधी उड़ान के पक्ष मे थे। अधिकतर अभियंताओ को डर था कि बाकि पर्यायो की कभी जांच नही की गयी है और अंतरिक्ष मे यानो का विच्छेदीत होना और पुनः जुड़ना एक खतरनाक और मुश्किल कार्य हो सकता है। लेकिन कुछ विज्ञानी जिसमे जान होबाल्ट प्रमुख थे, चन्द्रमा परिक्रमा केंद्रीत उडानो की महत्वपूर्ण भार मे कमी वाली योजना से प्रभावित थे। होबाल्ट ने सीधे सीधे इस कार्यक्रम के निदेशक राबर्ट सीमंस को एक पत्र लिखा। उन्होने इस पर्याय पर पूरा विचार करने का आश्वासन दिया।
इन सभी पर्यायो पर विचार करने के लिये गठित गोलोवीन समिती ने होबाल्ट के प्रयासो को सम्मान देते हुये पृथ्वी परिक्रमा केंद्रीत पर्याय और चन्द्रमा केन्द्रीत पर्याय दोनो के मिश्रीण वाली योजना की सीफारीश की। ११ जुलाई १९६२ को इसकी विधीवत घोषणा कर दी गयी।
अंतरिक्ष यान

अपोलो यान की संरचना(पूर्ण आकार के लिये चित्र पर क्लीक करें)

अपोलो अंतरिक्ष यान के तीन मुख्य हिस्से और दो अलग से छोटे हिस्से थे। नियंत्रण कक्ष(नियंत्रण यान) वह हिस्सा था जिसमे अंतरिक्ष यात्री अपना अधिकतर समय (प्रक्षेपण और अवतरण के समय भी)बीताने वाले थे। पृथ्वी पर सिर्फ यही हिस्सा लौटकर आने वाला था। सेवा कक्ष मे अंतरिक्षयात्रीयो के उपकरण, आक्सीजन टैंक और चन्द्रमा तक ले जाने और वापिस लाने वाला इंजन था। नियंत्रण और सेवा कक्ष को मिलाकर नियंत्रण यान बनता था।

चन्द्रमा की कक्षा मे नियंत्रणयान

चन्द्रयान चन्द्रमा पर अवतरण करने वाला यान था। इसमे अवरोह और आरोह चरण के इंजन लगे हुये थे जो कि चन्द्रमा पर उतरने और वापिस मुख्य नियंत्रण यान से जुड़ने के लिये काम मे आने वाले थे। ये दोनो इंजन भी नियंत्रण यान से जुड़ने के बाद मुख्य यान से अलग हो जाने वाले थे। इस योजना मे चन्द्रयान का अधिकतर हिस्सा रास्ते मे ही छोड़ दिया जानेवाला था, इसलिये उसे एकदम हल्का बनाया जा सकता था और इस योजना मे एक ही सैटर्न ५ राकेट से काम चल सकता था।

चन्द्रमा की सतह पर चन्द्र यान

चन्द्रमा पर अवतरण के अभ्यास के लिये चन्द्रमा अवतरण जांच वाहन(Lunar Landing Research Vehicle-LLRV) बनाया गया। यह एक उड़ान वाहन था जिसमे चन्द्रमा की कम गुरुत्व का आभास देने के लिये एक जेट इंजन लगाया गया था। बाद मे LLRV को LLTV(चन्द्रमा अवतरण प्रशिक्षण वाहन -Lunar Landing Training Vehicle) से बदल दिया गया।
अन्य दो महत्वपूर्ण थे LET और SLA। LET (aunch Escape Tower) यह नियंत्रण यान को प्रक्षेपण यान से अलग ले जाने के लिये प्रयोग मे लाया जाना था, वहीं SLA(SpaceCraft Lunar Module Adapter) यह अंतरिक्षयान को प्रक्षेपण यान से जोड़ने के लिये प्रयोग मे लाया जाना था।

इस अभियान मे सैटर्न 1B, सैटर्न ५ यह राकेट प्रयोग मे लाये जाने थे।

अभियान
अभियान के प्रकार

इस अभियान मे निम्नलिखीत तरह के अभियान प्रस्तावित थे।

  • A मानव रहित नियंत्रण यान जांच
  • B मानव रहित चन्द्रयान जांच
  • C मानव सहित नियंत्रण यान पृथ्वी की निचली कक्षा मे।
  • D मानव सहित नियंत्रण यान तथा चन्द्रयान पृथ्वी की निचली कक्षा मे।
  • E मानव सहित नियंत्रण यान तथा चन्द्रयान पृथ्वी की दिर्घवृत्ताकार कक्षा मे, अधिकतम दूरी ७४०० किमी।
  • F मानव सहित नियंत्रण यान तथा चन्द्रयान चन्द्रम की कक्षा मे।
  • G चन्द्रमा पर अवतरण
  • H चन्द्रमा की सतह पर कुछ समय के लिये रूकना
  • I चन्द्रमा की सतह पर उपकरणो से वैज्ञानिक प्रयोग करना
  • J चन्द्रमा की सतह पर लंबे समय के लिये रूकना

चन्द्रमा पर अवतरण से पहले की असली योजना काफी रूढीवादी थी लेकिन सैटर्न ५ की सभी जांच उड़ान सफल रही थी इसलिये कुछ अभियानो को रद्द कर दिया गया था। नयी योजना जो अक्टूबर १९६७ मे प्रकाशित हुयी थी के अनुसार  प्रथम मानव सहित नियंत्रण यान की उड़ान अपोलो ७ होना थी, इसके बाद चन्द्रयान और नियंत्रण यान के साथ सैटर्न १बी की उड़ान अपोलो ८ की योजना थी जो पृथ्वी की परिक्रमा करने वाला था। अपोलो ९ की उड़ान मे सैटर्न ५ राकेट पर नियंत्रण यान की पृथ्वी की परिक्रमा की योजना थी। इसके पश्चात अपोलो १० यह चन्द्रमा पर अवतरण की अंतिम रिहर्सल उड़ान होना थी।
लेकिन १९६८ की गर्मियो तक यह निश्चित हो गया था कि अपोलो ८ की उड़ान के लिये चन्द्रयान तैयार नही हो पायेगा। नासा ने तय किया कि अपोलो ८ को पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिये भेजने की बजाये चन्द्रमा की परिक्रमा के लिये भेजा जाये। यह भी माना जाता है कि यह बदलाव सोवियत संघ के चन्द्रमा परिक्रमा के अभियान झोंड(Zond) के डर से किया गया था। अमरिकी विज्ञानी इस बार सोवियत संघ से हर हाल मे आगे रहना चाहते थे।

चन्द्रमा से लाये गये नमुने
अपोलो अभियान ने कुल मिलाकर चन्द्रमा से ३८१.७ किग्रा पत्थर और अन्य पदार्थो के नमुने एकत्र कर के लाये थे। इसका अधिकांश भाग ह्युस्टन की चन्द्रप्रयोगशाला(Lunar Receiving Laboratory ) मे रखा है।

चन्द्रमा से लायी गयी एक चटटान

रेडीयोमेट्रीक डेटींग प्रणाली जांच से यह पाया गया है कि चन्द्रमा पर की चटटानो की उम्र पृथ्वी पर की चटटानो से कहीं ज्यादा है। उनकी उम्र ३.२ अरब वर्ष से लेकर ४.६ अरब वर्ष तक है। ये नमुने सौरमंडल निर्माण की प्राथमिक अवस्था के समय के है। इस अभियान मे पायी गयी एक महत्वपूर्ण चट्टान जीनेसीस है। यह चट्टान एक विशेष खनीज अनोर्थोसिटे की बनी है।

अपोलो एप्पलीकेशनस
अपोलो कार्यक्रम के बाद के कुछ अभियानो को अपोलो एप्पलीकेशनस नाम दिया गया था, इसमे पृथ्वी की परिक्रमा की ३० उड़ानो की योजना थी। इन अभियानो मे चन्द्रयान की जगह वैज्ञानीक उपकरणो को लेजाकर अंतरिक्ष मे प्रयोग किये जाने थे।
एक योजना के अनुसार सैटर्न १बी द्वारा नियंत्रण यान को प्रक्षेपित कर पृथ्वी की निचली कक्षा मे ४५ दिन तक रहना था। कुछ अभियानो मे दो नियंत्रण यान का अंतरिक्ष मे जुड़ना और रसद सामग्री की आपूर्ती की योजना थी। ध्रुविय कक्षा के लिये सैटर्न ५ की उड़ान जरूरी थी, लेकिन मानव उड़ानो द्वारा ध्रुविय कक्षा की उड़ान इसके पहले नही हुयी थी। कुछ उड़ान भू स्थिर कक्षा की भी तय की गयी थी।
इन सभी योजनाओ मे से सिर्फ २ को ही पुरा किया जा सका। इसमे से प्रथम स्कायलैब अंतरिक्ष केन्द्र था जो मई १९७३ से फरवरी १९७४ तक कक्षा मे रहा दूसरा अपोलो-सोयुज जांच अभियान था जो जुलाई अ९७५ मे हुआ था। स्कायलैब का इंधन कक्ष सैटर्न १बी के दूसरे चरण से बनाया गया था और इस यान पर अपोलो की दूरबीन लगी हुयी थी जोकि चन्द्रयान पर आधारीत थी। इस यान के यात्री सैटर्न १बी राकेट से नियंत्रण यान द्वारा स्कायलैब यान तक पहुंचाये गये थे, जबकि स्कायलैब यान सैटर्न ५ राकेट द्वारा प्रक्षेपित किया गया था। स्कायलैब से अंतिम यात्री दल ८ फरवरी १९७४ को विदा हुआ था। यह यान अपनी वापिसी की निर्धारीत तिथी से पहले ही १९७९ मे वापिस आ गया था।
अपोलो-सोयुज जांच अभियान यह अमरीका और सोवियत संघ का संयुक्त अभियान था। इस अभियान मे अंतरिक्ष मे मानवरहित नियंत्रण यान और सोवियत सोयुज यान का जुड़ना था। यह अभियान १५ जुलाई  १९७५ से २४ जुलाई १९७५ तक चला। सोवियत अभियान सोयुज और सेल्युट यानो के साथ चलते रहे लेकिन अमरीकी अभियान १९८१ मे छोडे़ गये एस टी एस १ यान तक बंद रहे थे।

अपोलो अभियान का अंत और उसके परिणाम
अपोलो कार्यक्रम की तीन उड़ाने अपोलो १८,१९,२० भी प्रस्तावित थी जिन्हे रद्द कर दिया गया था। नासा का बजट कम होते जा रहा था जिससे द्वितिय चरण के सैटर्न ५ राकेटो का उत्पादन रोक दिया गया था। इस अभियान को रद्द कर अंतरिक्ष शटल के निर्माण के लिये पैसा उपलब्ध कराने की योजना थी। अपोलो कार्यक्रम के यान और राकेटो के उपयोग से स्कायलैब कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। लेकिन इस कार्यक्रम के लिये एक ही सैटर्न ५ राकेट का प्रयोग हुआ, बाकि राकेट प्रदर्शनीयो मे रखे हैं।

एक रद्द अपोलो उड़ान का नियंत्रण कक्ष

नासा के अगली पीढी के अंतरिक्ष यान ओरीयान जो अंतरिक्ष शटल के २०१० मे रीटायर हो जाने पर उनकी जगह लेंगे, अपोलो कार्यक्रम से प्रभावित है। ओरीयान यान सोवियत सोयुज यानो की तरह जमीन से उड़ान भरकर जमीन पर वापिस आयेंगे, अपोलो के विपरीत जो समुद्र मे गीरा करते थे। अपोलो की तरह ओरीयान चन्द्र कक्षा आधारीत उड़ान भरेंगे लेकिन अपोलो के विपरीत चन्द्रयान एक दूसरे राकेट अरेस ५ से उड़ान भरेगा, अरेस ५ अंतरिक्ष शटल और अपोलो के अनुभवो से बना है। ओरीयान अलग से उड़ान भरकर चन्द्रयान से पृथ्वी की निचली कक्षा मे जुड़ेगा। अपोलो के विपरित ओरीयान चन्द्रमा की कक्षा मे मानव रहित होगा जबकि चन्द्रयान से सभी यात्री चन्द्रमा पर अवतरण करेंगे।
अपोलो अभियान पर कुल खर्च १३५ अरब डालर था(२००६ की डालर किमतो के अनुसार)(२५.४ अरब डालर १९६९ किमतो के अनुसार)। अपोलो यान के निर्माणखर्च २८ अरब डालर था जिसमे १७ अरब डालर नियंत्रण यान के लिये और ११ अरब डालर चन्द्रयान के लिये थे। सैटर्न १ब और सैटर्न ५ राकेट का निर्माण खर्च ४६ अरब डालर था। सभी खर्च  २००६ की डालर किमतो के अनुसार है।

चन्द्रमा पर पहला वैज्ञानिक और अंतिम मानव : अपोलो १७

अपोलो १७ यह अपोलो कार्यक्रम का अंतिम और ग्यारहवां मानव अभियान था। रात मे प्रक्षेपित होने वाला यह पहला अभियान था। इस अभियान की विशेषता थी कि पहली बार कोइ वैज्ञानिक चन्द्रमा पर जा रहा था। इसके पहले सभी यात्री सेना से थे। यह एक विडंबना है या संयोग यह विज्ञानी चन्द्रमा पर जाने वाला आज की तारीख तक आखीरी मानव है।

यात्री दल

  • युगीन सेरनन(Eugene Cernan): तीन अंतरिक्ष यात्रायें, कमांडर
  • रोन इवांस (Ron Evans): १ अंतरिक्ष यात्रा, नियंत्रण यान चालक
  • हैरीशन जैक स्क्मीट(Harrison “Jack” Schmitt) : एक अंतरिक्ष यात्रा , चन्द्रयान चालक

स्कमिट, सेरनन और इवांस

वैकल्पिक यात्री दल

  • जान यंग (John Young): कमांडर, जेमीनी ३, जेमीनी १०, अपोलो १०, अपोलो १६, STS 1, STS 9 का अनुभव
  • स्टुवर्ट रूसा (Stuart Roosa): नियंत्रण यान चालक, अपोलो १४ का अनुभव
  • चार्लस ड्युक (Charles Duke): चन्द्रयान चालक, अपोलो १६ का अनुभव

अभियान के आंकडे़

प्रक्षेपित द्रव्यमान : २.९२३,४०० किग्रा
कुल यान का द्रव्यमान : ४६,७०० किग्रा
नियंत्रण यान का द्रव्यमान : ३०,३२० किग्रा
चन्द्रयान का द्रव्यमान: १६,४५४ किग्रा

पृथ्वी की परिक्रमा : चन्द्रमा की ओर रवाना होने पहले २, वापिसी मे एक
चन्द्रमा की परिक्रमा : ७५

चन्द्रयान का मुख्ययान से विच्छेद : ११ दिसंबर १९७२ को १७:२०:५६ बजे
चन्द्रयान का मुख्ययान से पुनः जुड़ना : १५ दिसंबर को ०१:१०:१५ बजे

यान बाह्य गतिविधीयां
यान बाह्य गतिविधी १ : सेरनन और स्क्मिट
प्रारंभ : ११ दिसंबर १९७२ को २३:५४:४९ बजे
अंत : १२ दिसंबर को ०७:०६:४२ बजे
कुल समय : ७ घंटे, ११ मिनिट और १३ सेकंड

यान बाह्य गतिविधी २ : सेरनन और स्क्मिट
प्रारंभ : १२ दिसंबर १९७२ को २३:२८:०६ बजे
अंत : १३ दिसंबर को ०७:०५:०२ बजे
कुल समय : ७ घंटे, ३६ मिनिट और ५६ सेकंड

यान बाह्य गतिविधी ३ : सेरनन और स्क्मिट
प्रारंभ : १३ दिसंबर १९७२ को २२:२५:४८ बजे
अंत : १४ दिसंबर को ०५:४०:५६ बजे
कुल समय : ७ घंटे, १५ मिनिट और ०८ सेकंड

इंवास द्वारा अंतरिक्ष मे यान बाह्य गतिविधी

यान बाह्य गतिविधी ४ : पृथ्वी की ओर वापसी की यात्रा मे इवांस
प्रारंभ : १७ दिसंबर १९७२ को २०:२७:४० बजे
अंत : १७ दिसंबर को २१:३३:३४ बजे
कुल समय : १ घंटे, ०५ मिनिट और ४४ सेकंड

चन्द्रमा पर अंतिम बार कदम रखने वाले ये दो मानव मे से एक स्कमिट, चन्द्रमा पर कदम रखने वाले पहले भूगर्भशास्त्री थे। इवांस नियंत्रण यान (अमरीका) मे चन्द्रमा की परिक्रमा कर रहे थे जबकि स्कमिट और सेरनन ने रिकार्ड १०९ किग्रा नमुने जमा किये। यात्री दल ने चन्द्रमा पर लगभग ३४ किमी की यात्रा की, ये यात्रा उन्होने चन्द्रवाहन द्वारा टारस-लीट्रो घाटी मे की। उन्होने इस दौरान संतरे के रंग की मिट्टी का भी पता लगाया।

चन्द्रवाहन के पास सेरनन

इस अभियान के उतरने की जगह मारे सेरेनेटेटीस जो कि मोन्टेस टारस के दक्षिण पश्चिम मे है। यह एक J अभियान था जिसमे चन्द्रवाहन ले जाया गया था। इस दौरान यात्रीयो ने चन्द्रमा पर तीन बार यात्राये कि जो ७.२,७.६ और ७.३ घंटो की थी और १०९ किग्रा नमुने जमा किये।

चन्द्रयान नासा के होस्टन, टेक्सास स्थित जानसन अंतरिक्ष केन्द्र मे रखा है।

ब्लू मारबल

इस अभियान के दौरान यात्रीयो ने पृथ्वी की ब्लू मारबल नाम से प्रसिध्द तस्वीर खींची थी।

चन्द्रमा पर अपोलो १७ द्वारा छोडी गयी प्लेट

पृथ्वी पर वापिसी के बाद यह यान सोलोमन द्वीप के पास गीरा जो कि निर्धारीत स्थल से ६४० मीटर दूर था। इसे यान को समुद्र से यु एस एस टीकोन्डरोगा जहाज ने उठाया।

अपोलो ११ को हेलीकाप्टर उठाते हुये

इस अभियान के बाद की उड़ाने अपोलो १८,१९,२० बजट की कमी की वजह से रद्द कर दी गयी थी।

अगला लेख अपोलो श्रंखला का अंतिम लेख होगा। इस लेख को मै कुछ इस तरह से लिखने की कोशीश करुंगा कि यह प्रथम लेख का भी कार्य कर सके।

चन्द्रमा पर सबसे तेज वाहन : अपोलो १६

अपोलो १६ यह अपोलो कार्यक्रम का दसंवा मानव अभियान और चन्द्रमा पर अवतरण करने वाला पांचवां अभियान था।

चन्द्रमा का पैनोरोमिक दृश्य

यात्री दल
जान डब्ल्यु यंग (John W. Young) : ४ अंतरिक्ष यात्राये, कमांडर
थामस केन मैटींगली जुनियर (Thomas K. (Ken) Mattingly Jr) : १ अंतरिक्ष यात्रा, नियंत्रण यान चालक
चार्ल्स ड्युक  जुनियर (Charles Duke Jr.) : १ अंतरिक्ष यात्रा चन्द्रयान चालक